पटना जिले के दानापुर इलाके में एक नहर आज अपनी पहचान खो चुकी है -नहर है या नाला, यह खुद वहां रहने वाले लोगों को भी साफ नहीं पता। इस नहर का नाम है सकराइचा नहर। यह नहर भुसौल से लेकर आलमपुर कुरकुरी तक फैली हुई है। इस नहर में करीब 2 किलोमीटर तक कचरा जमा हो गया है। नहर लगभग 5 किलोमीटर और चौड़ाई 20 फुट है। कचरे की वजह से महार की चौड़ाई अब 13 से 15 के बीच हो गई है। इस नहर में पानी कम और गंदगी ज्यादा दिखाई देती है। हालात ऐसे हैं कि आसपास रहने वाले लोग बदबू, मच्छरों और बीमारियों के बीच जीने को मजबूर हैं।
रिपोर्टर – सुमन, लेखन – सुचित्रा
भुसौल ग्रामीणों का कहना है कि नहर के दोनों किनारों के करीब 40 से 50 घर हैं। यहां कुल मिलाकर लगभग 500 लोगों की आबादी है जिसमें पासवान, कहार, नट, रविदास और चौधरी समुदाय के लोग हैं। नहर में पानी न होने की वजह से कूड़ा इसी नहर में फेंकते हैं और उनके घरों का गंदा पानी भी इसी नहर में जाता है। लोगों का कहना है कि इस नहर में साफ़ पानी होता तो लोग इसमें कचरा नहीं फेंकते, या तो यह नाला ही होता और ढका हुआ होता तो कचरा नहीं फेंका जाता। लेकिन कचरा वाला समय से आता नहीं है और कहीं पास में नाला भी नहीं है तो सारा कचरा और गंदा पानी इसी में जाता है।
वार्ड अधिकारी स्थिति से अनजान – ग्रामीण का आरोप
गांव के निवासी संतोष कुमार का कहना है कि वे इसी क्षेत्र के वार्ड नंबर 8 में रहते हैं। उनका कहना है कि उन्हें याद नहीं कि आखिरी बार यहां कब सफाई हुई थी। काफी समय पहले एक बार सफाई होते देखी थी लेकिन अब यहां लगातार गंदगी बनी रहती है। उन्होंने बताया कि नहर में पानी नहीं रहता जिसकी वजह से लोग इसमें कचरा फेंकने लगते हैं।
गंदगी की वजह से बीमारी का खतरा
रामकली देवी, जिनकी उम्र लगभग 55 से 60 वर्ष के बीच है, बताती हैं कि करीब तीन महीने पहले (जनवरी) उनकी तबीयत खराब हो गई थी। उनका घर नाले के बिल्कुल सामने है जिससे उन्हें हर समय वहीं बैठना-उठना पड़ता है।
रामकली देवी की चार बेटियां हैं कोई बेटा नहीं है और उनके पति का निधन हो चुका है। जब उनकी तबीयत बिगड़ी तो डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें मलेरिया हुआ है, जो मच्छरों के काटने से होता है। डॉक्टरों ने यह भी कहा कि जिस इलाके में वे रहती हैं, वहां साफ-सफाई की बहुत जरूरत है। वह बताती हैं कि तबीयत ज्यादा खराब होने पर उनकी बेटी सुगा, दामाद शंकर और दूसरी बेटी सुषमा व दामाद चैतू (जो पेमार गांव, प्रखंड पुनपुन में रहते हैं) उन्हें अपने साथ वहां ले गए। वहां उन्होंने एक प्राइवेट अस्पताल में उनका इलाज करवाया, जिसकी वजह से वह दोबारा ठीक हो सकीं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि दूषित हवा और गंदगी की वजह से यहां लोग बीमार पड़ जाते हैं। कई लोगों को हाथों में खुजली जैसी समस्याएं भी होने लगी हैं।
बच्चों को खेलने में खतरा
गांव में रहने वाली किरण देवी बताती हैं कि उनका घर भी नहर के किनारे ही है। वह कहती हैं कि बच्चों के खेलने के लिए सुरक्षित जगह नहीं है, इसलिए उन्हें सड़क पर ही खेलना पड़ता है। नहर में पानी जमा रहता है तो गिरने का भी डर लगा रहता है। गंदगी पूरे इलाके में नहीं है, बल्कि मंदिर से लेकर आगे पुल तक के हिस्से में ज्यादा फैली हुई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि नहर की नियमित सफाई करवाई जाए और उसमें पानी छोड़ा जाए, ताकि किसानों को सिंचाई के लिए पानी मिल सके। अन्यथा, यदि इसका उपयोग नहीं हो रहा है तो इसे नाले का रूप दे दिया जाए, जिससे इलाके के लोगों को राहत मिल सके।
नहर बना गन्दा नाला और कूड़ेदान
वहीं ग्रामीण बिंदु जी बताती हैं कि उन्हें यहां रहते हुए कई साल हो गए हैं। यह क्षेत्र शायद नगर निगम के अंतर्गत आता है इसलिए सरकार को समय-समय पर इसकी सफाई करानी चाहिए। अगर नहर साफ-सुथरी रहेगी और उसमें पानी बहता दिखाई देगा तो लोग उसमें कचरा डालने से बचेंगे। लेकिन जब जगह पहले से गंदी होती है तो लोग और भी कचरा डालने लगते हैं, जिससे स्थिति और खराब हो जाती है।
बिंदु जी बताती हैं कि कचरा उठाने वाली गाड़ी सुबह करीब 6 बजे आती है और कुछ लोग उसमें कचरा डाल भी देते हैं। लेकिन पूरे दिन गाड़ी नहीं रहने के कारण कई लोग इधर-उधर या नहर में ही कचरा फेंक देते हैं।
कुएं के पास बैठी कई महिलाओं ने एक साथ अपनी नाराजगी जताई। उनका कहना है कि गांव के मुखिया और वार्ड सदस्य कभी भी यहां की समस्याएं देखने नहीं आते।
