खबर लहरिया Blog बुंदेलखंड: भांग बिना होली नहीं!

बुंदेलखंड: भांग बिना होली नहीं!

अगर एक बार भांग खा लो तो लोग बार-बार मीठा ही मांगते हैं। उनका नशा और बढ़ता चला जाता है। फिर उनका नशा उतारने के लिए उन्हें खटाई या खट्टे के साथ सरसों का तेल पिलाया जाता है तब जाकर उनका नशा उतरता है।

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                                                                                               भांग बनाते हुए लोग ( फोटो – सोशल मीडिया)

‘जब भांग का रंग चढ़ा हो तभी होली का मज़ा आता है’। होली में रंग-गुलाल, मिठाइयां, पकवान एक तरफ और भांग का रंग एक तरफ। क्या आपको मालूम है कि होली के मौके पर भांग खाने और पीने के पीछे भी दिलचस्प कहानियां हैं जो लोगों को थिरकाती भी हैं और जब याद करो तो हँसते-हँसते पेट भी फूल जाता है।

यूं तो भांग की ठंडाई आमतौर पर महाशिवरात्रि में मिलती हैं, लेकिन बुंदेलखंड की होली में जब तक भांग की ठंडाई न पी जाए, होली पूरी नहीं होती। यहां तक कि मिठाइयों में भी भांग होता है। लोग खाते हैं और जमकर मस्ती करते हैं।

कालिंजर के रहने वाले बंसू सोनकर बताते हैं, वैसे तो नशा करना बुरा माना जाता है लेकिन शिवरात्रि के समय भगवान शिव के प्रसाद के रूप में लोग भांग का सेवन करते हैं। शिवरात्रि से भांग खाने का शुरू हुआ सिलसिला होली तक चलता है। वहीं होली में भांग खाने की परंपरा भी है। माना जाता है कि होली के रंग में जब भांग का नशा शामिल होता है तो होली खेलने वालों का आनंद कई गुना ज़्यादा बढ़ जाता है।

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भांग का रंग और खटाई का तड़का

होली के दौरान महिलाओं की बात की जाए तो वह घर में भांग वाली गुजिया व बर्फी बनाती हैं। एक किस्सा याद आता है, मेरी दोस्त थी फूलवती। एक बार उसे भांग खाने का शौक चढ़ा। उसे जानना था कि भांग खाने के बाद कैसा लगता है तो उसने भांग वाली गुजिया खा ली। अब क्या, भांग खाने के बाद तो उसने अपने होश ही खो दिए। वो चीज़ें भी बोलने लगी जो उसे नहीं बोलनी चाहिए थी। बस बार-बार और भांग वाली गुजिया मांगने लगी, हा हा हा। हमें तो उसे देखकर बहुत हंसी आ रही थी।

यह बात तो है, अगर एक बार भांग खा लो तो लोग बार-बार मीठा ही मांगते हैं। उनका नशा और बढ़ता चला जाता है। फिर उनका नशा उतारने के लिए उन्हें खटाई या खट्टे के साथ सरसों का तेल पिलाया जाता है तब जाकर उनका नशा उतरता है।

पुरुषों की बात करें तो मोतियारी गांव के पप्पू बाते हैं, होली के दिन बड़े-बड़े सार्वजनिक जगहों पर पुरुष इकठ्ठा होकर ढोलक, मजीरा, हारमोनियम और झांझर के साथ बुंदेलखंड के पुराने फाल्गुन के गीत गाते हैं। बड़े-बड़े ड्रमों में भांग की ठंडाई बनाकर रख दी जाती है। एक तरह से होली पर हल्ला और शोर मचाने की परंपरा रोमांचक होती है क्योंकि यह करने के मौके कभी-कभी मिलते हैं। कभी-कभी ही वह खुलकर हंस पाते हैं,रो पाते हैं, नाच पाते हैं।

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भांग, पाचन में देता है साथ

भांग की ठंडाई तैयार करने के लिए बादाम,पिस्ता,चीनी,दूध और भांग के पौधे के पत्तों को पीसकर बनाये हुए काढ़े जैसे पेस्ट की ज़रूरत होती है। इसके बाद स्वादिष्ट ठंडाई तैयार हो जाती है। यह भी बता दूं, भांग पाचन क्रिया में भी काम आता है। होली के दौरान खाये जाने वाले पकवान व मिठाइयां कई बार बेहद ज़्यादा हो जाती हैं जिन्हें पचाने में भांग मददगार होता है।

भांग को लोग दूध या दही के साथ मिलकार तैयार किये गए ‘भांग की ठंडाई’ व ‘भांग की लस्सी’ के रूप में सेवन करते हैं। कुछ लोग भांग की बर्फी या गोली भी खाते हैं। ‘भांग की ठंडाई और बर्फी, बुंदेलखंड में खाए जाने वाली भांग का सबसे लोकप्रिय रूप है।

इस खबर की रिपोर्टिंग गीता देवी द्वारा की गई है। 

 

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