हाल ही में प्रयागराज में माघ मेले में ज़ोर चल पड़ा है। संगम किनारे लगा यह मेला जहां श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है वहीं सैकड़ों छोटे दुकानदारों के लिए यही साल भर की कमाई का बड़ा ज़रिया बनता है।
रिपोर्टिंग – सुनीता देवी, लेखन – रचना
दूर-दूर से आए परिवार अस्थायी दुकानों के सहारे अपने घर का खर्च चलाने की उम्मीद लेकर यहां पहुंचे हैं। मेले में धर्म के साथ मेहनत और जीविका की तस्वीर भी साफ़ दिखाई देती है।
पन्नी के नीचे चलता परिवार का काम
दिल्ली के सुल्तानपुर से आईं शकुंतला अपने परिवार के साथ कद्दूकस और छन्नी बनाकर बेच रही हैं। यह उनका पुश्तैनी काम है। वे लोहे के टीन खरीदकर उसे काटती हैं पत्तियां बनाती हैं और हथौड़ी से पीटकर आकार देती हैं। एक टीन से करीब सौ पीस बनते हैं। जब थोक में बिक्री नहीं होती तो पूरा परिवार मेला में घूम-घूमकर बेचता है। रहने के लिए मैदान में पन्नी डालकर अस्थायी ठिकाना बना लिया है। यहीं पर उनका खाना बनाना, खाना और सोना सब चलता है।
मेहनत के साथ हर दिन जोखिम
इस काम में मेहनत बहुत लगती है और खतरा भी कम नहीं। शकुंतला से बात करने पर वे बताती हैं कि ज़रा-सी गलती हुई तो हाथ कट सकती है और टीन लगने पर महीनों तक घाव नहीं भरता। छन्नी बनाने के लिए सांचा तैयार करने के बाद टाकी और हथौड़ी से छेद किए जाते हैं और फिर डंडी लगाई जाती है। महिला-पुरुष सभी मिलकर एक दिन में लगभग पाँच सौ पीस तैयार कर लेते हैं। मेले में एक छन्नी करीब पचास रुपये में बिकती है जिससे थोड़ा-सा मुनाफा निकलता है।
साल भर की कमाई की उम्मीद
पिछले साल महाकुंभ की भीड़ के कारण ये परिवार नहीं आ सके थे इसलिए इस बार उम्मीदें और ज्यादा हैं। कुल दस परिवार इस बार माघ मेले में पहुंचे हैं। उनका कहना है कि जहां भी मेला लगता है वे अपना सामान लेकर चले जाते हैं क्योंकि यही उनका रोज़गार है। आस्था के इस मेले में इन मेहनतकश परिवारों के सपने भी हर दिन गढ़े जा रहे हैं।
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