खबर लहरिया Blog भारत, दुनिया मे इंटरनेट सेवाओं को बाधित करने मे सबसे आगे फिर अभिव्यक्ति की आज़ादी कैसी?

भारत, दुनिया मे इंटरनेट सेवाओं को बाधित करने मे सबसे आगे फिर अभिव्यक्ति की आज़ादी कैसी?

यूँ तो संविधान में यह लिखित रूप से दर्ज किया गया है किअभिव्यक्ति की आज़ादीहर एक व्यक्ति का मूल अधिकार है। वह चाहें तो किसी भी तरह से अपने विचारों को सामने रख सकता है। लेकिन अगर हम 2021 के शुरूआती महीने और साल 2020 की बात करें तो इन दो सालों में हमने सबसे ज़्यादा इंटरनेट बैन या ये कहें की भारत में सबसे ज़्यादा इंटनरेट बंद के मामले देखे हैं। यह कुछ ऐसे मामले थे जिसकी चर्चा लोगों में पूरे साल तक चलती रही। तो क्या हम यह पूरी तरह से कह सकते हैं कि सब लोगों को अभिव्यक्ति की आज़ादी मिली हुई है ? क्या लोग अपने मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल कर पा रहे हैं? आधुनिक युग में आमतौर पर लोग अपने विचार सोशल मिडिया प्लेटफॉर्म्स के ज़रिये ही रखते हैं। ऐसे में इंटरनेट की सेवायें बंद करने को क्या मौलिक अधिकारों का हनन होना नहीं कहा जाना चाहिए ? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा कहा गया था कि वह भारत को डिजिटल भारत बनाना चाहते हैं। लेकिन सेवाओं को बाधित करके देश डिजिटल कैसे बनेगा?

पिछले चार सालों में 400 से भी ज़्यादा बार इंटरनेट सेवाएं बंद 

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साल 2021 की शुरुआत होते ही हमने इंटरनेट लॉकडाउन के कई मामले देखें। इंडिया टुडे की 4 फरवरी 2021 की रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2021 में सरकार ने दिल्ली के टिकरी बॉर्डर, गाज़ीपुर बॉर्डर, मुकरबा चौक, नागलोई और सिंघु बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन के विरोध स्थलों की इंटरनेट सेवायें बंद कर दी थी। रिपोर्ट कहती है कि किसान आंदोलन के विरोध स्थलों पर इंटरनेट सेवायें बंद करने के पांच मामले हैं। वहीं देश की राजधानी दिल्ली सहित अन्य राज्यों में पिछले एक महीने में इंटरनेट सेवाओं को बंद करने के सात मामले देखे गए हैं। 

पिछले महीने जनवरी 2021 में सरकार ने हरियाणा के झज्जर, सोनीपत और पलवल जिलों में कुछ समय तक इंटरनेट सेवायें बंद की थी। सेवाओं को स्थगित करने को लेकर सरकार ने अपने पक्ष में कहा कि वह अनैतिक तत्वों से बचाव के लिए यह सब कर रही है। लेकिन किसी से उसके विचारों की आज़ादी को छीनकर उसका बचाव कैसे किया जा सकता है? रिपोर्ट कहती है कि भारत में पिछले चार सालों में यानी 2016 से 2020 के बीच 400 से भी ज़्यादा इंटरनेट बंद देखे गए हैं।  

प्रदर्शन की जगहों पर इंटरनेट बंद की समस्या को दुनिया भर ने देखा और कई लोगों द्वारा सरकार के इस कदम की कड़ी आलोचना भी की गयी। जब विदेशी गायिका रिहाना और स्वीडन की पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने किसान आंदोलन का समर्थन करते हुए सीएनएन की रिपोर्ट को पोस्ट में टैग करते हुए लिखा किहम इसके बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं।उसके एक ट्वीट से पूरा भारत सरकार का मंत्रालय और नेता आग बबूला हो उठे। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि देश के निजी मामलों में बाहर के लोगों को बोलने का कोई अधिकार नहीं है। लेकिन इसमें यह सवाल उठ खड़ा होता है कि सरकार ने सबसे पहले खुद ही इंटरनेट सेवाओं को बंद करके देश के नागरिकों से उनके आंतरिक मामलो में विचार रखने की आज़ादी छीन ली। तो ऐसे में वह किस आंतरिक मामले की बात कर रहे हैं जब खुद देश का नागरिक भी उस पर अपने विचार नहीं रख सकता

किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान इंटरनेट सेवाओं के बंद होने के बाद इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन, फ़्री सॉफ़्टवेयर मूवमेंट ऑफ़ इंडिया और सॉफ़्टवेयर फ़्रीडम लॉ सेंटर (जो इंटरनेट सेवाओं को चलाता है) ने अपने एक संयुक्त बयान में कहा है कि इंटरनेट बंद करना सरकार के लिए विरोध की एक नियमित प्रतिक्रिया बन गयी है। इंटरनेट के बंद होने से सुचारु रूप से मिलने वाले जानकारी में बाधा आती है, जो की किसी भी हिंसा को बढ़ाने का काम करता है। वहीं जानकारियों से शांतिपूर्ण विरोध कायम किया जाता है। वह आगे कहते हैं कि विरोध स्थलों पर पहले से ही भारी मात्रा में पुलिस बल गलत काम करने वाले लोगों को पकड़ने के लिए तैनात है। इंटरनेट सेवाओं के बंद होने का असर सिर्फ विरोध स्थल के लोगों को ही नहीं बल्कि आसपास के लोगों को भी होता है। 

26 जनवरी मामले में 52 मिलियन फ़ोन उपभोक्ता हुए प्रभावित

कन्वर्सेशन की 1 फरवरी 2021 की रिपोर्ट के अनुसार जब 26 जनवरी के दिन लाल किले पर हुई हिंसा के बाद, जिसमें किसान प्रदर्शनकारियों द्वारा किले पर धार्मिक झण्डा फहराया गया था। इसके बाद राजधानी दिल्ली में इंटरनेट सेवाओं को कई जगह पर पूरी तरह से बंद कर दिया गया तो कई जगहों पर इंटरनेट की स्पीड को कम कर दिया गया था। दिल्ली पुलिस का कहना था कि यह सब सार्वजनिक सुरक्षा के लिए करना ज़रूरी था। इससे दिल्ली के 52 मिलयन मोबाइल फ़ोन उपभोक्ता प्रभावित हुए थे।

साल 2020 मे 83 बार  इंटरनेट सेवा हुई बन्द 

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न्यूज़मिनट की 4 फरवरी 2021 की रिपोर्ट में एसएफएलसी. इन यानी सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर ने बताया कि साल 2020 में भारत में 83 बार इंटरनेट सेवायें बंद की गयी थीं। वो भी एक ऐसे समय में जब पूरा देश लॉकडाउन में था और कोरोना महामारी से लड़ रहा था। कई लोग ऐसे में अपने परिवारों के साथ थे तो कई लॉकडाउन में अकेले भी थे। आज के समय में ज़्यादातर लोग जो अकेले रहते हैं अपना समय सोशल मिडिया प्लेटफॉर्म्स पर दूसरे लोगों से बात करके बिताते हैं। ऐसे में इंटरनेट सेवाओं के बंद होने का मतलब है लोगों का मानसिक तौर पर ग्रसित हो जाना क्यूंकि वह बिना इंटरनेट के किसी से भी बात नहीं कर सकते।     

सबसे लंबे समय तक इंटरनेट सेवा बंद करने में, भारत दुनिया में आगे

इंडिया टुडे की 4 फरवरी 2021 की रिपोर्ट के अनुसार भारत, दुनियाभर में एक ऐसा देश है जिसने सबसे ज़्यादा लंबे समय के लिए देश में इंटरनेट सेवाओं को बंद रखा था। जब 5 अगस्त 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार द्वारा जम्मूकश्मीर राज्य से धारा 370 को हटाया गया तब से ही राज्य में इंटरनेट सेवाओं को बाधित कर दिया गया था। 4 अगस्त 2019 से 4 मार्च 2020 तक राज्य में किसी भी नागरिक के पास इंटरनेट सेवा नहीं थी। बाद में, राज्य में प्रशासन द्वारा 2जी सेवाओं को शुरू किया गया। वो भी सिर्फ प्रीपेड सिम कार्डकर्ता के लिए। वहीं पोस्टपेड सिम कार्ड कर्ताओं को 2जी सेवाओं का भी लाभ नहीं दिया गया। कोरोना महामारी के दौरान भी राज्य में सेवाओं को बंद रखा गया था। जिस समय राज्य को एकजुटता और जानकारी की बेहद ज़रूरत थी।

जनवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने जम्मूकश्मीर प्रशासन से कहा कि बिना किसी नियमित समय सीमा के राज्य में इंटरनेट सेवाएं बंद रखना दूरसंचार नियमों और अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकारों का उल्लंघन करना है। इंटरनेट शटडाउन टेंपररी सुसपेंशन ऑफ टेलीकॉम सर्विसेज़ 2017 के नियम के अनुसार इंटरनेट सेवाओं को अदालत द्वारा 15 दिनों के लिए बंद किया जा सकता है।

आर्थिक रूप से हुआ नुकसान

भारत में बाधित इंटरनेट सेवाओं ने ना सिर्फ लोगों से उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी को प्रभावित किया बल्कि देश को आर्थिक रूप से भी नुकसान पहुंचाया। टॉप10वीपीएन की रिपोर्ट के अनुसार साल 2020 में भारत मे इंटरनेट बंद की कीमत अमेरिकी डॉलर में 2.7 बिलियन है यानी 2 अरब 70 करोड़ रुपए। अमेरिकी डॉलर की कीमत भारतीय रुपयों में 73.3 रुपए हैं यानी हर घण्टे इंटरनेट बंद की कीमत तकरीबन 2 करोड़  है। 2020 में 8,927 घण्टों के लिए देश मे सेवाओं को बाधित रखा गया था।

स्टेटिस्टिक्स की 16 अक्टूबर 2020 की रिपोर्ट के अनुसार साल 2019 में 4 हज़ार घण्टों के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद की गयी थी। जिसकी लागत 1.3 अमेरिकी बिलियन यानी 1 अरब 30 करोड़ आयी थी। रिपोर्ट के अनुसार, भारत दुनिया में इराक और सूडान के बाद आर्थिक रूप से कमज़ोर मामले में तीसरे नंबर पर था। साल 2012 से 2020 तक सरकार द्वारा 437 बार इंटरनेट सेवाओं को बंद किया गया जो की अन्य देशों के मुकाबले सबसे ज़्यादा है। 

भारत के कानून में इंटरनेट सेवा बंद करने का प्रावधान मौजूद है। दूरसंचार विभाग कुछ समय के लिए टेलीकॉम सेवाओं को स्थगित करने की इजाज़त देता है। इंटरनेट सेवाओं को बाधित करने का आदेश केंद्रीय गृह सचिव और गृह सचिव द्वारा आपातकाल की स्थिति या सार्वजनिक सुरक्षा को देखते हुए दिया जाता है। 

 

इस साल की शुरुआत से ही देश ने किसान आंदोलन के स्थलों पर सरकार द्वारा निलंबित की गयी इंटरनेट सेवाओं के दृश्य देखे। जहां बारबार सरकार और पुलिस द्वारा सिर्फ यही कहा गया कि सेवाओं को सार्वजनिक सुरक्षा के लिए निलंबित किया जा रहा है। लेकिन सेवाओं के बाधित होने से नागरिकों को क्या परेशानी हो रही है , उसे बड़े ही आराम से नज़रअंदाज़ कर दिया गया। एक तरफ सरकार कहती है कि आप पूरी तरह से अपनी बात रखो और जब व्यक्ति वह करता है तो उसे झूठे आरोपों में फंसा दिया जाता है। यह सुनने में कितना हास्यप्रद लगता है। तो फिर इसमें अभिव्यक्ति की आज़ादी कैसे हुई? क्या सेवाओं को बाधित करके लोगों को सुरक्षा दी जा सकती है? आखिर कब तक सरकार लोगों की आवाज़ को दबा पाएगी? हमारे अधिकारों का हनन करेगी?

द्वारा लिखित संध्या