ज़हरीली शराब से हुई मौतों के बाद शराब की बिक्री, बढ़ती शराब खपत और सरकार को मिलाने वाले राजस्व (किसी व्यवसाय, संस्था या सरकार को मिलने वाली कुल आय या धनराशि) पर सवाल उठ रहे हैं। अब तक ज़हरीली शराब से 24 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। शराब ठेकेदार समेत 30 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। शराब से सरकार को राजस्व मिलने की बात आती है। वहीं एक वर्ग की कमाई शराब पर खर्च हो रही है। नुक़सान किसका?
मध्य प्रदेश के सागर जिले के बंडा और शाहगढ़ विकासखंड के गांव में ज़हरीली और नकली शराब पीने से कुछ मौतें हुई थीं। जिसमें से अब तक तक़रीब 24 लोगों की मौत हो चुकी है। प्रशासन के तरफ से इन 24 लोगों की मौत की पुष्टि की गई है। लगभग 112 लोगों का अभी भी अस्पताल में इलाज चल रहा है।
क्या है इस ज़हरीली शराब से मौत का पूरा मामला?
इस मामले की शुरुआत होती है 5 सितंबर 2026 से। 5 सितंबर की शाम बंडा सिविल अस्पताल में अचानक ऐसे मरीज पहुंचने लगे, जिनकी हालत सामान्य नहीं थी। डॉक्टरों द्वारा इलाज शुरू किया गया। इलाज शुरू होने के कुछ समय बाद ही कई मरीजों की तबीयत और अधिक बिगड़ती गई। किसी के शरीर में अकड़न थी तो किसी को उल्टियां हो रही थीं। कुछ मरीजों का शरीर नीला पड़ने लगा और कुछ की आंखों की रोशनी भी कम होने लगी।
एक के बाद एक मरीजों की हालत देखकर डॉक्टरों को मामला गंभीर लगा। इसकी जानकारी तुरंत वरिष्ठ अधिकारियों को दी गई। इसके बाद कलेक्टर और एसपी स्वास्थ्य विभाग की टीम के साथ बंडा पहुंचे। फिर गंभीर मरीजों को बंडा से जिला अस्पताल और बीएमसी भेजा जाने लगा।
इसी दौरान ही कुछ मरीजों की मौत हो गई। अस्पताल में भर्ती लोगों से जब उनकी तबीयत बिगड़ने की वजह पूछी गई तो ज्यादातर ने शराब पीने की बात बताई।अगले दिन रविवार की सुबह तक 9 लोगों की मौत हो चुकी थी और शाम तक यह संख्या 15 से ज्यादा पहुंच गई। सोमवार को भी मौतों का सिलसिला जारी रहा और मौत का आंकड़ा 22 के पार चला गया। फिर मंगलवार यानी 7 सितंबर से मरीजों की हालत में थोड़ी बहुत सुधार दिखना शुरू हुआ, हालांकि उस दिन भी 2 लोगों की मौत हुई।
ज़हरीली शराब से मौत के बाद प्रशासन और पुलिस द्वारा कार्यवाही शुरू
ये आशंका सामने आने के बाद कि मामला शराब से जुड़ा हुआ है, प्रशासन और पुलिस ने भी अपनी कार्रवाई तेज कर दी। सबसे पहले सात लाइसेंसी शराब की दुकानों को सील किया गया और वहां से शराब के सैंपल लिए गए। इसके साथ ही पुलिस की अलग-अलग टीमों ने गांवों में जाकर अवैध शराब बेचने वालों के ठिकानों पर दबिश देना शुरू किया।
इस दौरान आरोपियों के कब्जे से शराब भी जब्त की गई। इसके बाद इलाके में निगरानी बढ़ा दी गई, ताकि दोबारा कहीं अवैध तरीके से शराब की बिक्री न हो। प्रशासन की ओर से भी गांव-गांव मुनादी कराकर लोगों से शराब नहीं पीने की अपील की गई। इसी के साथ जिन लोगों ने शराब पी थी, उन्हें एहतियात के तौर पर अस्पताल जाकर जांच कराने की सलाह दी गई।
शराब ठेकेदार सहीत 30 लोगों पर FIR
इसी जहरीली शराब से हुई मौतों के बाद पुलिस द्वारा मामले में शराब ठेकेदार समेत 30 लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज की गई है। इस मामले में अब तक 14 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। उनके पास से 225.12 लीटर अवैध देशी शराब भी बरामद हुई है।
