खबर लहरिया Blog Bihar News: बिहार में बोली जानें वाली “मगही” भाषा की कहावतें, क्या आप ने सुनी हैं ये कहावतें?

Bihar News: बिहार में बोली जानें वाली “मगही” भाषा की कहावतें, क्या आप ने सुनी हैं ये कहावतें?

 

कहावत कहते हुए आप ने कभी अपने नाना-नानी, दादा-दादी या फिर अपने मम्मी-पापा से सुना होगा। अधिकतर ग्रामीण इलाकों में कहावत बोली जाती है। कहावत यानी अपनी भाषा में एक या दो लाइन को व्यंग्य या फिर लय में बोल देना। इसी तरह बिहार में भी मगही भाषा में भी कई तरह की कहावतें हैं। यदि आप बिहार से हैं और मगही भाषा बोलते हैं तो इन कहावतों को आप ने भी जरूर से सुना होगा।

खेत में फसल की देखभाल करता हुआ किसान (फोटो साभार: खबर लहरिया)

बिहार में मुख्य रूप से तीन तरह की भाषा बोली जाती हैं -मगही, भोजपुरी और मैथली। मगही भाषा मुख्य रूप से मध्य बिहार में बोली जाती है जैसे -पटना, गया, नालंदा, जहानाबाद और औरंगाबाद। इसी तरह से भोजपुरी पश्चिमी बिहार आरा, भोजपुर, बक्सर, सिवान, छपरा (सारण), गोपालगंज और पश्चिम चंपारण में बोली जाती है। मैथली भाषा उत्तरी और उत्तर-पूर्वी बिहार के दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, पूर्णिया, कटिहार और सहरसा में बोली जाती है।

कहावतें और लोगों का जुड़ाव

कहावतें तो पीढ़ी दर पीढ़ियां चलती रहती हैं। कहावतें हमारे जीवन से जुड़े अनुभव के आधार पर ही बनाई जाती हैं। कहावतें सुनने में बड़ी ही दिलचस्प लगती हैं और कभी कभी इसे सुनकर चेहरे पर मुस्कान या फिर हंसी आ जाती है। इन कहावतों से कुछ न कुछ सीखने को भी मिलता है। इन्हें अधिकतर हमने तो बड़े बुजुर्ग से ही सुना है। जब भी गांव जाते थे,अपने नाना-नानी, दादा-दादी कोई कुछ काम बिगड़ जाता या फिर अच्छा होता तो अपनी भाषा में कुछ कह देते जो सुनने में बड़ा अच्छा लगता था। हम फिर इसका अर्थ पूछते फिर वो हमें समझाते थे।

मगही भाषा की कहावत

“घास खाए गधा, मार खाए जोलहा”

इसका मतलब ग्रामीण इलाकों में जब किसान अपने जानवर खेत में चराने ले जाते थे। इस दौरान यदि उनके जानवर किसी और के खेत में चले जाए तो खेत का मालिक जानवर चराने वाले को मारता है क्योंकि गलती उसकी मानी जाती है जिसका जानवर है, न कि जानवर की। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि गलती करे कोई और मार खाए कोई और।

देखा जाए तो ऐसा जीवन में कई बार होता है गलती किसी और की होती है लेकिन सजा किसी और को मिल जाती है।

खेत में भैंस चराते हुए किसान (फोटो साभार: खबर लहरिया)

“ऐरी पर चेरी, बराहिल के नौआ”

इसका मतलब की अपना काम किसी और को करने के ले दे देना। ऐरी (दाई), चेरी यानी नौकरानी, नौआ (नाई) और बराहिल (जानवर की देखभाल करने वाला) यानी काम दिया गया एरी को उसने कह दिया चेरी को और बराहिल ने नौआ को कह दिया। इसे वैसे रेसा रेसी करना भी कहा जाता है। इस तरह की कहावत उनके लिए हैं जो लोग आलसीपन दिखाते हैं और किसी और को कहने के लिए कह देते हैं। उदाहरण -जैसे घर का दरवाजा कोई खटखटता है तो हम एक दूसरे को कहने लगते हैं कि तुम खोल दो जाकर। यह कहावत अधिकतर पारिवारिक जीवन में बच्चों पर ज्यादा लागू होती है।

