खबर लहरिया Blog दो दिनों में दो अग्निकांड: गाजियाबाद में 200, लखनऊ में 1200 झोपड़ियां खाक, हजारों बेघर

दो दिनों में दो अग्निकांड: गाजियाबाद में 200, लखनऊ में 1200 झोपड़ियां खाक, हजारों बेघर

16 अप्रैल 2026 की दोपहर अचानक आग लग गई। इस लगी भीषण आग ने पूरे इलाके में हड़कंप मचा दिया।  वहीं   5 अप्रैल 2026 की शाम उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ विकास नगर, सेक्टर-12 रिंग सड़क किनारे के बस्ती में भी भयंकर आग लगने की खबर सामने आई।  

आग लगने से उठते धुएँ (फोटो साभार: जागरण)                                 

बीते दो दिन में उत्तर प्रदेश से दो बड़ी घटना सामने आई जिसने कई परिवारों को बेघर कर दिया। बच्चों से किताबें छिन गईं, लोगों के मेहनत के पैसे जल गए। 

दरअसल उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके के कनावनी में 16 अप्रैल 2026 की दोपहर अचानक आग लग गई। इस लगी भीषण आग ने पूरे इलाके में हड़कंप मचा दिया। एक खाली प्लॉट पर बनी झुग्गियों में आग इतनी तेजी से फैली कि देखते ही देखते करीब 200 झुग्गियां जलकर खाक हो गईं और करीब 125 परिवारों के सिर से छत छिन गई।

आग की लपटें इतनी तेज थीं कि दूर तक उसकी गर्मी महसूस हो रही थी वहीं एक के बाद एक 50 से ज्यादा गैस सिलेंडर फटने से हालात और डरावने हो गए। मौके पर भगदड़ जैसी स्थिति बन गई। लोग अपने बच्चों और जरूरी सामान को बचाने के लिए इधर-उधर भागते दिखे। 

शुरुआत में करीब छह बच्चों के लापता होने की खबर से लोगों की चिंता बढ़ गई थी लेकिन बाद में सभी बच्चे मिल गए कुछ भीड़ में बिछड़ गए थे तो कुछ दूर खेलते मिले लेकिन आग ने पूरे इलाके को तबाह कर दिया है। 

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आग लगने की खबर मिलते ही आसपास के लोगों द्वारा तुरंत पुलिस और फायर ब्रिगेड को सूचना दी गई जिसके बाद दमकल की कई गाड़ियां मौके पर पहुंचीं और आग बुझाने का काम शुरू किया गया। 

इस पूरे हादसे में सबसे बड़ी राहत की बात यह रही कि किसी के हताहत होने की खबर नहीं है क्योंकि ज्यादातर लोग समय रहते बाहर निकल गए थे। हालांकि आग की वजह से कई परिवारों का सारा सामान जलकर खत्म हो गया। अभी तक आग लगने की सही वजह सामने नहीं आई है और पुलिस इस एंगल से भी जांच कर रही है। 

लखनऊ अग्निकांड 

वहीं 15 अप्रैल 2026 की शाम उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ विकास नगर, सेक्टर-12 रिंग सड़क किनारे के बस्ती में भी भयंकर आग लगने की खबर सामने आई।अमर उजाला की रिपोर्ट अनुसार आग ने 1200 झोपड़ियों को अपनी चपेट में ले लिया। आग लगने के दौरान लोगों के झोपड़ियों में रखे करीब 100 गैस सिलेंडर भी फटे। 

विकासनगर सेक्टर-12 के मिनी स्टेडियम के पास करीब तीन बीघा खाली जमीन पर लोग कई सालों से झोपड़ियां बनाकर रह रहे थे। 15 अप्रैल को भी रोज की तरह सब कुछ सामान्य था और लोग अपने-अपने काम में लगे हुए थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उसी इलाके के मंशीपुलिया से आगे रिंग रोड के पास एक खाली भूखंड में दोपहर में आग लगी थी जो तेज हवाओं की वजह से पास की झुग्गी बस्तियों तक फैल गई। झुग्गियों में मौजूद ज्वलनशील सामान के कारण आग ने देखते ही देखते विकराल रूप ले लिया और कई घरों में रखे सिलेंडरों में धमाके भी होने लगे। आग का धुआं और लपटें कई किलोमीटर दूर तक दिखाई दीं जिससे आसपास के इलाकों में दहशत फैल गई। लोग कुछ समझ पाते उससे पहले ही आग सैकड़ों झुग्गियों को अपनी चपेट में ले चुकी थी और पूरा आसमान धुएं से भर गया था।

आग लगते ही वहां मौजूद लोगों ने अपने स्तर पर उसे बुझाने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो पाए। लोगों का आरोप है कि उन्होंने मदद के लिए पुलिस कंट्रोल रूम में फोन किया मगर शुरुआत में कॉल नहीं लग पाई बाद में किसी तरह संपर्क हुआ और सूचना दी गई। आरोप है कि सूचना देने के करीब एक घंटे बाद पुलिस और दमकल की गाड़ियां मौके पर पहुंचीं तब तक आग काफी भयानक रूप ले चुकी थी और एक के बाद एक झोपड़ियां तेजी से जलने लगीं।  

NDTV के रिपोर्ट अनुसार रेश्मा नाम की एक महिला जो नौ महीने की गर्भवती हैं वे अपने पति रंजित के साथ वहां रहती थीं। जब आग लगी तो रेश्मा अपने घर के अंदर थी। रेश्मा की आवाज सुनने पर रंजित ने कैसे भी रेश्मा को आग से बाहर सुरक्षित जगह में लाया। दोनों बच गए लेकिन उनकी मेहनत की पूरी कमाई जल गई। पैसे, कपड़े, गहने, बर्तन सब कुछ जल गया। वे कहते हैं अब ज़िंदगी दोबारा कैसे शुरू करें? तन में चढ़े कपड़ों के अलावा उनके पास कुछ भी नहीं बचा। 

घटना के बाद योगी आदित्यनाथ ने संज्ञान लेते हुए राहत और बचाव कार्य तेज करने के निर्देश दिए हैं वहीं डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक भी मौके पर पहुंचे और हालात का जायजा लिया। अब आग लगने के कारणों की जांच की जा रही है। 

सवाल ये भी है कि आखिर बार-बार आग का शिकार वही झुग्गी बस्तियां क्यों बनती हैं, जहां दूसरे शहरों से आकर मजदूरी करने वाले लोग रहते हैं? क्या इन इलाकों में सुरक्षा को लेकर लापरवाही ज्यादा है या फिर इन्हें नजरअंदाज किया जाता है? क्यों ऐसी बस्तियों में रहने वाले लोगों के लिए न तो पक्के इंतजाम होते हैं और न ही कोई ठोस सुरक्षा योजना?

 

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