जानकारी के अनुसार पुलिस और प्रशासन की जांच में सामने आया है कि शराब कहां तैयार हुई और बंडा तक कैसे पहुंची, इसकी पड़ताल की जा रही है। जांच में शराब के सैंपल में मेथेनॉल की मिलावट भी मिली है। बता दें मेथेनॉल एक जहरीला अल्कोहल है, जिसका इस्तेमाल आमतौर पर औद्योगिक कामों में होता है। इसे सॉल्वेंट, ईंधन और कई तरह के केमिकल बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन अगर यही शराब में मिल जाए और कोई व्यक्ति उसे पी ले तो शरीर पर गंभीर असर पड़ सकता है और जान जाने का खतरा भी रहता है।
विभागीय स्तर पर भी की गई है कार्रवाई
इसी ज़हरीली शराब से मौत के मामले को लेकर क्षेत्र के विभागीय स्तर पर भी कुछ कार्यवाही की गई है। आबकारी विभाग के तीन अधिकारियों और दो पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया है। इसके अलावा बंडा की एसडीएम को भी उनके पद से हटा दिया गया है।
इतना ही नहीं सागर में लंबे समय से पदस्थ सहायक जिला आबकारी अधिकारी मंजूषा सोनी को भी उनकी मौजूदा जिम्मेदारी से हटाया गया है। आबकारी आयुक्त की ओर से 8 सितंबर को एक आदेश जारी किया गया। जिसमें मंजूषा सोनी को प्रभारी अधिकारी, विदेशी मदिरा भंडार सागर (FL-10) के पद से हटाकर सहायक जिला आबकारी अधिकारी, कार्यालय संभागीय उड़नदस्ता, संभाग सागर में भेजा गया है। जानकरी के लिए बता दें करीब 20 साल से सागर में पदस्थ सोनी को हटाने का फैसला ऐसे समय में हुआ है, जब बंडा में जहरीली शराब से हुई मौतों के बाद शराब की बिक्री और आबकारी विभाग की निगरानी को लेकर सवाल उठ रहे हैं।हालांकि, पदस्थापना आदेश में मंजूषा सोनी को हटाए जाने का कारण स्पष्ट रूप से उल्लेख या बताया नहीं किया गया है।
MP में ज़हरीली शराब से मौत का कनेक्शन UP से जोड़ा गया
MP में ज़हरीली शराब से हुई मौतों के मामले में अब इसका कनेक्शन उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले से भी जोड़ा जा रहा है। जानकरी के मुताबिक, सागर पुलिस की शुरुआती जांच में दावा किया गया है कि ललितपुर से नकली शराब की खेप मध्य प्रदेश के सीमावर्ती गांवों तक पहुंचाई जा रही थी। पुलिस के मुताबिक, कुछ समय पहले ललितपुर में नकली देशी शराब बनाने वाली एक फैक्ट्री पकड़ी गई थी।
इस कार्रवाई में सामने आया था कि गिरोह के लोग मध्य प्रदेश से जुड़े थे, और ललितपुर में शराब तैयार करने के बाद उसे सस्ते दाम पर MP के ग्रामीण इलाकों में बेचते थे। जानकरी के अनुसार पुलिस को पूछताछ में ये भी जानकारी मिली कि यूपी-एमपी सीमा से लगे गांवों में इस तरह की नकली शराब की सप्लाई की जा रही थी। इसी आधार पर सागर पुलिस बंडा में मिली जहरीली शराब की खेप का संबंध ललितपुर के इसी नेटवर्क से जोड़कर देख रही है। हालांकि, ललितपुर पुलिस ने फिलहाल इस मामले में मध्य प्रदेश पुलिस की ओर से किसी औपचारिक संपर्क की बात से इनकार किया है। इसलिए शराब की असली सप्लाई कहां से हुई और बंडा तक किस रास्ते से पहुंची, ये फ़िलहाल जांच का हिस्सा बना हुआ है।
क्या सच में शराब दुकान से मिलने वाले आय से देश का विकास किया जा रहा है?
