खबर लहरिया Blog दलित हूँ तो क्या सामाजिक पर्व में नहीं जा सकती ?

दलित हूँ तो क्या सामाजिक पर्व में नहीं जा सकती ?

गीता दलित है इसलिए वह सामजिक पर्व में नहीं जा सकती। यह समाज के कुछ ऊँची माने जाने वाली जाति के लोगों का कहना है।

एक दलित वर्ग की लड़की जब सामाजिक पर्व में जाती है तो खुद को बड़ी जाति का मानने वाले समाज के कुछ लोग उस पर पाबंधी लगाते हैं। यह कहानी गीता (काल्पनिक नाम) की है जिसे लिख तो मैं रही हूँ पर इसे आप गीता की तरह ही पढ़ना।

मुझे पता था कि कुछ ऐसा ही होगा क्योंकि इन चीज़ों का मैनें कई बार सामना किया है।

आज मैं सुबह से बहुत खुश थी। अपनी सहेली के बहुत कहने पर पर्व में जाने को तैयार हो गई। अपने पड़ोस में रहने वाली भाभी से उनकी नई साड़ी भी मांग लाई थी। बहुत सारी साड़ी पिन और गहने भी ले आई थी। मैं बहुत उत्साहित थी, साड़ी पहनने और सजने के लिए। मन में खलबली सी मच रही थी। आखिर वहां कई सारी लड़कियां और महिलाएं भी आने वाली थीं। जो कई तरह की रंग-बिरंगी साड़ियां पहने हुए और कई प्रकार के गहनों से सजी रहेंगी। सब सबसे अच्छा दिखना चाहते थे। इसलिए मैं और मेरी सहेली भी सबसे अच्छा दिखना चाहते थे ताकि सब हमारी ही तारीफ करें।

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भोजली पूजा के लिए तैयार हुई लड़कियां

आज मैंने अपने घर का सारा काम जल्दी-जल्दी निपटा लिया था। गाय के कोठे से गोबर फेंक दिया। घर वालों के लिए खाना बनाकर बर्तन साफ़ कर लिए। शाम के लिए पानी भी भर दिया था। जिन कामों को करते हुए दिन बीत जाता, उन कामों को इस सोच में कि मुझे देर ना हो जाए आज कुछ घंटों में ही कर लिया। इस त्यौहार में सिर्फ महिलाएं और लड़कियां ही जाती हैं। लड़के सिर्फ 5 या 6 होते हैं, वो भी वाद्य यंत्र जैसे (मांदर, कसताल, और डफली) बजाने के लिए। सभी महिलाओं के मन में ये बात चलती है कि भोजली दाई उनकी मनोकामना पूरी कर दे। मगर मेरे और उषा (गायत्री की दोस्त) के मन में सबसे अच्छा दिखने का भाव चल रहा था।

यह त्यौहार छत्तीसगढ़ के प्रमुख त्योहारों में से एक है जिसे सितम्बर (भादो) में मनाया जाता है। इसमें दो हफ़्ते पहले लड़कियां और महिलाएं मिलकर चन्दा इकठ्ठा करके पूजा का सामान (धान, गेंहू, सरसों,मूंग,अगरबत्ती,धूप,तेल,लाई,हल्दी, दीया) इत्यादि खरीदते हैं। सब अपने लिए एक-एक थाली लाते हैं। उन थालियों में जो धान, गेंहू इत्यादि बीज लिए होते हैं उन्हें हल्दी पानी में भिगोकर थाली में मिट्टी करके उसमें बोते हैं।

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                 परंपरा के अनुसार थाली में बोया गया धान

उन थालियों को किसी एक के घर में रखते हैं। उसी जगह सभी महिलाएं और लड़कियां सुबह शाम जाती हैं। उस थाली में बोई हुए फसल को भोजली दाई के नाम से पूजा करती हैं। भोजली गीत गाते हैं। हर सुबह शाम उसमें हल्दी पानी छिड़कते हैं ताकि भोजली स्वस्थ और पीली हो।

सुबह पूजा करते समय कुछ इस तरह से गाते हैं………

उती के बेरा उतारे घाना घेरा, उतारे घाना घेरा……
उठो – उठो भोजली दाई दशरन के बेला…
हाहो देवी गंगा…..।

और जब शाम में पूजा करते हैं तो इस तरह गीत गाते हैं:-

कनकी ना कोढा बिलईया राडी खइथे………
बिलईया राडी खइथे…
जागे- जागे सुतिहो भोजली टोनहीं राडी अईथे,
हाहो देवी गंगा…..।

