खबर लहरिया Blog Marriage Equality: LGBTQIA+ शादियों को मान्यता नहीं – SC ने सुनाया फैसला, कहा- कानून बनाना संसद पर

Marriage Equality: LGBTQIA+ शादियों को मान्यता नहीं – SC ने सुनाया फैसला, कहा- कानून बनाना संसद पर

सीजेआई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति संजय कौल की तरफ से कम राय देखी गई। उन्होंने माना कि समलैंगिक जोड़ों को नागरिक संघ (civil union) में प्रवेश करने का अधिकार है, लेकिन मौजूदा कानून के तहत शादी करने का अधिकार नहीं है। न्यायाधीशों ने कहा कि अदालत विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act) के तहत प्रावधानों को रद्द नहीं कर सकती है या इसे और अन्य कानूनों को नहीं पढ़ सकती है क्योंकि यह संसद या विधायिका के क्षेत्र में आता है।

Marriage Equality, LGBTQIA marriages not recognized - SC verdict, said - up to Parliament to make law

Marriage Equality/ विवाह समानता पर आज 17 अक्टूबर को फैसला सुनाते हुए पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने LGBTQIA+ व्यक्तियों को मान्यता देने से इंकार कर दिया। यह देखते हुए कि कानून बनाना संसद पर निर्भर है। यह फैसला 3:2 के मत से आया।

द न्यूज़ मिनट की रिपोर्ट के अनुसार, यह फैसला इस साल अप्रैल में भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, एस रवींद्र भट, हिमा कोहली और पीएस नरसिम्हा की पीठ द्वारा 10 दिनों तक चली मैराथन सुनवाई के बाद आया।

पीठ ने सीजेआई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय कौल, जस्टिस रवींद्र भट्ट और जस्टिस नरसिम्हा द्वारा चार अलग-अलग फैसले सुनाए। न्यायमूर्ति कोहली, न्यायमूर्ति भट्ट से सहमत थे।

इस सुनवाई का काफी लंबे से इंतज़ार किया जा रहा था। यह आशा जताई जा रही थी कि शायद कोर्ट का फैसला LGBTQIA+ के पक्ष में आ जाए। उन्हें भी वह समानता मिले जो देश के अन्य नागरिकों को मिलती है। अदालत के फैसले के बाद हताशा दिखाई दी।

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न्यायाधीशों ने रखी अलग-अलग राय

रिपोर्ट्स के अनुसार,जस्टिस रवींद्र भट्ट, हिमा कोहली और पीएस नरसिम्हा द्वारा बहुमत में राय दी गई थी जो इस बात पर सहमत थे कि शादी करने का कोई अयोग्य अधिकार नहीं है। वहीं अन्य न्यायाधीशों ने कहा कि क्वीर व्यक्तियों को साथ रहने का अधिकार (right to cohabitation) है। आगे कहा कि नागरिक संघ को कानूनी दर्जा प्रदान करना, केवल संसद द्वारा पारित कानून के माध्यम से ही लागू किया जा सकता है।

सीजेआई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति संजय कौल की तरफ से कम राय देखी गई। उन्होंने माना कि समलैंगिक जोड़ों को नागरिक संघ (civil union) में प्रवेश करने का अधिकार है, लेकिन मौजूदा कानून के तहत शादी करने का अधिकार नहीं है। न्यायाधीशों ने कहा कि अदालत विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act) के तहत प्रावधानों को रद्द नहीं कर सकती है या इसे और अन्य कानूनों को नहीं पढ़ सकती है क्योंकि यह संसद या विधायिका के क्षेत्र में आता है।

बहुमत की राय

– शादी का अधिकार नहीं
– नागरिक संघ का अधिकर नहीं; यह केवल कानूनों के ज़रिये ही हो सकता है
– बच्चे गोद लेने का अधिकार नहीं
– अपने पार्टनर का चयन करने का अधिकार
– ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को शादी करने का अधिकार है

अल्प राय

– शादी का अधिकार नहीं
– नागरिक संघ का अधिकर
– बच्चे गोद लेने का अधिकार
– ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को शादी करने का अधिकार है

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विचार-विमर्श के दौरान निकलीं सकारात्मक बातें

सीजेआई ने यह भी माना कि विषमलैंगिक संबंधों (heterosexual relationships) वाले सभी ट्रांस व्यक्तियों को मौजूदा कानूनों के तहत शादी करने का अधिकार है। यह ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए एक बड़ी जीत है क्योंकि अब तक यह मान्यता मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले पर आधारित थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, पीठ इस बात पर सहमत हुई कि समलैंगिक संबंधों के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। एलजीबीटीक्यूआईए+ (LGBTQIA+) जोड़ों की सुरक्षा के लिए राज्य और पुलिस को निर्देश दिए। साथ ही यह भी कहा कि उनकी शादी पर कानून बनाने का निर्णय संसद पर छोड़ दिया गया है।

पीठ ने विशेष रूप से ‘conversion therapy’/ ‘रूपांतरण चिकित्सा’ को भी संबोधित किया, जिसमें कहा गया कि किसी भी समलैंगिक व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी भी प्रकार की चिकित्सा उपचार प्राप्त करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

