यूपी के शिक्षामित्रों को अब अप्रैल 2026 से 18 हजार रुपये मानदेय मिलना शुरू हो जाएगा। इस प्रस्ताव को मंजूरी आज मंगलवार 7 अप्रैल को कैबिनेट की बैठक में चर्चा के बाद मिली। इससे पहले इसकी घोषणा 4 अप्रैल 2026 को यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी के शिवपुर कंपोजिट विद्यालय में “स्कूल चलो अभियान” के कार्यक्रम के दौरान की थी। एक तरह से खुशी की बात है कि वेतन बढ़ा है लेकिन इस बढ़ोतरी से शिक्षामित्र नाखुश है। शिक्षामित्रों का कहना है कि जिस तरह से महंगाई बढ़ रही है ऐसे में इतने वेतन में महीने भर घर चलाना मुश्किल है।
रिपोर्ट – सुशीला, लेखन – सुचित्रा
मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि राज्य के करीब 1.42 लाख शिक्षामित्रों और 24 हजार अनुदेशकों का मानदेय बढ़ाया जाएगा। अब शिक्षामित्रों को 18,000 रुपये और अनुदेशकों को 17,000 रुपये प्रति माह मिलेंगे। इससे पहले शिक्षामित्रों को 10,000 रुपये और अनुदेशकों को 9,000 रुपये मिलते थे। इससे पहले मुख्यमंत्री ने 26 फरवरी 2026 को विधानसभा के बजट सत्र में ही वेतन बढ़ाने का संकेत दिया था, जिसे अब लागू किया जा रहा है। प्रदेश के शिक्षामित्रों के मानदेय वृद्धि की घोषणा सीएम योगी ने की थी। शिक्षा मंत्री ने कहा कि भाजपा सरकार ने दो बार शिक्षामित्रों के मानदेय में वृद्धि की है। योगी सरकार बनने के बाद वर्ष 2017 में शिक्षामित्रों का मानदेय 3500 रुपये से बढ़ाकर 10 हजार रुपये प्रतिमाह किया गया था। इसे अब 18 हजार रुपये किया जा रहा है।
शिक्षामित्र का वेतन के लिए संघर्ष
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में शिक्षामित्रों की नियुक्ति 2001 से शुरू हुई थी। सपा सरकार ने 2013-14 में शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक के पद पर समायोजित किया था। लेकिन कुछ लोगों ने इसके खिलाफ अदालत में याचिका दायर की। 12 दिसंबर 2015 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समायोजन रद्द कर दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 25 जुलाई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने भी समायोजन रद्द कर दिया। इसके बाद करीब 1.72 लाख शिक्षामित्र फिर से अपने पुराने पद पर लौट आए। उनका वेतन, जो पहले करीब 50,000 रुपये था, घटकर 3,500 रुपये मानदेय रह गया।
वेतन बढ़ाने के लिए किया आंदोलन
शिक्षामित्रों ने इसके विरोध में प्रदेशभर के शिक्षामित्रों ने लखनऊ में आंदोलन किया। आंदोलन के बाद सरकार ने मानदेय बढ़ाकर 3,500 रुपये से 10,000 रुपये प्रति माह करने की घोषणा की साथ ही, शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक बनने का मौका देने के लिए 68,500 पदों की भर्ती निकाली गई। इस भर्ती में शिक्षामित्रों को आयु सीमा में छूट और बोनस अंक भी दिए गए। इन दोनों भर्तियों में मिलाकर करीब 13,000 से अधिक शिक्षामित्र सहायक अध्यापक बनने में सफल रहे।
2017 में भाजपा सरकार ने शिक्षामित्रों की समस्या का समाधान करने का वादा किया था। प्रदेश के परिषदीय स्कूलों में करीब 1.42 लाख शिक्षामित्र कार्यरत हैं। सरकार का कहना है कि शिक्षामित्रों की पर्याप्त संख्या होने के कारण फिलहाल नए सहायक अध्यापकों की भर्ती की आवश्यकता नहीं है। शिक्षा मंत्री ने भी स्पष्ट किया है कि वर्तमान स्थिति को देखते हुए अभी नई सहायक शिक्षक भर्ती की जरूरत नहीं है।
घोषणा पर नहीं, पैसे आने पर भरोसा – शिक्षामित्र
