खबर लहरिया Blog UP,Ayodhya/Ground Report: दातून जो दातों की सफाई और आस्था के साथ गरीब परिवारों का रोजगार भी है, जाने कैसे

UP,Ayodhya/Ground Report: दातून जो दातों की सफाई और आस्था के साथ गरीब परिवारों का रोजगार भी है, जाने कैसे

       

परिवार सुबह-सुबह अपनी दातून लेकर घाट और उसके आसपास पहुंच जाते हैं। कोई जमीन पर बोरी बिछाकर दातून के गट्ठर रखता है तो कोई छोटी-सी दुकान लगा लेता है। नीम, भटवास और दूसरे पेड़ों की ताजी टहनियों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तैयार करके बेचा जाता है। डॉ. कहते हैं बाजार में मिलने वाले टूथपेस्ट में कई तरह के केमिकल होते हैं और प्लास्टिक के ब्रश से दांतों को लंबे समय तक रगड़ने पर भी नुकसान हो सकता है।

रिपोर्ट – गीता, लेखन – रचना 

दातून बेच रहे हैं (फोटो साभार: गीता)

टूथब्रश और टूथपेस्ट आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। सुबह उठते ही ब्रश करना इतना सामान्य हो गया है कि शायद ही हम सोचते हों कि इनके आने से पहले लोग दांत कैसे साफ करते थे। भारत में सदियों से पेड़ों और पौधों की मुलायम टहनियों से दांत साफ करने की परंपरा रही है। इसे ही दातून कहा जाता है। नीम, बबूल और कई दूसरे पेड़ों की टहनियों का इस्तेमाल लोग सुबह दांत साफ करने के लिए करते थे।

उस समय दातून किसी खास मौके पर इस्तेमाल होने वाली चीज नहीं थी यह लोगों की रोज की जरूरत थी। गांवों में पेड़ से टहनी तोड़कर उसे छीलकर दातून तैयार कर लिया जाता था। इसके लिए अलग से पैसे खर्च करने की जरूरत भी नहीं पड़ती थी। कहीं न कहीं ये उसी घने जंगल का भी एक हिस्सा था तो अभी के समय में तेजी से काटे जा रहे हैं। कई लोग आज भी मानते हैं कि दातून करने से दांत और मसूड़े मजबूत रहते हैं। अब टूथपेस्ट और ब्रश के बढ़ते इस्तेमाल के साथ रोजाना दातून करने की आदत कम भी होती जा रही। लेकिन हां ग्रामीण क्षेत्र में आज भी लोग दातुन ही इस्तेमाल करते हैं। अब इस दातून की जगह जरूर बदल गई है। ये रोज की आदत से निकलकर अब कई जगह धार्मिक रीति-रिवाजों और आस्था से जुड़े मौकों का हिस्सा बन गया है। 

अयोध्या में सरयू स्नान के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। सुबह घाटों पर स्नान और पूजा के बाद कई लोग दातून भी खरीदते हैं। इसी वजह से सरयू किनारे दातून बेचने वालों की रोज सुबह एक छोटी-सी बाजार सज जाती है। ग्रामीण इलाकों से आए परिवार सुबह-सुबह अपनी दातून लेकर घाट और उसके आसपास पहुंच जाते हैं। कोई जमीन पर बोरी बिछाकर दातून के गट्ठर रखता है तो कोई छोटी-सी दुकान लगा लेता है। नीम, भटवास और दूसरे पेड़ों की ताजी टहनियों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तैयार करके बेचा जाता है। श्रद्धालु अपनी जरूरत के हिसाब से दातून खरीदते हैं और कई लोग इसे सरयू स्नान के बाद दांत साफ करने के लिए इस्तेमाल करते है और कई लोग अपने आस्था के लिए। 

इन दुकानदारों के लिए दातून बेचना उनकी रोज की कमाई का हिस्सा होता है। सुबह कुछ घंटों में होने वाली बिक्री उनके परिवार के खर्च में मदद करती है। पेड़ों से मिलने वाली इन टहनियों को इकट्ठा करना, उन्हें दातून के आकार में तैयार करना और फिर अयोध्या लाकर बेचना इनके रोज के काम का हिस्सा है। अयोध्या जैसे धार्मिक शहरों में यह अब भी लोगों की जरूरत से जुड़ा हुआ है चाहे वो किसी भी तरह से हो। सरयू किनारे लगी छोटी-छोटी दुकानें और इसके सहारे से कुछ परिवार अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं।

दातून बेचने वालों की कहानी 

दुर्गागंज गांव की रहने वाली रानी रोज सुबह करीब 5:30 बजे घर से निकलती हैं और सरयू किनारे सड़क पर अपनी दातून की छोटी-सी दुकान लगाती हैं। वह सड़क किनारे बोरी बिछाकर उस पर नीम और बबूल के पेड़ों से तोड़कर लाई गई दातून सजा देती हैं। रानी करीब 8 बजे तक यहां बैठकर दातून बेचती हैं और इन दो से ढाई घंटों में लगभग 100 रुपये तक कमा लेती हैं।उनके लिए दातून बेचना कोई बड़ा कारोबार तो नहीं है लेकिन रोज की जरूरतों में मदद करने वाली एक छोटी कमाई जरूर है।रानी अकेली नहीं हैं। सरयू के आसपास सड़क किनारे सुबह के समय ऐसी कई महिलाएं और पुरुष दिखाई देते हैं, जो जमीन पर बोरी बिछाकर दातून की दुकान लगा लेते हैं।

