बांदा जिले के नरैनी ब्लॉक की ग्राम पंचायत जमवारा का मजरा शकरीया पुरवा आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में संघर्ष कर रहा है। गांव के लोग पिछले दो दशकों यानी 20 साल से श्मशान घाट और सड़क चौड़ीकरण जैसी मूलभूत सुविधाओं की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें केवल आश्वासन ही मिला है। जमीनी स्तर पर कोई ठोस काम नहीं हो सका है जिससे ग्रामीणों में गहरी नाराजगी और निराशा है।
रिपोर्ट – गीता, लेखन – सुचित्रा
जब परिवार में किसी की मृत्यु हो जाती है तो ऐसे समय में परिवार अपने किसी प्रियजन की यादों में डूबा होता है। इस हालत में उन्हें रास्तों, जलभराव और स्थान की कमी जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है। यह स्थिति किसी भी मानवीय समाज के लिए अत्यंत दुखद और चिंताजनक है। ग्रामीणों का कहना है कि जिस प्रकार प्रत्येक ग्राम पंचायत में बाउंड्री वॉल सहित व्यवस्थित श्मशान घाट और पानी की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है, उसी तरह उनके गांव में भी यह सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए, जिसकी वे पिछले 20 वर्षों से लगातार मांग कर रहे हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, उनके यहां श्मशान घाट के लिए भूमि (गाटा संख्या 1161) भी उपलब्ध है लेकिन अभी तक उसका सीमांकन और विकास नहीं हो सका है और आसपास के लोग उस भूमि पर खेती करते आ रहे हैं। इस भूमि की नाप-जोख और श्मशान घाट निर्माण को लेकर उन्होंने कई बार राजस्व विभाग और लेखपाल से भी मांग की है।
श्मशान घाट की कमी से बढ़ती मुश्किलें
गांव के निवासी प्रेम लाल, जो वर्तमान में पुणे में रहकर पेंटिंग का काम करते हैं। उन्होंने बताया कि वे पिछले 20 वर्षों से एक स्थायी और व्यवस्थित श्मशान घाट की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि श्मशान घाट किसी भी समाज की बुनियादी आवश्यकता है, लेकिन यहां श्मशान न होने ने लोगों की पीड़ा को कई गुना बढ़ा दिया है।
गांव की रहने वाली 65 वर्षीय सुमित्रा कहती हैं कि हर परिवार की यह इच्छा होती है कि उसके दिवंगत सदस्य को पूरे सम्मान और रीति-रिवाजों के साथ अंतिम विदाई दी जाए। लेकिन जब गांव में श्मशान घाट ही नहीं हो, तो यह इच्छा पूरी करना बेहद कठिन हो जाता है।
वे बताती हैं कि गांव में जब किसी बुजुर्ग, माता-पिता, भाई, बहन या किसी मासूम बच्चे का निधन हो जाता है, तो शोक में डूबे परिजनों के सामने सबसे बड़ी चिंता यह खड़ी हो जाती है कि अंतिम संस्कार कहां किया जाए। भूमिहीन परिवारों के पास अपनी जमीन नहीं है और गांव में कोई सरकारी श्मशान घाट भी उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में उन्हें मजबूरन दूर-दराज के स्थानों या खेतों के किनारे कहीं भी अंतिम संस्कार करना पड़ता है।
कई बार तो हालात ऐसे बन जाते हैं कि अंतिम संस्कार के लिए दूसरों की जमीन पर अनुमति मांगनी पड़ती है। अपने प्रियजन को खोने के दुख के बीच यह मजबूरी परिवारों को भीतर तक झकझोर देती है। शोक की घड़ी में सम्मानजनक अंतिम संस्कार के लिए भटकना उनके दर्द को और बढ़ा देता है।
गांव में अधिकतर दलित और भूमिहीन परिवार
गांव की अधिकतर आबादी दलित और भूमिहीन परिवारों की है जो रोज़गार के लिए दूसरे शहरों में काम करते हैं। ऐसे में जब गांव में किसी की मृत्यु होती है तो अंतिम संस्कार को लेकर सबसे बड़ी समस्या खड़ी हो जाती है। कई बार परिजनों को खेतों या दूसरों की निजी जमीन पर अंतिम संस्कार करना पड़ता है जिससे दुख की घड़ी और भी कठिन हो जाती है।
बरसात में और बढ़ जाती है परेशानी
