खबर लहरिया Blog Politics in Education: किताबों की गलतियां, बदलते पाठ्यक्रम शिक्षा में बदलाव है या खिलवाड़?  

Politics in Education: किताबों की गलतियां, बदलते पाठ्यक्रम शिक्षा में बदलाव है या खिलवाड़?  

जब किसी देश की शिक्षा व्यवस्था में बार-बार पेपर लीक, पाठ्यपुस्तकों में गलतियां, पाठ्यक्रमों में विवादित बदलाव और परीक्षाओं में लापरवाही जैसी घटनाएं सामने आने लगें तो सवाल केवल एक गलती का नहीं रह जाता। सवाल यह बन जाता है कि आखिर अपनी आने वाली पीढ़ियों को कैसी शिक्षा दिया का रहा है और उनके भविष्य की जिम्मेदारी कौन और कैसे ले रहा है?

सांकेतिक तस्वीर (फोटो डिज़ाइन क्रेडिट: रचना)

हाल के वर्षों में शिक्षा से जुड़े कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिन्होंने इस चिंता को और गहरा किया है। एक ओर प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ियों और पेपर लीक के आरोप लगातार लगते रहे हैं। दूसरी ओर पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रमों में ऐसे बदलाव किए जा रहे हैं जिन पर इतिहासकारों, शिक्षाविदों और छात्रों के बीच बहस छिड़ी हुई है। उत्तर प्रदेश में मुगल इतिहास से जुड़े हिस्सों को पाठ्यक्रम से हटाने का फैसला हो छत्तीसगढ़ में स्कूल शिक्षा से जुड़े नए प्रयोग हों या ओडिशा की नई पुस्तकों में सामने आई तथ्यात्मक और संपादकीय त्रुटियां ये सभी घटनाएं शिक्षा व्यवस्था की गंभीर चुनौतियों की ओर इशारा करती हैं।

राजस्थान विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की परीक्षा रद्द किए जाने का मामला भी इसी चिंता को बढ़ाता है जहां छात्रों ने प्रश्नपत्र में उत्तर पहले से छपे होने और एआई के इस्तेमाल से तैयार किए जाने के आरोप लगाए। ऐसे में सवाल उठता है कि जब पाठ्यपुस्तकों, परीक्षाओं और पाठ्यक्रमों जैसे शिक्षा के बुनियादी हिस्सों में लगातार विवाद और त्रुटियां सामने आ रही हैं तब इसका असर छात्रों के भविष्य पर क्या पड़ रहा है? क्या शिक्षा का उद्देश्य स्वतंत्र सोच, ज्ञान और समझ विकसित करना है या फिर वह प्रशासनिक और वैचारिक प्रयोगों का माध्यम बनती जा रही है? अब इसे एक-एक कर के विस्तार से जानते हैं और शुरुआत करते हैं हालही में एनसीआरटी की नई कला शिक्षा पाठ्यपुस्तक में सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा डांसिंग गर्ल’ की तस्वीर बदले हुए रूप में प्रकाशित की गई। 

एनसीआरईटी की किताब में डांसिंग गर्ल की बदलती तस्वीर में विवाद 

इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की कक्षा 9 की नई कला शिक्षा पुस्तक मधुरिमा’ चर्चा में रही। इस पुस्तक में सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा ‘डांसिंग गर्ल’ की तस्वीर को बदले हुए रूप में प्रकाशित किया गया था। तस्वीर में प्रतिमा के निर्वस्त्र धड़ को इस तरह संपादित किया गया कि वह वस्त्र पहने हुए दिखाई दे। इस बदलाव पर इसलिए भी सवाल उठे क्योंकि पिछले करीब 25 वर्षों से एनसीईआरटी की अलग-अलग पुस्तकों में यह प्रतिमा अपने मूल स्वरूप में प्रकाशित होती रही है। यह पुस्तक नई शिक्षा नीति (NEP) और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) के तहत शुरू की गई कला शिक्षा श्रृंखला का हिस्सा है जिसकी कक्षा 1 से 9 तक की किताबें जारी की जा चुकी हैं।

फोटो साभार: इंडियन एक्सप्रेस                                        

इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्ट अनुसार डैनिनो ने (इतिहासकार मिशेल डैनिनो- जो एनसीईआरटी की कक्षा 6 की नई सामाजिक विज्ञान किताबों के लिए पाठ्यपुस्तक विकास समिति के प्रमुख थे) ने इस पर सवाल उठाते हुए और इस कदम के पीछे की सोच की आलोचना करते हुए कहा है कि ‘मेरी राय में नग्नता को गलत मानने का विचार विक्टोरियन दौर की पुरानी सोच है। फिर भी हम भारतीय शिक्षा को उपनिवेशवाद से मुक्त करने की बात करते हैं।’

