अगस्त का महीना किसानों के लिए बड़ी मुसीबत लेकर आया है। लगातार हो रही बारिश से जहां यूपी के कई जिले बाढ़ से प्रभावित हुए हैं, वहीं इस बारिश ने कई किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचाया है। महोबा, बाँदा, वाराणसी और प्रयागराज में भी लगातार बारिश ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। लगातार हुई बारिश से हुए नुकसान को लेकर खबर लहरिया रिपोर्टिंग कर रही है।
रिपोर्ट – सुनीता, लेखन – सुचित्रा
यूपी के प्रयागराज से फसल खराब होने की खबर सामने आई, जहां जसरा ब्लॉक और बारा तहसील क्षेत्र के कई गांवों में खेतों में 15 दिन तक पानी भरा रहने से धान की फसल सड़कर बर्बाद हो गई। पहाड़ी इलाकों से आने वाला बारिश का पानी भी खेतों में जमा हो रहा है। जलनिकासी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण पानी लंबे समय तक खेतों में ठहरा रहा, जिससे खड़ी फसल गल गई।
बारा क्षेत्र में बड़ी संख्या में किसान धान की खेती पर निर्भर हैं। ऐसे में फसल बर्बाद होने का सीधा असर उनके परिवार की आर्थिक स्थिति पर पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि खेती में पहले ही हजारों रुपये खर्च हो चुके हैं। अब फसल नष्ट होने के बाद लागत वापस मिलने की उम्मीद भी खत्म हो गई है।
दो बीघा धान की फसल बर्बाद
बारा क्षेत्र की किसान गुड़िया ने बताया कि उनकी करीब दो बीघा धान की फसल पूरी तरह पानी में डूब गई। खेत के पास स्थित केवटिनिया तालाब का पानी भी खेत में भर गया था। करीब 15 दिनों तक पानी भरा रहने के कारण धान की पूरी फसल सड़ गई।
किसानों के मुताबिक आसपास के कई गांवों में भी इसी तरह के हालात हैं। यमुना किनारे बसे सिंघपुर, घूरी समेत करीब 25 गांवों में बाढ़ के पानी से खेत प्रभावित हुए हैं। किसानों का दावा है कि आसपास के क्षेत्र में करीब 50 प्रतिशत तक धान की फसल खराब हो चुकी है।
हजारों रुपये की लागत, मेहनत बेकार
किसान बुल्ला ने बताया कि एक बीघा खेत की जुताई में करीब 1,200 रुपये खर्च होते हैं। इस बार उनके खेत की तीन बार जुताई हुई। इसके अलावा धान की रोपाई में करीब 6,000 रुपये प्रति बीघा खर्च आया। खाद, बीज और अन्य कृषि लागत जोड़ने के बाद एक बीघा में करीब 10 हजार रुपये या उससे अधिक खर्च हो गया।
उन्होंने बताया कि उनके 10 बीघे खेत में पांच बीघे की धान की फसल पानी में डूबकर बर्बाद हो गई। एक बीघे में सामान्य तौर पर करीब 18 क्विंटल धान की पैदावार होती है। ऐसे में फसल खराब होने से किसान को सिर्फ लगाई गई रकम का ही नुकसान नहीं हुआ, बल्कि संभावित उपज और उससे होने वाली आमदनी भी चली गई।
किसानों का कहना है कि खेती की कमाई से ही घर का राशन, बच्चों की पढ़ाई, दवा, शादी-विवाह और दूसरे जरूरी खर्च पूरे होते हैं। ऐसे में फसल बर्बाद होने का असर पूरे परिवार पर पड़ता है।
दोबारा धान बोना भी मुश्किल
शांति ने बताया कि पानी निकलने के बाद भी किसानों की परेशानी खत्म नहीं हुई है। खेत में लंबे समय तक पानी भरे रहने से धान की फसल खराब हो चुकी है और अब दोबारा रोपाई के लिए पौध यानी बेहन भी आसानी से उपलब्ध नहीं है।
अगर किसान दोबारा धान की रोपाई करते हैं तो उन्हें फिर से जुताई, बीज, खाद और मजदूरी पर पैसा खर्च करना पड़ेगा। वहीं देर से धान लगाने पर पैदावार कम होने की आशंका है। इससे अगली फसल की बुवाई भी प्रभावित होगी।
शांति के परिवार की आर्थिक स्थिति खेती पर निर्भर है। गर्मी में बेटी की शादी है। उनका कहना है कि अगर इस बार धान की फसल अच्छी होती तो शादी के खर्च में मदद मिलती, लेकिन फसल खराब होने से अब आगे का खर्च जुटाना चुनौती बन गया है। उन्होंने बताया कि उन्होंने बासमती धान लगाया था, जिसकी फसल खराब होने के बाद परिवार को चावल भी बाजार से खरीदना पड़ेगा।
किसानों की मांग- खेतों का सर्वे हो
ग्रामीणों के मुताबिक सेहुड़ा, सिकरी और छीड़ी समेत बारा क्षेत्र के कई गांवों में बाढ़ के अलावा पहाड़ी इलाकों से आने वाले बारिश के पानी ने भी फसलों को नुकसान पहुंचाया है। कई खेतों में कई दिनों तक पानी जमा रहा। इससे धान की फसल गल गई।
