विकास के तमाम दावों के बीच चित्रकूट जिले के मऊ ब्लॉक क्षेत्र के ओबरी गांव के करौंदी खुर्द मजरे की तस्वीर अलग कहानी बयां करती है। गांव तक पहुंचने वाला करीब डेढ़ किलोमीटर रास्ता आज भी पक्का नहीं हो सका है। जगह-जगह गहरे गड्ढे, बारिश में कीचड़ और फिसलन ग्रामीणों के लिए रोज की परेशानी बन चुके हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क बनने की उम्मीद में उनकी चार पीढ़ियां गुजर गईं लेकिन पक्की सड़क का इंतजार आज भी खत्म नहीं हुआ।
रिपोर्ट – सुनीता, लेखन – सुचित्रा
इस सड़क का रास्ता करौंदी खुर्द से मुख्य मार्ग और राष्ट्रीय राजमार्ग तक की दूरी करीब डेढ़ किलोमीटर है। यही रास्ता प्रयागराज और चित्रकूट की ओर जाने के लिए भी ग्रामीणों को सबसे नज़दीक पड़ता है। ग्रामीणों के अनुसार, ओबरी गांव की तरफ से घूमकर आने-जाने पर करीब छह किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है। इस गांव की आबादी करीब एक हजार है।
इस गांव में सड़क की बदहाली का असर सिर्फ आवागमन पर नहीं पड़ रहा, बल्कि बच्चों की पढ़ाई, मरीजों के इलाज और गर्भवती महिलाओं की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। बरसात के दिनों में हालात और खराब हो जाते हैं। हर साल ऐसी घटनाएं सामने आती हैं और कई लोगों के हाथ-पैर तक टूट जाते हैं।
बड़े-बड़े गड्ढों में तब्दील हुआ रास्ता
करौदी खुर्द को मुख्य मार्ग से जोड़ने वाला रास्ता इस समय पूरी तरह बदहाल है। सड़क पर जगह-जगह बड़े गड्ढे हैं। बारिश के बाद इनमें पानी और कीचड़ भर जाता है। ऐसे में राहगीरों के लिए यह पता लगाना भी मुश्किल हो जाता है कि कहां गड्ढा है और कहां समतल रास्ता।
ग्रामीण संजय बताते हैं कि पक्की सड़क की मांग लंबे समय से की जा रही है। चुनाव के समय जनप्रतिनिधियों की ओर से सड़क बनवाने का भरोसा जरूर दिया जाता है लेकिन चुनाव खत्म होते ही मामला फिर ठंडे बस्ते में चला जाता है।
एंबुलेंस गांव तक पहुंचना मुश्किल
सड़क की बदहाली का सबसे गंभीर असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि पिछले करीब चार महीने (मई 2026) से एंबुलेंस को गांव तक पहुंचने में परेशानी हो रही है। आपात स्थिति में मरीज को पहले खराब रास्ते से मुख्य मार्ग तक ले जाना पड़ता है।
साधना का कहना है कि किसी मरीज की तबीयत अचानक बिगड़ जाए तो परिवार के सामने सबसे बड़ी समस्या उसे वाहन या एंबुलेंस तक पहुंचाने की होती है। बरसात में कीचड़ और फिसलन के कारण यह काम और मुश्किल हो जाता है।
गर्भवती महिलाओं के लिए डेढ़ किलोमीटर का रास्ता बना चुनौती
सड़क की खराब हालत का सबसे दर्दनाक असर गर्भवती महिलाओं पर पड़ रहा है। सीमा बताती हैं कि प्रसव पीड़ा शुरू होने पर महिलाओं को कई बार करीब डेढ़ किलोमीटर तक पैदल ले जाना पड़ता है, ताकि उन्हें किसी वाहन या एंबुलेंस तक पहुंचाया जा सके।
ग्रामीणों ने करीब पांच (2021) साल पहले की एक घटना का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक, प्रसव के दौरान एक महिला को खराब रास्ते की वजह से काफी परेशानी हुई थी और बाद में जच्चा-बच्चा दोनों की मौत हो गई थी।
हर साल बारिश आती है और हर साल यही समस्या फिर सामने खड़ी हो जाती है। सवाल यह है कि जब समस्या वर्षों से सामने है और इसका असर सीधे लोगों की जान और स्वास्थ्य पर पड़ रहा है, तो अब तक इसका स्थायी समाधान क्यों नहीं किया गया?
बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ रहा असर
सड़क की बदहाली का असर गांव के बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ रहा है। शुभम बताते हैं कि करौंदी खुर्द प्रयागराज जिले की सीमा के नजदीक है। गांव के कई बच्चे पढ़ाई के लिए प्रयागराज के शंकरगढ़ क्षेत्र में जाते हैं।
बारिश के दिनों में बच्चों के लिए स्कूल जाना मुश्किल हो जाता है। गड्ढों और कीचड़ से होकर गुजरने के दौरान बच्चे फिसलकर गिर जाते हैं। कई बार उनके कपड़े और किताबें खराब हो जाती हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, बच्चे पढ़ाई छोड़ना नहीं चाहते, इसलिए कई बार बारिश में भी बिना जूते-चप्पल के पैदल स्कूल जाने को मजबूर होते हैं।
प्रयागराज की सीमा के कारण विकास की अनदेखी का आरोप
ग्रामीण शुभम का आरोप है कि करौदी खुर्द प्रयागराज जिले की सीमा के नजदीक होने के कारण विकास कार्यों की अनदेखी हो रही है। उनका कहना है कि अधिकारी मौके पर आकर जमीनी स्थिति देखें तो उन्हें पता चलेगा कि ग्रामीण किस तरह की परेशानी झेल रहे हैं।
प्रधान के मुताबिक, करौंदी खुर्द का रास्ता प्रयागराज की सीमा से जुड़ा होने के कारण सड़क निर्माण का मामला अटका हुआ है। उन्होंने पीडब्ल्यूडी विभाग को पांच साल में तीन बार लिखित शिकायत दी है। करीब डेढ़ साल (2025) पहले प्रयागराज के शंकरगढ़ ब्लॉक प्रमुख को भी रास्ता बनवाने के लिए पत्र दिया गया था। करौंदी खुर्द के अलावा चुनहा पुरवा का रास्ता भी लंबे समय से कच्चा पड़ा है। दोनों रास्तों को बनवाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
अधिकारी बोले- सर्वे के बाद तय होगा सड़क निर्माण
पीडब्ल्यूडी (लोक निर्माण विभाग) अधिकारी सर्वेश गुप्ता सहायक अभियंता का कहना है कि नई सड़क के निर्माण के लिए निर्धारित नियम और मानक हैं। आबादी और संपर्क मार्ग से जुड़े मानकों के आधार पर सड़क निर्माण का प्रस्ताव तैयार किया जाता है। यदि गांव पहले से किसी सड़क से जुड़ा है तो उस स्थिति में भी नियमानुसार परीक्षण किया जाता है। यह सड़क मुख्यमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत बनाई जाएगी।
उन्होंने कहा कि करौंदी खुर्द में टीम भेजकर सर्वे कराया जाएगा। यदि रास्ता पीडब्ल्यूडी के अंतर्गत आता है और निर्धारित मानकों को पूरा करता है तो सड़क निर्माण की कार्रवाई की जाएगी।
करौंदी खुर्द की कहानी सिर्फ एक खराब सड़क की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जहां लोगों की उम्मीद बुनियादी सुविधा का इंतजार करते-करते टूट जाती है और समाधान के नाम पर आज भी सर्वे की बात कही जाती है।
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