महोबा जिले के कबरई विकासखंड के धरौन गांव स्थित बहुउद्देशीय प्राथमिक ग्रामीण सहकारी समिति में सरकारी गेहूं के भंडारण को लेकर गंभीर लापरवाही सामने आई है। किसानों से समर्थन मूल्य पर खरीदा गया हजारों कुंतल गेहूं समय पर गोदाम तक नहीं पहुंचाया गया। नतीजा यह हुआ कि लगातार बारिश के बीच बड़ी मात्रा में गेहूं खुले में पड़ा रहा, भीग गया और कई जगहों पर अंकुरित होने लगा। अब सवाल उठ रहे हैं कि जब बारिश की आशंका पहले से थी और अधिकारियों को लिखित सूचना भी दी गई थी तब अनाज को सुरक्षित रखने के इंतजाम क्यों नहीं किए गए।
रिपोर्ट,लेखन- मीरा देवी
खबर लहरिया को मिले दस्तावेजों के मुताबिक समिति में किसानों से कुल 6,747 कुंतल गेहूं खरीदा गया था। इसमें से 3,662 कुंतल गेहूं का उठान किया गया जबकि 3,485 कुंतल गेहूं समिति परिसर में ही पड़ा रहा। इनमें से करीब 2,400 कुंतल गेहूं खुले आसमान के नीचे रखा गया था जबकि शेष गेहूं गोदाम में रखा गया था। गोदाम पहले से भरे होने के कारण नया खरीदा गया गेहूं बाहर रखने की मजबूरी बताई गई।
इस बीच मानसून की बारिश शुरू हो गई। लगातार बारिश होने से खुले में रखा गेहूं भीगने लगा। तिरपाल से उसे ढकने की कोशिश की गई लेकिन तेज बारिश के सामने यह व्यवस्था नाकाफी साबित हुई। कई जगहों पर गेहूं में नमी बढ़ गई और अंकुर निकलने की स्थिति बन गई। अगर अनाज लंबे समय तक इसी तरह भीगा रहता है तो उसकी गुणवत्ता प्रभावित होने के साथ सरकारी खरीद का उद्देश्य भी सवालों के घेरे में आ जाता है।
दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि समिति सचिव ने समय रहते इस समस्या की जानकारी उच्च अधिकारियों को दे दी थी। उन्होंने पत्र लिखकर बताया था कि गोदाम में जगह नहीं बची है और बड़ी मात्रा में गेहूं खुले में रखा है। लगातार बारिश के कारण अनाज खराब होने का खतरा है। इसलिए गेहूं को तत्काल दूसरे गोदाम में स्थानांतरित कराया जाए या उसका जल्द उठान कराया जाए। पत्र में यह भी लिखा गया कि यदि समय पर कार्रवाई नहीं हुई और गेहूं खराब हो गया तो इसकी जिम्मेदारी समिति की नहीं होगी।
इसके बावजूद समय रहते कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। ग्रामीणों का आरोप है कि गेहूं के परिवहन की जिम्मेदारी संभाल रहे ठेकेदार ने समय पर वाहन उपलब्ध नहीं कराए। इसी वजह से हजारों कुंतल गेहूं कई दिनों तक समिति परिसर में पड़ा रहा। बारिश शुरू होने के बाद जल्दबाजी में तिरपाल डालकर अनाज को बचाने की कोशिश की गई लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।
स्थानीय लोगों का कहना है कि हर साल सरकारी खरीद के दौरान ऐसी समस्याएं सामने आती हैं। किसान अपनी फसल सरकार को बेच देते हैं लेकिन खरीद के बाद भंडारण और परिवहन की व्यवस्था समय पर नहीं हो पाती। इसका खामियाजा आखिरकार सरकारी अनाज और सरकारी खजाने दोनों को उठाना पड़ता है।
यह मामला सिर्फ अनाज के भीगने का नहीं बल्कि सरकारी व्यवस्था की तैयारी पर भी सवाल खड़े करता है। मौसम विभाग लगातार भारी बारिश की चेतावनी जारी कर रहा था। इसके बावजूद न तो पर्याप्त भंडारण की व्यवस्था की गई और न ही समय पर गेहूं का उठान सुनिश्चित किया गया। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि संबंधित अधिकारियों को पहले ही लिखित सूचना मिल चुकी थी तो उन्होंने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की?
अगर भीगे और अंकुरित गेहूं को सरकारी गोदामों में जमा नहीं किया जा सका तो इसका सीधा आर्थिक नुकसान सरकार को होगा। साथ ही किसानों की मेहनत से पैदा किया गया अनाज भी बर्बाद होगा।
अब इस पूरे मामले में जिम्मेदारी किसकी तय होगी यह देखने वाली बात होगी। क्या परिवहन में देरी के लिए ठेकेदार जवाबदेह होगा या फिर भंडारण और उठान की निगरानी करने वाले अधिकारी? फिलहाल समिति सचिव का पत्र यह साफ बताता है कि उन्होंने समय रहते अधिकारियों को आगाह किया था। इसके बावजूद यदि कार्रवाई में देरी हुई और हजारों कुंतल गेहूं बारिश में खराब हो गया तो इसे केवल प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि सरकारी लापरवाही का मामला भी माना जाएगा।
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