किसानों के अनुसार बारा क्षेत्र में करीब 100 बीघा तक धान की फसल जलभराव से प्रभावित हुई है। किसानों की मांग है कि प्रशासन केवल नदी की बाढ़ से प्रभावित खेतों का ही नहीं, बल्कि बारिश के पानी से जलमग्न होकर खराब हुई फसलों का भी सर्वे कराए।
किसानों का कहना है कि राजस्व और कृषि विभाग की संयुक्त टीम गांवों में जाकर खेतों का स्थलीय निरीक्षण करे। प्रत्येक किसान की कितनी जमीन में फसल थी, कितने दिनों तक खेत में पानी भरा रहा और कितनी फसल खराब हुई, इसका रिकॉर्ड तैयार किया जाए।
विनोद ने कहा कि अगर समय रहते नुकसान का आकलन हो जाए तो प्रभावित किसानों को सरकारी सहायता और फसल क्षति का मुआवजा मिल सकता है। किसानों का कहना है कि उन्होंने कर्ज और अपनी जमा पूंजी लगाकर खेती की थी। अब फसल बर्बाद होने के बाद अगली खेती की तैयारी के साथ परिवार का खर्च चलाना भी मुश्किल हो रहा है।
प्रशासन ने सर्वे के लिए टीम गठित की
बारा तहसील के कानूनगो राजकुमार पाठक ने बताया कि तहसील स्तर पर सर्वे के लिए टीम गठित की गई है। यमुना किनारे के सिंघपुर क्षेत्र में बाढ़ से फसल नुकसान का सर्वे चल रहा है। सभी लेखपालों को अपने-अपने क्षेत्र में फसल नुकसान का सर्वे कर सूची तहसील में जमा करने के निर्देश दिए गए हैं।
उन्होंने बताया कि फसल क्षति के मुआवजे के लिए निर्धारित नियमों के अनुसार सिंचित भूमि (सिंचित भूमि का मतलब है ऐसी जमीन, जहां फसल की सिंचाई के लिए पानी की व्यवस्था उपलब्ध हो।) पर 8,500 रुपये और असिंचित भूमि पर 17,000 रुपये की सहायता का प्रावधान है। हालांकि वास्तविक नुकसान का आकलन सर्वे पूरा होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
बाँदा में तिल की फसल बर्बाद
इस साल हुई लगातार बारिश का असर किसानों की तिल की फसल पर भी पड़ा है। किसानों को उम्मीद थी कि फसल तैयार होने पर इससे लाखों रुपये की आमदनी होगी, लेकिन बारिश ने उनकी मेहनत और लागत दोनों पर पानी फेर दिया। किसानों का कहना है कि अब बीज और खेती में लगी लागत तक वापस मिलना मुश्किल है। फसल बर्बाद होने के बाद किसान आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए सरकार से मुआवजे की मांग कर रहे हैं।
महोबा में बारिश से तिल-मूंग-उड़द की फसल बर्बाद
खबर लहरिया की 5 सितम्बर के लाइव में महोबा जिले के कुलपहाड़ क्षेत्र में लगातार हो रही बारिश से किसान परेशान नज़र आए। वहां मौजूद रिपोर्टर ने किसानों से बातचीत की। किसानों ने बताया दिन-रात बारिश होने के कारण खेतों में खड़ी तिल, मूंग और उड़द की फसल को भारी नुकसान हुआ है।
किसानों का कहना है कि पहले बारिश न होने से सूखे की चिंता थी, लेकिन अब लगातार बारिश ने तैयार फसल को बर्बाद कर दिया है। कई किसानों के सामने घर का खर्च चलाने का संकट खड़ा हो गया है। किसानों को उम्मीद है कि सरकार नुकसान का सर्वे कराकर आर्थिक मदद देगी।
वाराणसी में बाढ़ के पानी में डूबी खेती
वाराणसी जिले के चौबेपुर क्षेत्र के धौरहरा और आसपास के इलाकों में बाढ़ के पानी से खेती पूरी तरह प्रभावित हो गई है। खेतों में ज्वार, धान के खेतों में पानी भरने से फसलें डूब गई हैं और अब किसानों को पशुओं के चारे की चिंता सताने लगी है। ग्रामीणों का कहना है कि पानी सड़कों तक पहुंच गया, लेकिन अभी तक प्रशासन की ओर से कोई देखने नहीं आया।
किसानों का कहना है कि सरकारी मुआवजा उनकी पूरी लागत और संभावित आमदनी की भरपाई शायद न कर पाए, लेकिन नुकसान के बाद यह राहत अगली खेती और परिवार के जरूरी खर्चों में कुछ सहारा जरूर दे सकती है।
अब किसानों की नजर प्रशासन के सर्वे और मिलने वाली सहायता पर टिकी है। वैसे तो सरकार ऐसे समय में किसानों की नुकसान फसल के मुआवजे की भी बात करती है लेकिन इसके बावजूद बहुत से किसानों को मुआवजा नहीं मिल पाता है।
बारिश की सबसे अधिक मार किसानों पर ही पड़ती है। वे दिन रात इसलिए मेहनत करते हैं कि एक दिन उनकी मेहनत उनकी गरीबी, उनके दुःखों को कुछ हद तक कम कर देगी। लेकिन बारिश और बाढ़ हर साल उन्हें इसी गरीबी में जीने को मजबूर कर देती है। किसान खेती के लिए कर्जा लेते हैं और समय पर फसल पूरी न होने पर यह कर्जा और बढ़ जाता है ऐसे में उन्हें निराशा के अलावा कुछ हाथ नहीं लगता।
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