इन परिवारों के लिए दातून बेचने का काम कुछ घंटों की छोटी-सी दुकान से कहीं ज्यादा मायने रखता है। कुछ परिवार ऐसे भी हैं जिनकी दिन की कमाई का बड़ा हिस्सा इसी छोटी-सी दुकान से निकलता है। 

गांव के पेड़ों से शुरू होती है रोजी-रोटी की कहानी

दातून बेचने वाले ज्यादातर लोग आस-पास के गांव से आते हैं। वे सुबह अपने गांवों के नीम और बबूल के पेड़ों से दातून की पतली टहनियां तोड़कर उसको साफ करते हैं और फिर उसके छोटे-छोटे टुकड़े काट कर गठ्ठा बनाते हैं और अयोध्या में सरयू नदी के पास पहुंच जाते हैं। इस काम में उन्हें कोई बड़ी पूंजी नहीं लगानी पड़ती क्योंकि गांव में जो पेड़ रहते हैं उन्हीं में चढ़कर या फिर लाठी-डंडे कि मदद से दातून के लिए टहनियों को तोड़ दिया जाता है। यही वजह है कि बिना खर्च वह लोग हर दिन अपनी मेहनत से कुछ कमाई कर लेते हैं।

दातून और दांतों को लेकर डॉक्टर क्या कहते हैं? 

ये तो रही आस्था और परंपरा की बात। इसके अलावा दातून का इस्तेमाल कितना और क्यों लाभदायक है इसे भी समझना जरुरी है। दातून के इस्तेमाल को लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नरैनी के डेंटल हाइजीनिस्ट डॉ. उमेश से बात करने पर बताते हैं कि दातून यहां कोई नई चीज नहीं है। गांवों में लोग इसे पीढ़ियों से दांत साफ करने के लिए इस्तेमाल करते आ रहे हैं। बाजार में मिलने वाले टूथपेस्ट में कई तरह के केमिकल होते हैं और प्लास्टिक के ब्रश से दांतों को लंबे समय तक रगड़ने पर भी नुकसान हो सकता है। दातून पेड़ की टहनी से तैयार होती है इसलिए इसे इस्तेमाल करने का तरीका भी अलग है। दातून से दांत साफ करते समय टहनी धीरे-धीरे घिसती और टूटती रहती है। इससे ब्रश की तरह गर्म होने की समस्या नहीं होती। इसके लिए न टूथपेस्ट खरीदना पड़ता है और न ही किसी खास चीज की जरूरत होती है।

हालांकि वह यह भी कहते हैं कि दातून करने का मतलब यह नहीं है कि दांत कभी खराब नहीं होंगे। आज लोगों का खान-पान पहले से काफी बदल गया है और इसका असर दांतों पर भी पड़ता है। दातून करने वाले व्यक्ति के दांतों में भी समस्या हो सकती है और टूथपेस्ट इस्तेमाल करने वाले के भी। उनके अनुसार दातून हमारे पारंपरिक और प्राकृतिक तरीकों में से एक है जो दांतों की सफाई में मदद करता है और सही तरीके से इस्तेमाल करने पर दांतों को नुकसान पहुंचाने की संभावना कम रहती है।

आज भी पुरानी परंपरा बरकरार है

हमीरपुर से अयोध्या घुमने गये एक 65 वर्षीय मनोहर का कहना है कि दातून हमारे भारतीय संस्कृति का सदियों पुराना हिस्सा है। पहले हर घर में सुबह मुखारी करने के लिए दातुन आती थी। मंजन का इस्तेमाल गांवों में बहुत ही कम था। अब आधुनिक समय में भले ही मंजन और ब्रस अलग-अलग प्रकार का चलन बढ़ गया हो पर आज भी बड़ी संख्या में लोग नीम और बबूल की दातून को प्राथमिकता देते हैं। मनोहर आगे कहते हैं कि अपने गांव में भी वह सुबह नीम के पेड़ से दातून तोड़कर ही नीम कि दातून ही इस्तेमाल करते हैं और मसूड़ों के लिए भी दातुन बहुत लाभकारी माना जाता है। 

दातून बेचने वालों के पास न कोई बड़ी दुकान होती है और न ही कोई स्थायी ठिकाना। वे तो सड़क किनारे जमीन पर एक बोरी या कपड़ा बिछाकर अपनी दुकान लगाते हैं। 

सरजू घाट के पास चाय का ठेला लगाए व्यक्ति कहता है कि सूरज निकलने से पहले गांव से दातून लेकर शहर में सरजू नदी के पास पहुंचना और दो-तीन घंटे तक बेचना और फिर वापस घर लौटना यही दातून बेचने वाले उन परिवारों की हर दिन कि दिनचर्या है। हालांकि कमाई सीमित होती है लेकिन यह काम उनके लिए एक रोजगार का माध्यम है। बिना किसी सरकारी सहायता या बड़ी पूंजी के केवल अपनी मेहनत के दम पर रोज सब्जी भाजी के लिए कमा लेते है। 

एक तरफ यह लोगों को पेड़-पौधों और पुराने प्राकृतिक तरीकों से जोड़ती है तो दूसरी तरफ इसे बेचने वाले परिवारों के लिए रोज की जरूरतें पूरी करने का जरिया है। 

 

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