वाराणसी में मुख्यमंत्री योगी द्वारा शिक्षामित्रों का मानदेय 18,000 रुपये करने की घोषणा के बाद भी कई शिक्षामित्रों को अभी भी भरोसा नहीं है। उनका मानना है कि घोषणा कर दी गई है लेकिन जब खाते में पैसे आएंगे तभी वह मानेंगे।
वाराणसी जिले के हरहुआ ब्लॉक के मुर्दहाँ प्राथमिक विद्यालय में कार्यरत शिक्षामित्र सरिता सिंह (नियुक्ति 2002) का कहना है कि ऐसी घोषणाएं पहले भी कई बार हो चुकी हैं लेकिन जब तक पैसा खाते में नहीं आता, तब तक विश्वास करना मुश्किल है। उन्होंने बताया कि समय-समय पर मानदेय बढ़ता रहा। पहले 1,500 रुपये से शुरू होकर 2,250, फिर 2,400, 3,500 और 2014 में 10,000 रुपये हुआ। 2017 में सहायक अध्यापक बनने के बाद कुछ समय के लिए अधिक वेतन मिला, लेकिन कोर्ट के फैसले के बाद फिर से शिक्षामित्र बना दिया गया और मानदेय वापस 10,000 रुपये हो गया, जो अब तक चल रहा है। काम तो बहुत है लेकिन जब तक घोषणा का लाभ वास्तव में नहीं मिलता, तब तक भरोसा करना मुश्किल है।
18,000 रुपए मानदेय से नाखुश
सरिता सिंह बताती हैं कि उन्होंने बीए और बीटीसी तक की पढ़ाई की है। परिवार से ज्यादा आर्थिक सहयोग नहीं मिलता, ऐसे में तीन बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और उनका पालन-पोषण करना इस महंगाई में काफी मुश्किल हो रहा है।
उनका कहना है कि उनसे काम तो बहुत लिया जाता है, लेकिन मेहनत के मुताबिक मानदेय नहीं मिलता। वे बताती हैं कि जब उन्हें 2,250 रुपये मानदेय मिलता था, तभी से वे इसके बढ़ाने की मांग कर रही हैं। आज भी हालात ऐसे हैं कि महंगाई इतनी हो गई है, बच्चो की पढ़ाई बाकि जरूरतों में काफी खर्च है। ऐसे में 18,000 रुपए में घर नहीं चल पाएगा।
अनुराधा कुशवाहा का कहना है कि उनकी नियुक्ति वर्ष 2013 में हुई थी। उस समय उन्हें 7,000 रुपये मानदेय मिलता था, जो 2017 में बढ़कर 9,000 रुपये हो गया। साथ ही, वह यह भी बताती हैं कि नौकरी का डर होने की वजह से वे खुलकर न तो किसी की आलोचना कर सकती हैं और न ही अपनी बात खुलकर रख पाती हैं।
कम से कम 30,000 रुपए वेतन की मांग
वाराणसी जिले के चोलापुर ब्लॉक के सुगुलपुर ग्राम सभा के प्राथमिक विद्यालय में कार्यरत शिक्षामित्र संतोष कुमार यादव बताते हैं कि उनकी नियुक्ति वर्ष 2002 में हुई थी। उन्होंने बताया कि शुरुआत में उन्हें बहुत कम मानदेय मिलता था। समय-समय पर सरकारों ने इसमें बदलाव किया। प्रशिक्षण के बाद एक समय ऐसा भी आया जब सहायक अध्यापक बनने पर उन्हें करीब 43,000 रुपये तक वेतन मिला। लेकिन बाद में कोर्ट के फैसले के बाद फिर से शिक्षामित्र बना दिया गया और मानदेय कम हो गया।

चोलापुर ब्लॉक के सुगुलपुर ग्राम सभा के प्राथमिक विद्यालय में कार्यरत शिक्षामित्र संतोष कुमार यादव (फोटो साभार: सुशीला)
संतोष यादव का कहना है कि पिछले कई वर्षों से वे 10,000 रुपये मानदेय पर काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि 18,000 रुपये से कुछ राहत जरूर मिलेगी, लेकिन यह अभी भी पर्याप्त नहीं है। काम का दबाव बहुत ज्यादा है और छुट्टियां भी कम मिलती हैं। उन्होंने मांग की कि शिक्षामित्रों का मानदेय कम से कम 30,000 रुपये होना चाहिए, ताकि वे अपने परिवार का ठीक से पालन-पोषण कर सकें। साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार को अपने वादों को लिखित रूप में लागू करना चाहिए, क्योंकि पहले भी कई बार आंदोलन हो चुके हैं और कई शिक्षामित्रों को भारी मानसिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा है।
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