उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले के शंकरगढ़ क्षेत्र का जनवा मजरा लेदर गांव समस्या से जूझ रहा है। यह इलाका पहाड़ी और पथरीला है जहां पानी की कमी हर साल देखने को मिलती है। गांव में तीन तालाब मानू तालाब, मौहरा तालाब और आमगोदर तालाब और दो बांध (मोंगरा बांध) हैं लेकिन ज्यादातर तालाब गर्मी आते ही सूख जाते हैं। मानू तालाब को हाल ही में अमृत सरोवर योजना के तहत सुंदर बनाया गया है अच्छी तरीके से बनया गया है लेकिन उसमें भी पानी नहीं टिक पा रहा।
रिपोर्टिंग – सुनीता देवी, लेखन – रचना
गर्मी शुरू होते ही लोगों की सबसे बड़ी चिंता पानी बन जाती है। खासकर ग्रामीण इलाकों में हालात और भी खराब हो जाते हैं। तालाब, कुएं और हैंडपंप सूखने लगते हैं जिससे लोगों की पानी के लिए भटकते पड़ता हैं। कई जगहों पर हाल ये है कि हैंडपंप को आधे घंटे तक चलाने के बाद भी मुश्किल से थोड़ा पानी निकलता है।
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले के शंकरगढ़ क्षेत्र का जनवा मजरा लेदर गांव भी इसी समस्या से जूझ रहा है। यह इलाका पहाड़ी और पथरीला है जहां पानी की कमी हर साल देखने को मिलती है। गांव में तीन तालाब मानू तालाब, मौहरा तालाब और आमगोदर तालाब और दो बांध (मौहरा बांध, आमगोदर बांध) हैं लेकिन ज्यादातर तालाब गर्मी आते ही सूख जाते हैं। मानू तालाब को हाल ही में अमृत सरोवर योजना के तहत सुंदर बनाया गया है अच्छी तरीके से बनया गया है लेकिन उसमें भी पानी नहीं टिक पा रहा।
गांव के हरिश्चंद्र बताते हैं कि तालाब एक महीने पहले ही सूख गया। अब हाल ये है कि इंसान ही नहीं जानवर भी पानी के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं।
दूसरी तरफ सरकार की नल योजना भी लोगों के लिए राहत नहीं बन पा रही है। कई जगहों पर नलों में पानी ही नहीं आता जिससे लोगों को मजबूरन मीलों दूर जाकर पानी लाना पड़ता है। सोचने वाली बात है कि जब हर साल यही समस्या दोहराई जाती है तो इसका स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाला जा रहा? क्या सिर्फ योजनाओं का एलान करना ही काफी है या जमीन पर भी कुछ बदलाव देखने को मिलेगा? सवाल ये भी है कि जब गर्मी की अभी शुरुआत में ही ये हालत है तो मई-जून की भीषण गर्मी में लोग क्या करेंगे?
पानी के लिए भटकते लोग और जानवर
खबर लहरिया टीम ने गांव में जाकर लोगों से बात की जिसमें गांव की एक महिला रोशनी बताती हैं कि हाल ही में तालाब का अमृत सरोवर योजना के तहत सुंदरकरण हुआ है लेकिन उसमें पानी ही नहीं है। उनका कहना है कि अगर सिर्फ सजाने के बजाय तालाब की और खुदाई कर दी जाती तो शायद पानी टिक पाता। अभी हाल ये है कि तालाब सूखा पड़ा है और जानवर प्यासे भटक रहे हैं। वे कहती हैं कि जानवरों की मौत भी होती है तालाब के पास तीन मरे हुए जानवर पड़े हैं। वे कहती हैं “अगर तालाब में पानी होता तो लोग नहाते, कपड़े धोते और गर्मी से थोड़ी राहत मिलती। हैंडपंप खराब हो जाए तो भैंस और गाय को पानी पिलाने के लिए एक किलोमीटर दूर दूसरे पुरवा जाना पड़ता है कई-कई दिन बिना नहाए रहना पड़ता है।”
बीते समय में भरा रहता था तालाब, अब 20 साल से सूखा
उसी गांव के रहने वाले 71 साल के बुजुर्ग देवराज बताते हैं कि मानू तालाब करीब पांच बीघा में फैला हुआ है और पहले आज से लगभग पांच छह साल पहले इसमें सालभर पानी रहता था। जब रिश्तेदार आते थे तो लोग इसी तालाब में नहाते थे लेकिन पिछले 20 सालों से इसमें पानी नहीं ठहरता क्योंकि अब बारिश भी पहले जैसी नहीं होती। गांव में तीन तालाब हैं और तीनों सूखे पड़े हैं। उनका कहना है कि अगर प्रशासन कहीं से पानी भरवा दे या तालाब में बोरिंग करवा दे तो लोगों और जानवरों को राहत मिल सकती है। वे कहते हैं कि अगर पानी का कोई स्थायी स्रोत बन जाए तो गांव की जिंदगी आसान हो सकती है।
बुजुर्ग देवराज की मांग है कि जब विकास कार्यों पर पैसा खर्च हो रहा है तो उसी बजट से तालाब में पानी भरवाने की व्यवस्था भी की जाए। उनका कहना है कि तालाब करीब चार बीघा में फैला है और आठ फीट गहरा है अगर इसमें बोरिंग कर दी जाए या मछली पालन के नाम पर पानी भर दिया जाए तो इंसान और जानवर दोनों को राहत मिलेगी। उन्होंने बताया कि उनके पास सात गाय और एक भैंस थी लेकिन पानी की कमी के कारण एक भैंस बेचनी पड़ी और उसी पैसे से बोर करवाना पड़ा।