बरसात के मौसम में स्थिति और भी भयावह हो जाती है। धनहा क्षेत्र होने के कारण खेतों में पानी भर जाता है जिससे शव को अंतिम संस्कार स्थल तक ले जाना बेहद कठिन हो जाता है। परिजन कई बार कीचड़ और पानी के बीच घुटनों तक चलकर अंतिम संस्कार करने को मजबूर होते हैं।
सड़क चौड़ीकरण की भी लंबी मांग
गांव के शिवराम बताते हैं कि करतल मुख्य मार्ग से आनंदी कबीर दास के घर तक लगभग 200 मीटर लंबी सीसी सड़क बनी हुई है लेकिन यह बहुत संकरी है। इस रास्ते से रोज़ाना सैकड़ों लोग गुजरते हैं जिससे अक्सर जाम की स्थिति बन जाती है।
एंबुलेंस, स्कूल बस और बड़े वाहनों को निकलने में भारी परेशानी होती है। कई बार आपात स्थिति में मरीजों तक समय पर एंबुलेंस नहीं पहुंच पाती जिससे जान पर भी खतरा बन जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क चौड़ीकरण की मांग कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से की गई लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
ग्रामीणों की भावनाएं और नाराजगी
गांव के लोगों का कहना है कि विधानसभा चुनाव 2027 आने वाले हैं तो चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं लेकिन जीत के बाद समस्याओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है। ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने 3 अप्रैल 2026 को विधायक को ज्ञापन भी सौंपा लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं मिला।
कुछ ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि इस बार भी समस्या का समाधान नहीं हुआ तो वे मतदान को लेकर पुनर्विचार करेंगे।
श्मशान घाट दूर होने पर महिलाओं की भी शिकायत
65 वर्षीय सुमित्रा देवी कहती हैं कि हर परिवार चाहता है कि उसके परिजन को सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई मिले लेकिन श्मशान घाट न होने के कारण यह संभव नहीं हो पाता। कई बार मजबूरी में खेतों या दूर-दराज स्थानों पर अंतिम संस्कार करना पड़ता है, जो अत्यंत दुखद है।
बजट सीमित, अभी काम हो पाना मुश्किल – प्रधान
ग्राम प्रधान महफूज हुसैन का कहना है कि उन्होंने विधायक और संबंधित अधिकारियों से लगातार मांग की है। उन्होंने बताया कि श्मशान घाट के लिए जमीन (गाटा संख्या 1161) उपलब्ध है और वह इसे ‘मुक्ति धाम’ के रूप में विकसित कराने के लिए प्रयासरत हैं। उनका कहना है कि बजट सीमित होने के कारण ब्लॉक स्तर पर तुरंत कार्य संभव नहीं है, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही इस दिशा में काम शुरू होगा।
श्मशान घाट को लेकर विधायक और सांसद पर आरोप
नरैनी के खंड विकास अधिकारी प्रमोद कुमार सिंह का कहना है कि यदि प्रशासन की ओर से पर्याप्त श्मशान घाट उपलब्ध कराए जाएं तो वे हर ग्राम पंचायत में इसे प्राथमिकता के आधार पर बनवा सकते हैं। उन्होंने कहा प्रत्येक ग्राम पंचायत में श्मशान घाट अत्यंत आवश्यक है और कई जगहों पर तो जनसंख्या और भौगोलिक स्थिति को देखते हुए दो श्मशान घाट भी जरूरी हो जाते हैं।
उन्होंने बताया कि समस्या यह है कि शासन स्तर से वर्ष में केवल एक या दो ही श्मशान घाट पास होकर आते हैं। वे भी कई बार विधायक या सांसद सिफारिश कर अपने वहां बनवा लेते हैं तो ऐसे में वो भी क्या करें?
फिर भी उन्होंने कहा कि यदि ग्राम पंचायतों से प्रस्ताव प्राप्त होते हैं तो वे उन्हें आगे सीडीओ कार्यालय को भेज देंगे। पिछले वर्ष भी दो श्मशान घाट पास हुए थे जिनमें से एक महोतरा गांव में और दूसरा बसरही गांव में बनवाया गया था।
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