खबर लहरिया Blog UP/Varanasi: मीना बाजार में मसाले की बिक्री और खरीद, व्यापार का नया आइडिया 

UP/Varanasi: मीना बाजार में मसाले की बिक्री और खरीद, व्यापार का नया आइडिया 

वाराणसी जिले में लगने वाला मीना बाजार अब सिर्फ खरीदारी की जगह नहीं रहा बल्कि यह लोगों के लिए रोजगार और छोटे कारोबार का मजबूत जरिया बनता जा रहा है। खासकर चिरईगांव ब्लॉक में लगने वाला मीना बाजार आसपास के गांवों के लोगों के लिए काफी अहम हो गया है।

रिपोर्टिंग-सुशीला, लेखन – रचना 

मीना बाजार में बिकते सामान और भीड़ (फोटो साभार: सुशीला)

यहां एक ही जगह पर जूते, कपड़े, सब्जियां और तरह-तरह के मसाले आसानी से मिल जाते हैं। लोग यहां आकर समय भी बचाते हैं और सस्ते दाम में सामान भी खरीद लेते हैं।

मसालों का कारोबार बना कमाई का जरिया

इसी बाजार ने उमरहा गांव के मिट्ठूलाल की जिंदगी बदल दी। पहले वे छोटे-मोटे काम करके किसी तरह घर चलाते थे लेकिन कोरोना लॉकडाउन के दौरान जब काम बंद हो गया तो परिवार चलाना मुश्किल हो गया। ऐसे में उन्होंने घर पर ही मसाले तैयार कर बेचने का काम शुरू किया। शुरुआत में वे साइकिल से गांव-गांव जाकर मसाले बेचते थे लेकिन बाद में उन्हें मीना बाजार के बारे में पता चला और उन्होंने यहीं दुकान लगानी शुरू कर दी।

धीरे-धीरे लोगों को उनके मसालों का स्वाद पसंद आने लगा और उनका काम चल निकला। आज वे इसी काम के जरिए अपने पूरे परिवार का खर्च उठा रहे हैं। उनके पास करीब 40 तरह के मसाले हैं जो 10 रुपए से लेकर 100 रुपए तक की कीमत में मिल जाते हैं।

ग्राहक को हल्दी पाउडर को कागज में देते हुए मिट्ठूलाल (फोटो साभार: सुशीला)

घर के बने मसालों की बढ़ती मांग

मिट्ठूलाल बताते हैं कि उनके मसाले घर पर ही तैयार होते हैं इसलिए लोग इन्हें ज्यादा पसंद करते हैं। इन मसालों में मिलावट नहीं होती और स्वाद भी अच्छा होता है। यही वजह है कि खासकर महिलाएं यहां से मसाले खरीदना ज्यादा पसंद करती हैं। बाजार में जीरा, हल्दी, लाल मिर्च जैसे मसाले 10 रुपए प्रति गिलास से शुरू हो जाते हैं जबकि गरम मसाला 50 रुपए में मिल जाता है।

मीना बाजार में बिक रहे कई तरह के रंग बिरंगे मसालें (फोटो साभार: सुशीला)

गांव की रहने वाली सुनीता बताती हैं कि मीना बाजार उनके घर से सिर्फ 1 किलोमीटर दूर है इसलिए उन्हें मसाले लेने के लिए कहीं और जाने की जरूरत नहीं पड़ती। यहां के मसाले सस्ते भी हैं और ताजे भी इसलिए वे बार-बार यहीं से खरीदारी करती हैं।

छोटे कारोबार से चल रहा घर

मिट्ठूलाल जैसे कई लोग हैं जो इसी तरह छोटे-छोटे काम से अपना घर चला रहे हैं। उनके परिवार में सात लोग हैं और वे अकेले इस काम से पूरे परिवार की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। आज के समय में जहां नौकरी मिलना मुश्किल है वहां ऐसे छोटे कारोबार ही लोगों के लिए सहारा बन रहे हैं।

ऐसे काम भले छोटे दिखते हों लेकिन इनके जरिए कई परिवारों की रोजी-रोटी चल रही है। अगर सही तरीके से मेहनत और ग्राहकों का भरोसा बना रहे तो यही छोटा काम एक मजबूत रोजगार में बदल सकता है।

खेत से बाजार तक का सफर

मिट्ठूलाल के पास कुछ मसाले अपने ही खेत से आते हैं जैसे हल्दी, सरसों और मिर्च। बाकी मसाले वे बाजार से खरीदकर तैयार करते हैं। वे हफ्ते में तीन दिन अलग-अलग जगहों पर मीना बाजार में दुकान लगाते हैं। हर सोमवार को चिरईगांव, बुधवार को पुराने पुल के पास और शुक्रवार को कचहरी के पास। सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक वे दुकान संभालते हैं।

वे बताते हैं कि यह काम मेहनत जरूर मांगता है लेकिन इससे उन्हें संतोष मिलता है कि वे अपने परिवार के लिए कुछ कर पा रहे हैं। उनकी कहानी यह दिखाती है कि अगर इरादा मजबूत हो तो छोटे से काम से भी जिंदगी को बेहतर बनाया जा सकता है।

खड़े मसालों की अलग अलग पुड़िया जिसमें काली मिर्च, इलाइची, जीरा, लौंग शामिल है। (फोटो साभार: सुशीला)

पहले यह मसाले 5 रुपए प्रति गिलास में दिए जाते थे लेकिन महंगाई को देखते हुए अब उनका मूल्य 10 रुपए प्रति गिलास हो गया है। गांव में घूम-घूमकर बेचने के दौरान मिट्ठूलाल को पता चला कि चिरईगांव ब्लॉक में मेला लगता है। वहां हर सोमवार काफी लोग विशेषकर महिलाएं और पुरुष आते हैं। तब उन्होंने सोचा कि क्यों न गांव में घूमने के बजाय मेले में बैठकर मसाले बेचे जाएं।

उन्होंने सबसे पहले इसी मेले से अपनी बिक्री शुरू की। इसके बाद उन्होंने दो-तीन अन्य स्थानों पर भी मेले में अपनी जगह बनाई। उन्हें यह अनुभव हुआ कि गांव-गांव घूमने से बेहतर बिक्री मेले में हो रही है। यहाँ बिक्री का कोई निश्चित मोल नहीं है लोग 20, 100 और 200 रुपए तक के मसाले खरीदते हैं। गरम मसाले, मिक्सर और अलग-अलग मसालों की मांग भी रहती है। इस मेले से उन्हें काफी फायदा हुआ। तभी से उन्होंने गांव-गांव घूमना बंद कर दिया और मेले में ही अपनी बिक्री शुरू कर दी। वर्तमान में उनके पास लगभग 40 प्रकार के मसाले विशेषकर गरम मसाले उपलब्ध हैं। इसी काम से मिट्ठूलाल का जीवन भी चल रहा है। 

 

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