कक्षा 9 की नई पुस्तक में डांसिंग गर्ल की बदली हुई तस्वीर को लेकर मिशेल डैनिनो ने हैरानी जताई। उनका कहना था कि जब उन्होंने यह तस्वीर देखी तो उन्हें पहले विश्वास ही नहीं हुआ कि इतनी प्रसिद्ध ऐतिहासिक कलाकृति को इस रूप में प्रकाशित किया गया है। उनके अनुसार भारतीय कला पर आधारित किसी अध्याय में डांसिंग गर्ल को उसके वास्तविक स्वरूप और मूल आकार में दिखाया जाना चाहिए। उनका मानना है कि किसी ऐतिहासिक वस्तु की आकृति में इस तरह बदलाव करने से उसकी पहचान और मूल स्वरूप प्रभावित होता है।

वहीं प्रतिमा की तस्वीर में धड़ को ढककर दिखाए जाने को लेकर जब एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी से पूछा गया कि क्या इसका संबंध नग्नता से है, तो उन्होंने इससे इनकार करते हुए कहा कि उन्हें नहीं लगता कि इसके पीछे कोई खास वजह रही होगी।

क्या है ‘डांसिंग गर्ल’ प्रतिमा?

‘डांसिंग गर्ल’ सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे प्रसिद्ध पुरातात्विक खोजों में से एक मानी जाती है। यह करीब चार इंच ऊंची कांस्य प्रतिमा मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई थी। इसमें एक युवा लड़की को आत्मविश्वास से भरी मुद्रा में दिखाया गया है। उसके बाल जुड़े में बंधे हुए हैं और हाथों में कई चूड़ियां तथा गले में हार दिखाई देता है। पुरातत्वविदों के अनुसार यह प्रतिमा हड़प्पा सभ्यता की उन्नत धातु निर्माण तकनीक और कलात्मक दक्षता का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसका मूल स्वरूप नई दिल्ली स्थित नेशनल म्यूसियम में सुरक्षित रखा गया है।

ओड़िसा के स्कूली किताबों में 1,600 से ज़्यादा निकली गलतियां  

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत तैयार की गई ओडिशा की कक्षा 1 से 8 तक की नई पाठ्यपुस्तकें भी विवादों में रही हैं। इन पुस्तकों में बड़ी संख्या में त्रुटियां मिलने के बाद शिक्षकों और अभिभावक संगठनों ने चिंता जताई है। समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार किताबों में वर्तनी की गलतियों के साथ-साथ कई तथ्यात्मक त्रुटियां, प्रसिद्ध व्यक्तियों के नामों में गलतियां और गलत तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया है।

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द हिंदू के रिपोर्ट अनुसार ओडिशा प्राथमिक विद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष ब्रह्मानंद महाराणा का कहना है कि पुस्तकों में कई ऐसी गलतियां हैं जो विद्यार्थियों की पढ़ाई को प्रभावित कर सकती हैं। उदाहरण के तौर पर, ओडिशा विधानसभा की जगह कर्नाटक विधानसभा की तस्वीर प्रकाशित कर दी गई। इसी तरह बरहामपुर को एक जिला बताया गया है जबकि वह गंजाम जिले का एक शहर है। संघ के अध्यक्ष ब्रह्मानंद महाराणा के अनुसार, प्रकाशित पुस्तकों में कुल 1,678 त्रुटियां दर्ज की गई हैं जो पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा और संपादन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

ओडिशा प्राथमिक विद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष ब्रह्मानंद महाराणा द्वारा आरोप लगाया गया कि नई पाठ्यपुस्तकों में कुल 1,678 त्रुटियां मौजूद हैं। वहीं न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक गलतियां कक्षा 8 की पुस्तकों में पाई गईं जहां 705 त्रुटियां दर्ज की गई हैं।

