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दिल्ली में पटाखों पर रोक, पटाखे 200 से 2,000 गुना अधिक उगलते हैं जहर

वर्ष 2017 में दिवाली पर पटाखों की बिक्री पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाये गए प्रतिबंध का लोग विरोध कर रहे है, लेकिन यह आतिशबाजी या पटाखों से उत्पन्न प्रदूषण हमारे सोचे जाने से कहीं अधिक प्रदूषण फैलाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, दिल्ली विश्व का 11वां सबसे अधिक प्रदूषित शहर है। जिसको देखते हुए, 8 अक्टूबर, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने दीपावली से पहले (31 अक्टूबर 2017 तक), वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी की चिंताओं पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पटाखों की बिक्री पर रोक लगाने की घोषणा की।
भारत ने पीएम 2.5 के लिए 60 μg / m³ (प्रति घन मीटर प्रति माइक्रोग्राम) के 24 घंटे का मानक निर्धारित किया है, जबकि डब्ल्यूएचओ में 25 μg / m³ मानक भी कम है। पीएम 2.5 मानव बालों से 30 गुना ज्यादा महीन होता है, जो मानव अंगों और रक्त प्रवाह में जमा होते हैं, जिससे बीमारी और मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है।
कमजोर प्रतिरक्षा और कमजोर श्वसन प्रतिक्रियाओं वाले बच्चों में विशेष रूप से जोखिम ज्यादा होता है। ‘चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ के वरिष्ठ वैज्ञानिक स्नेहा लिमये का कहना है कि “बच्चे, विशेष रूप से, फुलझड़ी, पुल-पुल और साँप की गोली मुश्किल से एक फुट या दो फुट की दूरी से जलाते हैं और ऐसा करते हुए वे धुआं कणों की एक बड़ी मात्रा में साँस लेते हैं, जो उनके फेफड़ों तक पहुंचती है।”
2016 में पटाखों के कारण प्रदूषण का आकलन करने में, भारत के ‘चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन’ और पुणे विश्वविद्यालय के ‘इन्टर्डिसप्लनेरी स्कूल ऑप हेल्थ साइंस’ के छात्रों ने प्रत्येक पटाखे को जलाने पर, उसके जलाये जाने की दूरी से उत्सर्जित कण पदार्थ को मापा है।
सांप टैबलेट पीएम 2.5 के उच्चतम स्तर का उत्सर्जन करता है। इसके बाद लड़ी, पुलपुल, फुलझड़ी, चकरी और अनार उत्सर्जन करता है। हालांकि सांप टैबलेट केवल नौ सेकेंड तक जलती है लेकिन यह 64.500 ग्राम / एम 3 के सर्वोच्च स्तर पीए 2.5 स्तर का उत्सर्जन करता है जो कि डब्लूएचओ मानकों से -2,560 गुना अधिक है। वहीं लड़ी का उत्पादन पीएम 2.5 के स्तर का 38,540 ग्राम / एम 3 है जो कि डब्ल्यूएचओ मानकों से 1,541 गुना अधिक है। लेख साभार: इंडियास्पेंड  

फोटो साभार: इंडियास्पेंड