नहर साफ़ हो या फिर नाला बनाया जाए – ग्रामीणों की मांग
महिलाओं के अनुसार, मुखिया और वार्ड सदस्य इसी गांव के हैं, लेकिन इसके बावजूद इलाके की हालत पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। गांव में महिला मुखिया हैं, जबकि उनके पति मंटू कुमार ही ज्यादातर काम देखते हैं। उन्होंने कई बार उनसे इस समस्या को ठीक कराने की मांग की है। वे चाहती हैं कि इस नहर को नाले का रूप देकर ऊपर से ढक दिया जाए, ताकि बदबू से राहत मिल सके और लोग इसमें कचरा न डालें।
उनका मानना है कि अगर नाला ढका रहेगा, तो आसपास के लोगों का स्वास्थ्य भी बेहतर रहेगा और आने-जाने में भी दिक्कत नहीं होगी। फिलहाल नहर खुली होने के कारण यहां बहुत ज्यादा बदबू आती है, जिससे लोगों को काफी परेशानी हो रही है।
वह कहती हैं कि जब इस नहर में पानी भेजा ही नहीं जाता, तो इसे नाले का रूप दे देना चाहिए। क्योंकि पूरे गांव का गंदा पानी वैसे भी इसी में आता है।
उनका मानना है कि अगर इसे सही तरीके से नाला बना दिया जाए, तो व्यवस्था बेहतर होगी और गांव के सभी लोगों को राहत मिलेगी।
यह काम हमारे अंतर्गत नहीं – मुखिया
इस मामले पर मुखिया के पति पति मंटू कुमार ने बताया कि यह नहर ग्राम पंचायत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती है, बल्कि सिंचाई विभाग के अंतर्गत आती है। उन्होंने कहा कि कई बार उन्होंने कोशिश की कि नहर की सफाई कराई जाए या इसे नाले में बदला जाए, लेकिन यह मामला सिंचाई विभाग का होने के कारण काम आगे नहीं बढ़ पाया। इस दौरान विभाग के साथ कई बार कहासुनी भी हुई।
मंटू कुमार के अनुसार, उन्होंने साल 2023 में सिंचाई विभाग और संबंधित अधिकारियों को पत्र भी लिखा था, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने भी आगे ज्यादा प्रयास नहीं किया, क्योंकि उन्हें बताया गया था कि इस नहर को नाले में बदलने की योजना है। उन्होंने यह भी कहा कि अभी अलग-अलग जगहों पर नाले बनाए जा रहे हैं, ऐसे में उम्मीद है कि इस नहर को भी नाले में बदला जा सकता है, जिससे लोगों को राहत मिलेगी।
मंटू कुमार ने आगे बताया कि वे पहली बार चुनाव जीतकर आए थे और अब उनका 5 साल का कार्यकाल पूरा होने वाला है। ऐसे में अब यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर हो गया है, क्योंकि जल्द ही पंचायत चुनाव होने वाले हैं।
15 जून से शुरू होगी सफाई – सिंचाई विभाग
सिंचाई विभाग से बात करने पर पता चला कि विभाग के अधिकारी का हाल ही में ट्रांसफर हो गया है और नए अधिकारी अभिषेक अभी जॉइन नहीं किए हैं। एक कर्मचारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि यह सकराइचा नहर है, जिसमें हर साल दो बार पानी छोड़ा जाता है।
उन्होंने बताया कि नहर की सफाई विभाग के नियम के अनुसार तीन साल में एक बार होती है। पिछली बार करीब तीन साल पहले सफाई कराई गई थी और अब फिर से सफाई के लिए टेंडर जारी कर दिया गया है, जो 15 जून से शुरू होने की संभावना है।
विभाग का कहना है कि नहर में पानी छोड़ा जाता है, लेकिन लोग उसमें कचरा डाल देते हैं, जिससे पानी रुक जाता है। साथ ही, नहर किनारे रहने वाले लोगों पर अतिक्रमण और गंदगी फैलाने का भी आरोप लगाया गया है।
वहीं, मुखिया पक्ष का कहना है कि लोग यहां वर्षों से रह रहे हैं और सिंचाई विभाग के साथ इस मुद्दे को लेकर विवाद चल रहा है। फिलहाल नहर की सफाई का जिम्मा सिंचाई विभाग के पास है और उसी के तहत आगे काम होना है।
पूरी खबर से यह समझ आता है कि समस्या को सुलझाने के बजाय उसे उलझाया जा रहा है। जब इस विषय पर सिंचाई विभाग से बात की गई, तो वहां से भी स्पष्ट जवाब नहीं मिला। विभाग की ओर से सामान्य रूप से यही कहा गया कि समस्या के लिए ग्रामीण ही जिम्मेदार हैं।
इस पूरी स्थिति से यह लगता है कि जिम्मेदार अधिकारी अपने काम को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। समस्या का समाधान करने के बजाय वे एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं, जिससे हालात और खराब होते जा रहे हैं।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि जिम्मेदारी तय नहीं है -ग्राम पंचायत इसे अपना नहीं मानती, तो सिंचाई विभाग साफ-साफ जवाब देने से बचता नजर आता है। नतीजा यह है कि सफाई और व्यवस्था के अभाव में यह नहर अब लोगों के लिए परेशानी का कारण बन गई है। सवाल यह है कि आखिर इस समस्या की जिम्मेदारी कौन लेगा और कब तक लोग इसी हाल में जीते रहेंगे?
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