इस कहावत को इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि लोग अपने छोटे काम भी दूसरों से करने के लिए कह दते हैं। यदि हमें कोई काम दिया गया है तो वो हमें करना चाहिए ऐसा करने से काम में भी देरी हो जाती है।

 

गांव में काम करते हुए लोग (फोटो साभार: खबर लहरिया)

“अघायल बगुलवा पोठिया तीथ”

इस कहावत का मतलब है कि जब पेट भरा हुआ हो तो खाना ख़राब लगता है। अघायल -पेट भरा हुआ / संतुष्ट, बगुलवा -बगुला (पक्षी), पोठिया -छोटी मछली और तीथ यानी कड़वा।

जब बगुले का पेट भर जाता है तो उसको मछलियां कड़वी लगने लगती है। जैसे जब हम ज्यादा खाना खा लेते हैं तो हम कह देते हैं कि खाना अच्छा नहीं बना और छोड़ देते हैं। कोई भी चीज चाहे वो हमारे लिए उपयोगी ही क्यों न हो जरूरत से ज्यादा करने पर बुरी लगने लगती है।

नदी किनारे बैठे दो आदमी (फोटो साभार: खबर लहिरया)

“दस से दशहरा, सोलह से सोहराई,
सेकर चारि जेठान, सेकर चारि गंगा स्नान,
लावा हँसुआ काटे धान।”

यह कहावत किसानों के लिए खेती-बाड़ी, समय और त्योहार से जुड़ी है। कहने का अर्थ है कि दस दिन के बाद दशहरा, सोहराई यानी सोलह दिन के बाद दीपावली, इसके बाद चार दिन बाद जेठान -छठ, फिर गंगा स्नान और इसके बाद धान काटने का समय आ जाता है। लोगों और किसानों के लिए बहुत खास समय होता है। लोग दिन गिनने लगते हैं कि कौन सा त्योहार कब आने वाला है। इससे लोगों की खुशियां का पता चलता है साथ ही किसान भी अपनी फसल पकने और काटने का इंतजार करते हैं।

धान की बालियां (फोटो साभार: खबर लहरिया)

“ओढ़े पहने के सादा, ऐसा चाल चलो निबहें बाप दादा”

इस कहावत का अर्थ है कि व्यक्ति को साधारण रहना चाहिए। सादे कपड़े और खान पान भी सादा रहना चाहिए। यह कहावत अधिकतर बुजुर्ग उन युवाओं पर करते थे जो स्टाइलिश कपड़े और फेंसी खाना खाते हैं। बुजुर्गों का मानना है कि पहले से ही भविष्य को सोचकर रहन सहन करना चाहिये ताकि कोई मुसीबत आए तो पैसे पास में रहे क्योंकि बाहर खाना खाने में ज्यादा पैसे लगते हैं और स्टाइलिश कपड़े भी काफी महंगे आते हैं। इसी तरह की बहुत ही प्रसिद्ध लाइन है “जितनी चादर उतने पैर फैलाने चाहिए।”

ये सभी कहावते अब धीरे धीरे लोगों के बीच से अब गायब हो गई हैं। इन कहावतों के बारे में वही जानते होंगे जिनके पूर्वज उन्हें यह सब कहा करते थे और उन्हें याद रह गए। आज-कल तो इन कहावतों का इस्तेमाल ग्रामीण स्तर पर भी काफी कम हो गया है। हमें अपनी भाषा और उससे जुड़ी कहावतों को जिन्दा रखना चाहिए क्योंकि हमें इससे सीख भी मिलती है।

 

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