अगर ज़रा पीछे मुड़ कर देखा जाए तो जहरीली शराब से मौत का यह कोई पहला मामला नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में पहले भी ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं। शराब से होने वाली ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सरकार ने शराब की बिक्री को अपने नियंत्रण में रखा है और लाइसेंसी दुकानों के जरिए शराब बेचने की व्यवस्था की हुई है।
वहीं, उत्तर प्रदेश में आबकारी विभाग से जुड़े एक शख़्स ने नाम न बताने के शर्त में खबर लहरिया को बताया, कि अधिकारियों पर सरकारी शराब की दुकानों की संख्या बढ़ाने का दबाव भी रहता है। इसके पीछे शराब की बिक्री से मिलने वाली सरकारी आय को एक बड़ी वजह बताया जाता है। उस अधिकारी का कहना था कि इस आय का इस्तेमाल सरकार अपने अलग-अलग विकास और दूसरे सरकारी कामों में करती है। ऐसे में बंडा की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि जब शराब की बिक्री से लेकर उसकी निगरानी तक की जिम्मेदारी सरकारी व्यवस्था के पास है, तो नकली और जहरीली शराब गांवों तक कैसे पहुंच रही है।
कुछ आंकडें और रिपोर्ट
मध्य प्रदेश के आबकारी विभाग के अनुसार, मध्य प्रदेश सरकार को शराब और दूसरे मादक पदार्थों के कारोबार से अलग-अलग तरह से राजस्व मिलता है। इसमें देशी और विदेशी शराब की दुकानों के लाइसेंस, भांग की दुकानों की नीलामी और अफीम से जुड़े लाइसेंस से मिलने वाली रकम शामिल है। इसके अलावा डिस्टिलरी, शराब की बॉटलिंग प्लांट और ब्रुअरी से मिलने वाली लाइसेंस फीस भी सरकार की आय का हिस्सा है।
शराब और मादक पदार्थों की बिक्री, आयात-निर्यात और परिवहन पर सरकार एक्साइज ड्यूटी, आयात-निर्यात शुल्क और परमिट फीस भी लेती है। देशी और विदेशी शराब की दुकानों के लाइसेंस का नवीनीकरण आवेदन, लॉटरी या टेंडर के जरिए किया जाता है, जबकि भांग की दुकानों के लाइसेंस की नीलामी की जाती है। यानी शराब की बिक्री से मिलने वाली रकम सिर्फ दुकानों के लाइसेंस से नहीं आती। सरकार को अलग-अलग शुल्क और टैक्स के जरिए भी राजस्व मिलता है।
ये रिपोर्ट 21 अक्टूबर 2019 की है।
मध्य प्रदेश आबकारी विभाग द्वारा ये भी डेटा बताया गया है कि इससे कितनी इनकम होती है। जो हर साल अलग-अलग संख्या होता है।
ये रिपोर्ट अप्रैल 2026 की है।
मध्य प्रदेश के आबकारी विभाग के रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में शराब की खपत बढ़ी है। साथ ही कितना सेवन किया गया उसका के डेटा है। ये डेटा अप्रैल 2026 की है।
देखा जाए तो एक ओर शराब से होने वाली आय सरकार के लिए कमाई का एक जरिया नजर आता है। उसी कमाई को विकास के कामों में लगाने की बात भी सामने आती है। दूसरी तरफ शराब की वजह से कई लोगों और उनके परिवारों की जिंदगी पर बुरा असर पड़ता है। इसके बावजूद कई राज्यों में शराब की बिक्री बढ़ाने की कोशिशें होती रही हैं। बिहार और छत्तीसगढ़ में भी पिछले कुछ सालों में नई शराब दुकानों को लेकर खबरें सामने आई हैं।
ऐसे में सवाल सिर्फ जहरीली शराब को रोकने का नहीं होता है। सवाल ये भी कि शराब की दुकानों की संख्या बढ़ाने से किस तरह का विकास हो रहा है? आखिर रोज शराब पीने की जरूरत किन लोगों को पड़ती है, कौन से परिवार इसकी वजह से टूटते हैं और कम आमदनी में मेहनत करने वाले लोगों की जिंदगी पर इसका कितना असर पड़ता है?
खबर लहरिया द्वारा कई रिपोर्टों में दिखाया है कि शराब बस पीने वाले की सेहत की ख़राबी करती है। इसका असर पूरे परिवार और समाज पर भी पड़ता है। कई कवरेज में सामने आया है कि शराब के चलते कहीं नशे में डूबे लोग अपना काम और परिवार छोड़ रहे हैं, कहीं शराब पीकर घरवालों से मारपीट हो रही है, तो कहीं पति अपनी पत्नी और बच्चों के साथ हिंसा कर रहा है। कई जगह महिलाओं के साथ छेड़खानी और लड़ाई-झगड़े की घटनाएं भी शराब के नशे से जुड़ी सामने आई हैं।
इसे दो पहलू से समझा जा सकता है। पहला ये कि शराब से सरकार को राजस्व मिलता है, जिसका इस्तेमाल विकास के कामों में किया जाता है। दूसरा यही शराब गरीब और मजदूर परिवारों की कमाई का बड़ा हिस्सा भी खा रही है। दिनभर मेहनत करने वाला कोई मजदूर अपनी कमाई का पैसा शराब की दुकान पर खर्च कर देता है। यानी जिस पैसे से उसके घर का राशन, बच्चों की पढ़ाई या दूसरी जरूरतें पूरी हो सकती थीं, वो पैसा शराब में चला जाता है। फिर यही शराब की बिक्री से मिला पैसा सरकारी राजस्व का हिस्सा बनकर विकास के कामों में जाता है।
यानी पैसा घूमकर फिर शराब की दुकान तक पहुंच रहा है। तो क्या इसका मतलब ये है कि मजदूर दिनभर मेहनत करके भी अपने परिवार के लिए मुफ़्त में काम कर रहा है?
इस पूरे चक्र में उस मजदूर और उसके परिवार को क्या मिल रहा है? मौत होती है वो अलग। सिर्फ शराब से कितना राजस्व मिल रहा है की बात नहीं है। ये भी बात है कि इसकी कीमत कौन चुका रहा है?
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