किताबों में तथ्यात्मक गलतियों के भी कई उदाहरण सामने आए हैं। इनमें डोंगरिया कोंध जनजाति के निवास क्षेत्र नियमगिरि पहाड़ियों को ओडिशा के बजाय झारखंड में दिखाया गया है। जबकि डोंगरिया कोंध ओडिशा की एक विशेष रूप से कमजोर आदिवासी जनजाति (पीवीटीजी) मानी जाती है और नियमगिरि पहाड़ियां राज्य की पहचान से जुड़ा महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। इन त्रुटियों ने पाठ्यपुस्तकों की तैयारी और जांच प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

राजस्थान में परीक्षा के प्रश्न पत्र के जगह छपे उत्तर 

शिक्षा व्यवस्था में सामने आ रही गड़बड़ियों का एक और उदाहरण राजस्थान विश्वविद्यालय में देखने को मिला। 17 जून 2026 को समाजशास्त्र विभाग के दूसरे सेमेस्टर की ‘इंडियन सोसाइटी’ परीक्षा रद्द करनी पड़ी। छात्रों का आरोप था कि प्रश्नपत्र में प्रश्नों की जगह पहले से लिखे हुए उत्तर छपे हुए थे और इसे कथित तौर पर एआई की मदद से तैयार किया गया था।

वायर के रिपोर्ट अनुसार छात्रों ने बताया कि प्रश्नपत्र मिलते ही गड़बड़ी का पता चल गया जिसके बाद प्रशासन ने सभी प्रश्नपत्र वापस ले लिए और परीक्षा स्थगित कर दी और छात्रों को कहा गया कि इसकी चर्चा बाहर न करें। बाद में विश्वविद्यालय ने परीक्षा 27 जून को दोबारा आयोजित करने की घोषणा की। घटना के बाद छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से पूरे मामले पर जवाब मांगा। छात्र संगठनों का कहना है कि इस तरह की लापरवाही उच्च शिक्षा संस्थानों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

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छत्तीसगढ़ सरकारी स्कूलों तीन समय प्रार्थना, गायत्री मंत्र भी अनिवार्य 

दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा शैक्षणिक सत्र 2026-27 से सरकारी और निजी स्कूलों के लिए नया प्रार्थना कार्यक्रम लागू किया गया है। राज्य शिक्षा विभाग द्वारा जारी निर्देश के अनुसार, 16 जून से छात्रों को दिन में तीन अलग-अलग समय पर सामूहिक प्रार्थना और मंत्र पाठ में शामिल होना होगा।

निर्देश के मुताबिक, स्कूल की शुरुआत राष्ट्रगान, वंदे मातरम्, दीप मंत्र, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र और किसी महापुरुष के जीवन से जुड़ी प्रेरक बातों के सामूहिक पाठ से होगी। दोपहर के भोजन अवकाश के दौरान भजनों का सामूहिक गायन कराया जाएगा। वहीं स्कूल की छुट्टी से पहले छात्रों को राष्ट्रगीत और गायत्री मंत्र का सामूहिक पाठ करना होगा।

राज्य शिक्षा विभाग का कहना है कि पढ़ाई के साथ-साथ छात्रों में अनुशासन, देशभक्ति, नैतिक मूल्यों और भारतीय संस्कृति के प्रति जागरूकता विकसित करना भी जरूरी है। इसी उद्देश्य से यह व्यवस्था लागू की गई है। सरकार ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिया है कि इस कार्यक्रम को स्कूलों में सख्ती से लागू कराया जाए। आदेश का पालन नहीं करने पर संबंधित स्कूल प्रबंधन और प्राचार्यों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।

इसमें विपक्षी दल कांग्रेस द्वारा कहा गया है कि यह नियम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के एजेंडा को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। 

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यूपी बोर्ड और सीबीएसई बोर्ड के सिलेबस किया गया बदलाव 

अगर थोड़ा पीछे मुड़ कर देखा जाए जो शिक्षा में कुछ और भी बदलाव किए गए जैसे उत्तर प्रदेश में शैक्षणिक सत्र 2023-24 से स्कूलों के पाठ्यक्रम में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। इन बदलावों के तहत इतिहास, नागरिक शास्त्र और राजनीति विज्ञान जैसे विषयों के कई अध्याय सिलेबस से हटा दिए गए। सबसे अधिक चर्चा इतिहास की पुस्तकों से मुगल काल से जुड़े अध्यायों को हटाने को लेकर हुई।

कक्षा 12 की इतिहास पुस्तक ‘भारतीय इतिहास के कुछ विषय-द्वितीय’ से ‘शासक और मुगल दरबार’ अध्याय को पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया गया है। वहीं कक्षा 11 की इतिहास पुस्तक से ‘इस्लाम का उदय’, ‘औद्योगिक क्रांति’, ‘संस्कृतियों में टकराव’ और ‘समय की शुरुआत’ जैसे अध्याय हटाए गए हैं।