पानी की कमी से जानवरों पर भी संकट
वहीं उदयराज बताते हैं कि उनके पास पांच गाय-बैल और दो भैंस हैं जिन्हें अभी हैंडपंप से पानी पिलाते हैं लेकिन उनका कहना है कि एक महीने बाद हालात और खराब हो जाएंगे तब जानवरों को खुला छोड़ना पड़ेगा।
जानवर हैंडपंप या कुएं के पास कीचड़ चाटकर प्यास बुझाने की कोशिश करते हैं। अगर पानी नहीं मिला तो उनकी मौत हो सकती है। यह पूरा इलाका पहाड़ी और पथरीला है जहां तालाब, कुएं और हैंडपंप का जलस्तर नीचे चला गया है। उनका का आरोप है कि प्रशासन की तरफ से कभी भी तालाब में पानी भरवाने की कोशिश नहीं की गई।
विकास दिख रहा है, लेकिन पानी नहीं
रानी कहती हैं कि “तालाब के नाम पर विकास तो दिख रहा है लेकिन जब उसमें पानी ही नहीं है तो लोग वहां क्यों जाएंगे? गर्मी में कोई राहत नहीं मिलती फिर इतना बजट खर्च करने का क्या फायदा?” उनका कहना है कि पूरे इलाके के गांवों में यही हाल है सभी तालाब सूख गए हैं। अगर पानी की व्यवस्था नहीं हुई तो और भी जानवरों की मौत हो सकती है।
सुनीता भी बताती हैं कि बाहर से तालाब को अच्छा बना दिया गया है लेकिन अंदर से पूरी तरह सूखा है। कभी थोड़ा पानी आता भी है तो पास की कंपनियों का गंदा पानी उसमें मिल जाता है जिससे वह पीने लायक नहीं रहता। वे आरोप लगाती हैं कि अधिकारियों और प्रधान तक लोगों की समस्या पहुंचती ही नहीं और गरीबों की बात कोई नहीं सुनता।
गांव वालों की मांग, तालाब में पानी भरवाया जाए
गांव के हरीशचंद्र बताते हैं कि मानू तालाब का हाल भी यही है बरसात का पानी कुछ महीनों तक रहता है फिर सूख जाता है। मजबूरी में लोग और जानवर गंदा पानी पीते हैं जिससे उनके तीन जानवर मर चुके हैं। वे कहते हैं कि अगर तालाब में पानी रहता तो लोग बोरिंग या बोर क्यों करवाते? जिनके पास पैसे हैं वे तो करवा लेते हैं लेकिन गरीबों के पास कोई विकल्प नहीं है। गांव में नल की भी कोई व्यवस्था नहीं है। उनके पास इसी पानी को इस्तेमाल करने के अलावा और कोई चारा नहीं है।
प्रशासन और अधिकारियों का क्या कहना है?
प्रधान सुषमा देवी के प्रतिनिधि (पति) कृष्ण कुमार बताते हैं कि गांव में तीन तालाब हैं मानू, मौहरा और आमगोदर। दो बांध भी हैं लेकिन इस समय सभी सूखे हैं। मानू तालाब का निर्माण अमृत सरोवर और मनरेगा योजना से करीब 12 लाख रुपये में हुआ था। गांव की आबादी करीब 4000 है। लोगों के लिए सोलर पंप और हैंडपंप तो हैं लेकिन जानवरों के लिए पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। उन्होंने कहा कि उन्होंने ब्लॉक में तालाब में पानी भरवाने की मांग भी की है।
प्रधान प्रतिनिधि ने माना कि अभी कोई ठोस व्यवस्था नहीं है सिर्फ हैंडपंप और बोरिंग पर काम चल रहा है और नहर की मांग की जा रही है।
इस पर एडीओ पंचायत दशरथ लाल का कहना है कि उनके ब्लॉक में 76 गांव हैं जिनमें से जिन तालाबों के पास नहर है उनमें पानी है लेकिन करीब 25 गांव ऐसे हैं जहां नहर नहीं है और वहां के तालाब सूखे हैं। उन्होंने कहा कि जल्द सर्वे करवाकर तालाबों में पानी भरवाने की व्यवस्था की जाएगी।
मनरेगा अधिकारी जयप्रकाश बताते हैं कि ब्लॉक में कुल 76 गांव हैं और कई तालाब मनरेगा के तहत बने या सुधारे गए हैं जैसे मानू तालाब लेकिन विभाग में तालाब में पानी भराने की कोई योजना नहीं है हालांकि अब सर्वे कर यह देखा जाएगा कि कहां पानी है और कहां नहीं।
यह खबर साफ दिखाती है कि गांवों में पानी की समस्या सिर्फ मौसम की नहीं है इसमें व्यवस्था की भी है। एक तरफ तालाबों का सुंदरकरण हो रहा है लेकिन उनमें पानी नहीं है। दूसरी तरफ नल योजनाएं भी लोगों को राहत नहीं दे पा रही हैं। नतीजा यह है कि लोग और जानवर दोनों पानी के लिए भटक रहे हैं यहां तक कि कई जानवरों की जान भी जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब हर साल यही हाल होता है तो इसका स्थायी हल क्यों नहीं निकाला जाता? क्या सिर्फ योजनाओं का एलान और बजट खर्च करना ही काफी है या जमीन पर पानी की असली व्यवस्था भी की जाएगी? अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में यह संकट और गहराएगा और सबसे ज्यादा असर गरीब और ग्रामीण लोगों पर ही पड़ेगा।
यदि आप हमको सपोर्ट करना चाहते है तो हमारी ग्रामीण नारीवादी स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थन करें और हमारे प्रोडक्ट KL हटके का सब्सक्रिप्शन लें’