न्यायाधीश समलैंगिक जोड़ों के गोद लेने के अधिकार पर असहमत थे। वहीं सीजेआई चंद्रचूड़ ने माना कि समलैंगिक जोड़ों सहित अविवाहित जोड़ों को बच्चा गोद लेने का अधिकार है। इस राय से जस्टिस भट, कोहली और नरसिम्हा असहमत थे।

इस पूरे विचार-विमर्श के दौरान शीर्ष अदालत ने दोहराते हुए कहा कि सॉलिसिटर जनरल ने LGBTQIA+ व्यक्तियों के सामने आने वाले मुद्दों पर गौर करने के लिए कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने का वादा किया था और इसमें डोमेन विशेषज्ञ, समुदाय के सदस्य और अन्य सदस्य होंगे।

सीजेआई ने समिति को यह देखने का निर्देश दिया कि क्या समलैंगिक परिवारों के पास राशन कार्ड हो सकते हैं, बीमा सुविधाएं हो सकती हैं और चिकित्सकों का दायित्व है कि वे लाइलाज बीमारी के लिए परिवार से परामर्श करें, और रोजगार, उपदान (gratuity) आदि के अधिकारों पर ध्यान दिया जाए। हालांकि, ऐसा करने के लिए कोई विशेष समय सीमा का उल्लेख नहीं किया गया है।

पीठ ने याचिकाकर्ताओं और केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों और दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग (डीसीपीसीआर) और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) सहित हस्तक्षेपकर्ताओं की दलीलें सुनीं।

याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाये गए सवाल

याचिकाओं में विवाह पंजीकरण से संबंधित मौजूदा अधिनियमों को यह कहते हुए चुनौती दी गई कि वे अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता), 15 (धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध), 19 (भाषण, सभा आदि की स्वतंत्रता से संबंधित अधिकारों का संरक्षण), 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा), और 25 ((विवेक की स्वतंत्रता और धर्म का स्वतंत्र व्यवसाय, अभ्यास और प्रचार) का उल्लंघन करते हैं।

यह भी तर्क दिया गया कि समलैंगिक जोड़ों को विवाह के दायरे से बाहर रखना मनमाना और अनुचित है। याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने विशेष विवाह अधिनियम को लिंग-तटस्थ (जेंडर न्यूट्रल) तरीके से पढ़ने की मांग की और कहा कि ऐसा करने से क़ानून के संचालन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

Marriage Equality पर केंद्र सरकार

रिपोर्ट्स के अनुसार, विवाह समानता को लेकर केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में तर्क देते हुए कहा कि समलैंगिक विवाह की कानूनी मान्यता देश में व्यक्तिगत कानूनों और स्वीकृत सामाजिक मूल्यों के नाजुक संतुलन को “पूरी तरह से बर्बाद” कर देगी। इसमें यह भी कहा गया है कि विधायी नीति (legislative policy) शादी को केवल एक बायोलॉजिकल पुरुष और एक बायोलॉजिकल महिला के बीच एक बंधन के रूप में मान्यता देती है, इस बात पर ज़ोर देते हुए कि विवाह समानता सामाजिक नैतिकता या भारतीय लोकाचार के अनुरूप नहीं है।

अदालत के फैसले पर याचिकाकर्ता

याचिकाकर्ता व LGBTQIA+ अधिकार कार्यकर्ता हरीश अय्यर कहते हैं, हालांकि अंत में, फैसला हमारे पक्ष में नहीं था, लेकिन (सुप्रीम कोर्ट द्वारा) की गई कई टिप्पणियाँ हमारे पक्ष में थीं। उन्होंने इसकी जिम्मेदारी भी केंद्र सरकार पर डाल दी है और केंद्र सरकार के सॉलिसिटर जनरल ने हमारे खिलाफ बहुत सारी बातें कही हैं, इसलिए हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम अपनी चुनी हुई सरकार, सांसदों और विधायकों के पास जाएं और उन्हें बताएं कि हम जिस तरह से दो अलग लोग होते हैं, उस तरह से दो अलग लोग हैं। युद्ध चल रहा है… इसमें कुछ समय लग सकता है लेकिन हमें सामाजिक समानता मिलेगी।”

एएनआई से बात करते हुए, याचिकाकर्ताओं में से एक और कार्यकर्ता अंजलि गोपालन ने कहा, “हम लंबे समय से लड़ रहे हैं और ऐसा करते रहेंगे। गोद लेने के संबंध में भी कुछ नहीं किया गया, सीजेआई ने गोद लेने के संबंध में जो कहा वह बहुत अच्छा था लेकिन यह निराशाजनक है कि अन्य न्यायाधीश सहमत नहीं…यह लोकतंत्र है लेकिन हम अपने ही नागरिकों को बुनियादी अधिकारों से वंचित कर रहे हैं।”

मौलिक अधिकार हर नागरिक से जुड़े हैं, सिर्फ किसी विशेष लिंग से नहीं लेकिन यह अधिकार सिर्फ विशेष लिंग को ही मिलते आये हैं इसलिए भी यहां समानता की लड़ाई सबसे बड़ी है क्योंकि नागरिकों को दिए जा रहे अधिकारों में समानता नहीं है। आज के फैसले में सीजीआई द्वारा रखी गई कई बातों LGBTQIA+ समुदाय के व्यक्ति सहमत दिखे। यह लड़ाई अभी भी काफी लंबी है। समानता अब भी काफी दूर है, बेहद दूर।

 

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