इस प्रकार के गीत से भोजली की पूजा करते हैं। दो हफ़्ते के बाद गाजे-बाजे के साथ उसका विसर्जन करने जाते हैं।

इसी त्योहार में मेरी सहेली ने मुझे भी बुलाया था इसलिए मैं खुद को तैयार कराने के लिए पड़ोस की भाभी का कब से इंतजार कर रही थी। उनका छोटा-सा बेटा था जिसे वह सुला रहीं थीं। मैं उनसे बार-बार जल्दी करने को बोल रही थी ताकि मुझे जाने के लिए देर ना हो जाए और अकेली न हो जाऊं। जैसे ही भाभी बच्चे को सुलाकर मुझे तैयार करने को आई वैसे ही मेरा फ़ोन बजने लगा। मैं डर गई अब तो मैं पक्का लेट हो गई। मेरी सहेली ने कॉल किया है। शायद जल्दी आने को कह रही होगी। मैंने कॉल जल्दी से उठाया लेकिन जो बात सुना उसके बाद मेरा लेट होने का डर भाग गया। भोजली विसर्जन करने का उत्साह भी चला गया।

भाभी ने पूछा अरे!! क्या हुआ जल्दी आओ ना, जब से तो इतनी जल्दी थी। मैं पहले रोनी सी हो गई पर अब मुझे नहीं जाना भाभी…..मैंने कहा।
लीजिए आपकी साड़ी और ये गहनें भी………..

भाभी ने फिर उत्सुक होकर पूछा – क्या हुआ बताओ भी
सुबह से तो इतनी खुश थी, सारा काम भी जल्दी कर लिया, अब अचानक… ????????

तभी मैंने कॉल के बारे में बताया कि मेरी सहेली उषा ने बोला कि मैं भोजली विसर्जन करने ना आऊँ क्योंकि भोजली उषा के चाची के घर में लगी हुई है। जब उषा ने अपनी चाची को मेरे बारे में बताया कि मैं भी आने वाली हूं तो उसके चाची ने मना करने को बोला-

“उन्होंने बोला कि सारथी जाति अछूत है जिसके आने से पवित्र स्थान अपवित्र हो जाते हैं इसलिए तो उन्हें मंदिर में भी महाराज घुसने नहीं देते। यहां ऊंची जाति के घरों की बहुएं आयेंगी। वहां वो लोग उसे देख कर भाग जाएंगी।”

इसलिए मेरी दोस्त ने मुझे आने से मना कर दिया। उषा भी थोड़ी दुःखी और शर्मिंदा थी पर वो अपनी चाची को कुछ बोल नहीं सकती।

मैं रोनी-सी तो हो गई मगर बहुत ज्यादा दुःखी नहीं थी। मुझे पता था कि कुछ ऐसा ही होगा क्योंकि ऐसा मैंने कई बार सामना किया है।

इसके बाद मेरे मन में सवालों का जैसे बांध फूट पड़ा हो कि क्यों मैं इस जाति में पैदा हुई ?
हमको अछूत क्यों समझा जाता है?
इसमें मेरी क्या गलती है कि मैं सारथी जाति से हूँ?

ये उनकी समस्या है जिन्होंने ये भेदभाव,छुआछूत बनाया है। उन्हें शर्मिंदा होना चाहिए जिन्होंने ये घटिया और रूढ़िवादी समाज बनाया है। मैं ऐसे समाज में रहना ही नहीं चाहती ना ही ऐसे समाज के पर्व मनाऊंगी।

ऐसे समाज जहां मंदिरों में सिर्फ ब्राम्हण और बड़ी जाति के माने जाने वाले लोग ही पूजा कर सकते हैं। जो इंसानों को उसके कर्म से या इंसानियत से नहीं बल्कि उन्हें जाति, धर्म में बांटती हो। ऐसा समाज जो भगवान के नाम पर दलितों को नीचा दिखाते हैं और उन्हें लूटते हैं। ऐसे समाज को नहीं मानना। हम ऐसे समाज को बनाने का संघर्ष करेंगे जिसमें जाति या धर्म से नहीं बल्कि लोगों की इंसानियत उनके कर्म से पहचानी जायेगी।

इस खबर को  छत्तीसगढ़ से गायत्री द्वारा रिपोर्ट और संध्या द्वारा संपादित किया गया है। 

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