अप्रैल की तेज धूप, खेत में फैली ककड़ी की बेलें और सुबह 6 बजे से तोड़ाई में जुटे किसान। बिहार के गांवों में यही गर्मी की असली तस्वीर है लेकिन जो ककड़ी शहरों में ठंडक देती है, उसके पीछे किसानों की कितनी मेहनत और जोखिम छिपा है?
रिपोर्ट – सुमन, लेखन – सुचित्रा
भारत में ककड़ी का सबसे ज्यादा उत्पादन उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में किया जाता है। हम बात करेंगे बिहार में ककड़ी के उत्पादन की। बिहार में ककड़ी पटना (धनरुआ, मसौढ़ी इलाके), नालंदा, वैशाली, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, भागलपुर, कटिहार और पूर्णिया में उगाई जाती है।
पटना के धनरुआ ब्लॉक में ककड़ी की खेती सबसे ज्यादा
पटना जिले के धनरुआ ब्लॉक के अंतर्गत आने वाला सांडा गांव में अधिकांश किसान खीरे और ककड़ी की खेती करते हैं। अप्रैल के महीनें में जहां भी नजर डालें, चारों तरफ आपको खीरा और ककड़ी की ही फसल दिखाई देती है। ककड़ी की खेती गर्मी के मौसम में शुरू होती है और जल्दी ही तैयार भी हो जाती है। पटना के धनरुआ ब्लॉक का सांडा गांव ककड़ी उत्पादन का बड़ा केंद्र बन चुका है, जहां करीब 100 किसान परिवार इस खेती पर निर्भर हैं।
शियाराम चौधरी, जितेंद्र कुमार, अजीत कुमार और हरिचरण बिंद अपने खेतों में फसल देखने पहुंचे हैं। तेज धूप होने के कारण वे फसल में पानी लगाने आए हैं। इनका कहना है कि उनका गांव (सांडा गांव) काफी बड़ा है, जहां की आबादी करीब 4 से 5 हजार के बीच है। गांव में लगभग 100 घर ऐसे हैं जो खेती करते हैं और ज्यादातर लोग नगदी फसल के रूप में ककड़ी की खेती करते हैं। वे बताते हैं कि गांव में मुख्य रूप से चौधरी और बिंद समुदाय के लोग ककड़ी की खेती कर रहे हैं। इनमें करीब 50 घर चौधरी और 50 घर बिंद समुदाय के हैं, जिन्होंने बड़े पैमाने पर ककड़ी की खेती की हुई है।
ककड़ी की खेती ही जीविका का साधन
नीचे दी गई तस्वीर में उर्मिला हैं। वह बताती हैं कि ककड़ी की खेती करना उनका पुश्तैनी काम है, जिसे वे कई सालों से करती आ रही हैं। उनके परिवार में उनके पति, एक बेटा है जो कोई काम नहीं करता और बहू है जो उनके साथ खेत में काम करती है। उर्मिला के दो पोते व एक पोती हैं, जो स्कूल जाते हैं। पूरे परिवार का खर्च इसी खेती से चलता है। जब फसल अच्छी होती है, तभी घर में खाने-पीने की व्यवस्था हो पाती है नहीं तो चिंता ही चिंता रहती है।
नीचे तस्वीर में पुष्पा नाम की महिला है जो सड़क किनारे ककड़ी बेचने के लिए बैठी है। यह नजारा उस समय का है जब ककड़ी की फसल का सीजन शुरू हो चुका है।
बता दें कि ककड़ी की तोड़ाई अप्रैल की शुरुआत, यानी 1 अप्रैल से ही शुरू हो जाती है और अब फसल बाजार में आने लगी है।
ककड़ी की तोड़ाई सुबह करीब 6 बजे से शुरू होकर 8 बजे तक चलती है। इसके बाद किसान अपनी उपज लेकर सड़क किनारे बैठ जाते हैं और खरीदारों का इंतजार करते हैं। यह सड़क मसौढ़ी से धनरूआ को जोड़ने वाला हाईवे है, और यह स्थान सांडा गांव के सामने का क्षेत्र बताया जा रहा है।
इस सड़क के किनारे आसपास के कई किसान अपनी-अपनी ककड़ी लेकर बैठते हैं और यहीं पर उसकी बोली लगाई जाती है। पटना के व्यापारी भी इसी जगह आकर सीधे किसानों से ककड़ी खरीदते हैं और अपने साथ ले जाते हैं।
ककड़ी की कीमत सस्ती
ग्रामीणों इलाकों में फिलहाल किसानों को ककड़ी का दाम सिर्फ 2.5 से 3 रुपये किलो मिल रहा है मतलब कि लागत के मुकाबले बेहद कम। इसकी वजह यह है कि अभी सहालग (शादी-विवाह का सीजन) शुरू नहीं हुआ है और खरमास का समय चल रहा है।
किसानों का कहना है कि जैसे ही 15 अप्रैल के बाद सहालग शुरू होगा, ककड़ी की मांग बढ़ेगी और कीमत भी बढ़कर करीब 5 रुपए प्रति किलो तक पहुंच सकती है। इससे किसानों की आमदनी में सुधार होगा और उन्हें अपनी मेहनत का बेहतर लाभ मिल सकेगा।
