उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले के बसहरा गांव में बाल्मीकि समुदाय के लोग रहते हैं। ये लोग मुख्य रूप से बांस से बने पारंपरिक सामान तैयार करते हैं, जो उनकी आजीविका का प्रमुख साधन और उनका पुश्तैनी काम है। आज भी जातिगत व्यवस्था के कारण उन्हें कई जगहों पर अछूत माना जाता है। जिन लोगों को सामाजिक रूप से दूर रखा जाता है, उनके बनाए बांस के बर्तन शादी, पूजा और अन्य शुभ अवसरों पर जरूरी माने जाते हैं।
रिपोर्ट – सुनीता, लेखन – सुचित्रा
सामाजिक भेदभाव लेकिन उनके बनाए बर्तन के बिना रस्म अधूरी
गांव की रेखा बताती हैं कि आज भी कई जगहों पर उनके साथ छुआछूत किया जाता है। उन्हें साथ बैठकर खाना नहीं खिलाया जाता, अलग बर्तन दिए जाते हैं और कपड़ों तक को छूने नहीं दिया जाता। शादी-विवाह जैसे शुभ मौकों पर बिना उनके बनाए बांस के बर्तनों के कोई भी रस्म पूरी नहीं मानी जाती।
दौरी, सूप, झपलैया, डलिया जैसे बांस के पारंपरिक बर्तन हर शादी का अहम हिस्सा होते हैं। रेखा कहती हैं, “जब तक हम ये बर्तन नहीं देंगे, शादी को शुभ नहीं माना जाता।” यानी जिस समाज में उन्हें बराबरी नहीं मिलती, वही समाज उनकी मेहनत पर निर्भर भी है।
भले ही समाज उन्हें बराबरी का दर्जा न दे, लेकिन बांस के सुंदर और रंग-बिरंगे बर्तन बनाने की उनकी कला अद्वितीय है, जिसे हर कोई आसानी से नहीं कर सकता।
बांस का काम आजीविका का एकमात्र साधन
बांस के बर्तन बनाने का काम करने वाली रेखा बताती हैं कि यह काम सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि आजीविका का एकमात्र साधन भी है। शादी के मौसम में ही उनकी कमाई होती है, जो पूरे साल के खर्च को संभालती है। परिवार के सभी लोग मिलकर रोज बांस के बर्तन बनाते हैं—कभी ऑर्डर पर, तो कभी बाजार के लिए।
बर्तन बनाने की प्रक्रिया जोखिम भरी और मुश्किल
इस गांव के निवासी दीपक बताते हैं कि यह काम पीढ़ियों से चला आ रहा है। बांस ढूंढने के लिए 30–40 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है, उसे काटकर सिर या साइकिल से लाना होता है। फिर उसे चीरकर पतली पट्टियां बनाई जाती हैं और उनसे बर्तन तैयार किए जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में कई दिन लग जाते हैं और हाथों में चोट लगना आम बात है।
एक बांस की कीमत 500–600 रुपये तक होती है, जिससे करीब 10–12 दौरी बनती हैं। बाजार में एक सूप करीब 100 रुपये, दौरी 200 रुपये और छोटे बर्तन 50 रुपये तक बिकते हैं। मेहनत के मुकाबले आमदनी कम है, लेकिन यही उनका सहारा है।
बांस के बने बर्तन माने जाते शुभ
आधुनिकीकरण के चलते आज शहर हो या गांव, हर जगह प्लास्टिक और स्टील के बर्तनों का इस्तेमाल बढ़ गया है। इसके बावजूद परंपरा के नजरिए से बांस से बनी वस्तुओं को आज भी शुभ माना जाता है।
शादी, पूजा या कोई भी बड़ा त्योहार हो—इन सभी अवसरों पर बांस के बर्तनों का उपयोग किया जाता है। इन बर्तनों में भगवान को चढ़ाने के लिए फल रखे जाते हैं, वहीं शादी-विवाह में फल और मिठाइयों के लेन देन के लिए भी इनका विशेष महत्व होता है। खासकर माता-पिता और पुरानी पीढ़ी के लोग इस परंपरा को निभाना जरूरी मानते हैं।
बसहरा गांव में बाल्मीकि समुदाय ही इस तरह के बांस के बर्तन बनाते हैं और जो लोग उन्हें अछूत समझते हैं उनके लिए ये बर्तन खरीदना मज़बूरी हो जाता है। हालांकि समय के साथ छुआछूत में कुछ कमी आई है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई। कई गांवों में आज भी अलग हैंडपंप या पानी भरने की व्यवस्था देखने को मिलती है।
एक और बड़ी समस्या बांस की कमी है। अब किसान बांस उगाने से बचते हैं, जिससे कच्चा माल मिलना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में इस पुश्तैनी काम के बंद होने का खतरा भी बढ़ रहा है। यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उस सच्चाई की है जहां एक समुदाय समाज के लिए जरूरी है, लेकिन उसे बराबरी का दर्जा अब भी नहीं मिला है।
सवाल सिर्फ रोजी-रोटी का नहीं, बराबरी का भी
बसहरा गांव की यह कहानी सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है। यह उस सच्चाई को सामने लाती है जहां एक समुदाय समाज के हर शुभ काम में जरूरी है, लेकिन उसे बराबरी का सम्मान अब भी पूरी तरह नहीं मिला है। जिस हाथ के बने बर्तन शादी को शुभ बनाते हैं, क्या उस हाथ को समाज बराबरी से स्वीकार करेगा?
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