छतरपुर जिले के ढोढन क्षेत्र में केन–बेतवा परियोजना के तहत बन रहे बांध से दर्जनों गांव प्रभावित हैं। विस्थापन और मुआवजे की मांग को लेकर यहां के ग्रामीण लंबे समय से आंदोलन कर रहे हैं। इन्हीं लोगों के बीच 24 वर्षीय दिव्या अहिरवार भी इस आंदोलन की एक सक्रिय आवाज हैं। दिव्या कहती हैं कि यहां का जंगल आदिवासी समुदाय की आजीविका का सबसे बड़ा सहारा है। उन्होंने गांव की महिलाओं को अपने अधिकारों और विस्थापन के खिलाफ डटकर लड़ते देखा है। उनके मुताबिक महिलाएं इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं और अपने हक की लड़ाई खुद लड़ रही हैं। दिव्या का कहना है कि ये महिलाएं सिर्फ विस्थापन का दर्द नहीं झेल रहीं हैं। कई बार घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं का भी सामना करती हैं। इसके बावजूद वे जंगल से मिलने वाले संसाधनों के सहारे अपने परिवार का पालन-पोषण करती हैं। दिव्या कहती हैं कि बचपन में पिता के निधन के बाद उन्होंने भी कठिन परिस्थितियों का सामना किया। शायद यही वजह है कि वे आदिवासी महिलाओं के संघर्ष को अपना संघर्ष मानती हैं और उनके साथ मिलकर उनकी आवाज बुलंद कर रही हैं।
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