ककड़ी रोजगार और कमाई का जरिया
नीचे दी गई तस्वीर में देखा जा सकता है कि एक महिला खेत में ककड़ी को टोकरी में लिए खड़ी है। उन्होंने बताया कि लगभग एक बीघा जमीन में ककड़ी की खेती की है। एक बीघा खेत से एक बार की तोड़ाई में करीब 3 से 4 क्विंटल तक ककड़ी निकल आती है। अगर संख्या के हिसाब से देखा जाए तो यह लगभग 100 से 200 ककड़ियों के बराबर होती है।
वह बताती हैं कि बाजार में मिलने वाले दाम के अनुसार उन्हें रोजाना करीब 500 से 1000 रुपये तक की आमदनी हो जाती है। यह तोड़ाई हर दिन नहीं होती, बल्कि एक दिन छोड़कर की जाती है। वहीं जिन किसानों की फसल ज्यादा अच्छी होती है, उनके खेतों में लगभग रोजाना इसी तरह ककड़ी की पैदावार और बिक्री होती रहती है।
नीचे दी गई तस्वीर में देखा जा सकता है कि खेत में पानी लगा हुआ है और धर्मशिला देवी अपने पति के साथ खेत में बैठी हुई है। दोनों मिलकर ककड़ी की खेती कर रहे हैं। इस बार उनकी फसल काफी अच्छी हुई है।
आगे वह कहती हैं कि “इस समय तेज धूप पड़ने के कारण ककड़ी की बेल तेजी से फैल रही है और फल भी अच्छी मात्रा में आ रहा है। ऐसे में फसल को सही तरीके से बढ़ने के लिए हर एक से दो दिन के अंतराल पर पानी देना जरूरी होता है। खेत में पानी देने का काम मुख्य रूप से महिला ही करती हैं।”
नीचे दी गई तस्वीर में खेतों में क्यारियां बनी हुई दिखाई दे रही हैं, जिनके जरिए खेत में पानी पहुंचाया जाता है। इसके बाद मिट्टी चढ़ाना और फसल की नियमित देखभाल भी की जाती है, जिससे उत्पादन अच्छा हो सके।
मौसम ख़राब होने पर नुकसान
किसानों के लिए खेती करना आसान नहीं होता क्योंकि यह मौसम पर भी निर्भर करता है। बेमौसम बरसात की वजह से उनकी अच्छी खासी फसल ख़राब हो जाती है जिससे उनका काफी नुकसान होता है।
यहां के किसानों ने बताया कि बीते अप्रैल में बारिश का मौसम होने से ककड़ी की फसल को नुकसान पहुंचा है। अधिक पानी पड़ने से पत्ते जल गए हैं और फसल खराब होने लगी है। बेमौसम बारिश ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। पत्ते जल गए, जड़ें सड़ने लगीं और पूरी फसल खतरे में पड़ गई।
नीचे दी गई तस्वीर में एक किसान, पूना बिंद, अपने खेत में खड़े नजर आ रहे हैं। वह बताते हैं कि जिन किसानों ने दिसंबर के आखिरी महीने में प्याज की बुवाई की, उनकी फसल अच्छी हुई और अप्रैल की शुरुआत से ही उसकी कटाई शुरू हो गई। वहीं उन्होंने खुद जनवरी में बुवाई की, जिससे उन्हें नुकसान हुआ और कई बार बीज डालने के बाद भी फसल ठीक से नहीं हो पाई।
वह आगे बताते हैं कि उन्होंने धान की जमीन में ककड़ी की खेती की, लेकिन जगह सही न होने और मार्च में हुई बारिश के कारण फसल प्रभावित हुई। पानी भरने से पौधों की जड़ें खराब हो गईं, कीड़े लग गए और पत्ते पीले पड़ने लगे। अब वे हर दो दिन में पानी देकर फसल को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि उनका गांव लंबे समय से सब्जी की खेती के लिए प्रसिद्ध है। यहां के लोग पीढ़ियों से ककड़ी की खेती करते आ रहे हैं, इसलिए व्यापारी खुद ही यहां आकर फसल खरीद लेते हैं और किसानों को बाजार में बेचने में कोई परेशानी नहीं होती।
ककड़ी खाने से फायदे
हेल्थ लाइन की रिपोर्ट के मुताबिक पोषण विशेषज्ञ जेर्लिन जोन्स ने बताया कि ककड़ी में 90 से 95% तक पानी की मात्रा होती है, जो आपको गर्मी में ठंडा रखता है और आप के शरीर में पानी की कमी को पूरा करता है। इसके साथ ही ककड़ी खाने से ब्लड शुगर कंट्रोल में रहता है, कब्ज नहीं होती और वजन कम करने में भी मदद मिलती है।
ककड़ी सिर्फ गर्मी में ठंडक देने वाली सब्जी नहीं, बल्कि हजारों किसानों की रोजी-रोटी है—जो हर मौसम के साथ जोखिम उठाकर इसे हमारे थाली तक पहुंचाते हैं।
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