छतरपुर के छत्रसाल नगर में बिजली व्यवस्था लोगों के लिए परेशानी और खतरे का कारण बनी हुई है। यहां बिजली के तार खंभों के सहारे नहीं, बल्कि बांस-बल्लियों के सहारे लगाए गए हैं। कई जगहों पर ये तार इतने नीचे झूल रहे हैं कि जमीन से उनकी दूरी बेहद कम रह जाती है। बारिश और तेज हवा के दौरान स्थिति और भी खतरनाक हो जाती है। सबसे चिंता की बात यह है कि इसी रास्ते से रोजाना बड़ी संख्या में लोग और स्कूल के बच्चे गुजरते हैं।
रिपोर्ट – अलीमा, लेखन – सुचित्रा
छत्रसाल नगर से लेकर खजुराहो हाईवे तक की सड़क किनारे करीब 4 किलो मीटर तक ये तार लटकाए गए हैं। देखने से बिजली के तारों की संख्या करीब 20 से 30 लगती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह समस्या करीब चार साल पुरानी है। जब से यहां बस्ती बसनी शुरू हुई, तभी से बिजली के तार इसी तरह बांस-बल्लियों के सहारे लगाए गए हैं। कॉलोनी में अहिरवार, कुशवाहा, प्रजापति सहित अलग-अलग समुदायों के लोग रहते हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, इस रास्ते से रोजाना करीब दो से तीन हजार लोग गुजरते हैं। कोई काम के लिए जाता है, कोई बाजार जाता है और बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल आते-जाते हैं। ऐसे रास्ते पर बिजली के तारों का इस तरह नीचे लटकना गंभीर सुरक्षा सवाल खड़े करता है।
लोगों का कहना है कि लंबे समय से यहां बिजली के खंभे लगाने की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकी।
बारिश में बढ़ जाता है खतरा
बारिश के मौसम में जमीन गीली होने के कारण नीचे लटकते बिजली के तारों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। स्थानीय निवासी हरीश रैकवार ने बताया कि 20 जुलाई को हुई बारिश के दौरान दो गायों के ऊपर बिजली का तार गिर गया था, जिससे दोनों की मौत हो गई। उनका कहना है कि तेज हवा या आंधी आने पर तार नीचे गिर जाते हैं और बांस-बल्लियों के सहारे किसी तरह उन्हें संभाला जाता है।
हरीश का कहना है कि लोगों ने कई बार बिजली विभाग से यहां खंभे लगाने की मांग की, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ। लोगों को डर है कि अगर समय रहते खंभे नहीं लगाए गए तो अगली बार किसी इंसान की जान भी जा सकती है।
वहीं स्थानीय महिला कुसुम प्रजापति ने बताया कि वहां से गुजरने वाले लोगों और जानवरों दोनों के लिए जानलेवा हो सकती है। उनका कहना है कि जानवरों को खतरे का पता नहीं होता और वे आसानी से इन तारों के संपर्क में आ सकते हैं।
स्कूल के बच्चों पर भी खतरा
छत्रसाल नगर के पास ही एक सीएम राइज़ मॉडल स्कूल है। स्कूल आने-जाने वाले बच्चे इसी रास्ते से गुजरते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, छोटे बच्चों को बिजली के खुले और नीचे लटकते तारों के खतरे का अंदाजा नहीं होता। ऐसे में किसी बच्चे के खेलते-खेलते तार के पास पहुंचने या तार के अचानक नीचे गिरने पर बड़ा हादसा हो सकता है।
एक स्थानीय व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वह कई सालों से यहां तारों की यही स्थिति देख रहा है। उसके मुताबिक, पहले भी एक कुत्ते की करंट की चपेट में आने से मौत हो चुकी है। स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि तार जमीन के करीब होने पर आसपास की धातु की चीजों और स्कूल की बाउंड्री में भी करंट उतरने का खतरा बना रहता है।
स्कूल की एक शिक्षिका ने भी नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उन्होंने बिजली विभाग में कई बार शिकायत की है, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि बार-बार शिकायत और मांग के बावजूद विभाग ने इस गंभीर समस्या को नहीं सुना। बारिश के दौरान दो गायों की मौत के बाद भी यदि तारों को सुरक्षित तरीके से नहीं लगाया गया तो भविष्य में कोई बड़ा हादसा हो सकता है।
अधिकारी ने दी खंभे लगाने की जानकारी
मामले को लेकर बिजली विभाग के अधिकारी एवं कार्यपालन अधिकारी अमर श्रीवास्तव से बात की गई। उन्होंने बताया कि छत्रसाल नगर में खंभे लगाने के लिए अभी तक उनके पास कोई प्रस्ताव नहीं आया था। उन्होंने कहा कि बांस-बल्लियों के सहारे बिजली के तार लगे होने की जानकारी अब उनके संज्ञान में आई है। अधिकारी के अनुसार, दो खंभे तत्काल स्वीकृत किए गए हैं और एक सप्ताह के भीतर उन्हें लगवाने की बात कही गई है।
अब देखना यह होगा कि अधिकारी के आश्वासन के बाद वास्तव में खंभे कब तक लगाए जाते हैं और तारों को जमीन से सुरक्षित ऊंचाई पर कब तक किया जाता है।
सवाल सिर्फ तारों का नहीं, जिम्मेदारी का है
छत्रसाल नगर की स्थिति केवल बिजली व्यवस्था की खामी नहीं, बल्कि लोगों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला है। जहां रोजाना हजारों लोगों की आवाजाही हो, पास में स्कूल हो और पहले ही जानवरों की मौत हो चुकी हो, वहां खुले और नीचे लटकते बिजली के तारों को लंबे समय तक इसी स्थिति में छोड़ना गंभीर लापरवाही का सवाल खड़ा करता है।
अब सवाल यह है कि अगर इन तारों की चपेट में कोई बच्चा या राहगीर आ जाता है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? चार साल तक समस्या बनी रहने और शिकायतों के बावजूद स्थायी समाधान नहीं होने पर जवाबदेही तय होना जरूरी है। विभाग का एक सप्ताह में खंभे लगाने का आश्वासन उम्मीद जरूर जगाता है, लेकिन स्थानीय लोगों को अब आश्वासन नहीं, जमीन पर सुरक्षित बिजली व्यवस्था चाहिए।
इस तरह की व्यवस्था सोचने पर मजबूर कर देती है कि आखिर चार साल से बिजली के तार बिना खंभों के बांस-बल्लियों के सहारे क्यों चल रहे हैं? अगर यह व्यवस्था अस्थायी थी तो इसे अब तक स्थायी क्यों नहीं किया गया? लोगों की शिकायतों के बाद भी जिम्मेदार विभाग ने समय रहते खंभे क्यों नहीं लगाए?
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