बदलाव केवल इतिहास तक सीमित नहीं रहे। कक्षा 12 की नागरिक शास्त्र की पुस्तक से ‘अमेरिकी वर्चस्व’ और ‘शीत युद्ध’ से जुड़े पाठ हटाए गए। इसके अलावा ‘स्वतंत्र भारत में राजनीति’ पुस्तक से ‘जन आंदोलनों का उदय’ और ‘एक दल के प्रभुत्व का दौर’ अध्याय भी निकाल दिए गए। कक्षा 10 की पुस्तक ‘लोकतांत्रिक राजनीति-2’ से ‘लोकतंत्र और विविधता’, ‘जनसंघर्ष और आंदोलन’ तथा ‘लोकतंत्र की चुनौतियां’ जैसे अध्याय भी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं रहे। इन बदलावों ने शिक्षा और इतिहास को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। 

सवाल तो है 

इन सभी घटनाओं को एक साथ देखें तो यह केवल कुछ अलग-अलग मामलों की कहानी नहीं है। यह देश की शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई गंभीर सवाल और सच्चाई को सामने लाती है। कहीं पाठ्यपुस्तकों में सैकड़ों गलतियां मिल रही हैं, कहीं परीक्षा के प्रश्नपत्रों में सवालों की जगह उत्तर छप जा रहे हैं, कहीं इतिहास के अध्याय हटाए जा रहे हैं और कहीं स्कूलों में ऐसे नियम लागू किए जा रहे हैं जिन पर लगातार बहस हो रही है। 

सवाल तो ये है कि शिक्षा का असली उद्देश्य क्या है? क्या छात्रों को सही जानकारी, बेहतर समझ और स्वतंत्र सोच विकसित करने का अवसर देना या फिर उन्हें ऐसे बदलावों और विवादों के बीच छोड़ देना, जिनका असर सीधे उनकी पढ़ाई और भविष्य पर पड़ता है? अगर इतिहास से जुड़े अध्याय हटाए जाएंगे या ऐतिहासिक तथ्यों को बदलकर पेश किया जाएगा तो आने वाली जनरेशन अपने इतिहास को कैसे समझेंगी? उत्तर प्रदेश में इतिहास, नागरिक शास्त्र और राजनीति विज्ञान के कई अध्यायों को पाठ्यक्रम से हटाए जाने के फैसले ने भी इसी तरह के सवाल खड़े किए हैं।

छत्तीसगढ़ में स्कूलों में प्रार्थना, भजन और गायत्री मंत्र को लेकर भी चर्चा हो रही है। भारत अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों वाला देश है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या स्कूलों में किसी एक धार्मिक परंपरा से जुड़े कार्यक्रमों को अनिवार्य किया जाना चाहिए? स्कूल वह जगह है जहां हर धर्म और जाति के बच्चे साथ बैठकर सीखते हैं इसलिए वहां ऐसा माहौल होना चाहिए जहां सभी बच्चे समान रूप से सहज महसूस करें।

अगर देखा जाए तो देश के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी बच्चे जोखिम भरे नदी या कीचड़ से भरे रास्तों से होकर स्कूल पहुंचते हैं और कई स्कूल बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। अगर शिक्षा व्यवस्था का ध्यान इन समस्याओं पर अधिक होता तो शायद लाखों छात्रों की पढ़ाई आसान बन सकती थी। वहीं राजस्थान विश्वविद्यालय में प्रश्नपत्र की जगह उत्तर छप जाने जैसी घटनाएं शिक्षा व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करती हैं।

शिक्षा किसी भी बच्चे के भविष्य की नींव होती है। इसलिए पाठ्यपुस्तकों में गलतियां, परीक्षाओं में लापरवाही और पाठ्यक्रमों में किए जा रहे बदलाव केवल प्रशासनिक मुद्दे नहीं हैं। इनका असर सीधे छात्रों पर पड़ता है। आख़िर इन गड़बड़ियों की जिम्मेदारी कौन लेगा? और क्या सचमुच ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाया जा रहा हैं जो बच्चों को बेहतर भविष्य की ओर ले जाए या फिर उन्हें लगातार विवादों और प्रयोगों के बीच छोड़ रहे हैं?

 

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