छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के अंतर्गत आने वाला सोनाखान क्षेत्र अपने जंगलों में छिपे सोने के भंडारों और ऐतिहासिक महत्व (शहीद वीर नारायण सिंह की जन्मभूमि) के लिए जाना जाता है। यहाँ के बाघमारा (या बाघमोडा) के जंगलों में देश की पहली निजी और राज्य की पहली स्वर्ण खदान विकसित की जा रही है।
रिपोर्ट – चंद्रकुमारी, लेखन – रचना
सोनाखान के जंगलों में केवल सोना ही नहीं हैं इन जंगलों में वन्य जीव पेड़ पौधे भारी संख्या में मौजूद हैं। इन जंगलों में पिछले कई दशकों छोटे बड़े गांव भी मौजूद हैं। सोनाखान क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 24 गांव की लगभग 474 हेक्टेयर भूमि इस इलाके में पड़ती है। जंगलों से घिरा यह क्षेत्र पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है। यहाँ बाघ, तेंदुआ, भालू, हिरन समेत कई वन्य जीव रहते हैं। ऐसे में प्रस्तावित सोना खनन परियोजना का असर न सिर्फ जंगलों पर बल्कि वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास पर भी पड़ सकता है।
बता दें यहाँ के स्थानीय लोगों का कहना है कि यहाँ के जमीन पर 27 टन सोना है। शायद इसी लिए सोनाखान पर सबकी नज़रें हैं। भारत सरकार की पहली ई-नीलामी प्रक्रिया में वेदांता समूह (Vedanta Limited) ने इस खदान को अपने नाम किया है। कंपनी द्वारा अत्याधुनिक मशीनों से ड्रिलिंग और खोज का काम शुरू किया जा चुका है। जानकारी के मुताबिक यहाँ की जमीन को वेदांता कंपनी को लिज़ पर देने की बात सामने आई है। अब वर्तमान में खदान के लिए जंगलों के काटे जाने और पर्यावरण/विस्थापन के डर को लेकर स्थानीय आदिवासी और ग्रामीण लगातार विरोध और प्रदर्शन भी कर रहे हैं। हालाँकि अपनी जल जंगल जमीन के लिए यहाँ के आदिवासी पिछले कई सालों से संघर्ष और लड़ाई कर रहे हैं।
वेदांता भारत की सबसे बड़ी खनन (Mining) और प्राकृतिक संसाधनों (Natural Resources) की कंपनियों में से एक है। यह मुख्य रूप से एल्युमिनियम, जिंक, लेड, सिल्वर, कॉपर, कच्चा तेल, लौह अयस्क (Iron Ore) और बिजली बनाती है। इस विशाल कंपनी के मालिक और संस्थापक अनिल अग्रवाल हैं।
जंगल ही आजीविका का सहारा
स्थानीय लोगों के अनुसार खनन के लिए चिन्हित क्षेत्र में दो लाख से अधिक पेड़ हैं जिनमें बांस, तेंदुआ, महुआ और कई प्रकार की इमारती लकड़ियाँ शामिल हैं। यही जंगल आसपास के गांवों के लोगों की आजीविका का प्रमुख आधार है। वन उपज, खेती और जंगल से मिलने वाले संसाधनों के सहारे यहाँ के लोग पीढ़ियों से अपना जीवन चलाते आ रहे हैं। यह इलाका एतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह शहीद वीर नारायण सिंह की जमींदारी का हिस्सा रहा है। इसलिए यहाँ रहने वाले लोगों का जंगल और जमीन से आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़ाव है।
सोनाखान के वन प्रबंधन समिति के अध्यक्ष रामायण सिंह कहते हैं कि अगर सोनाखान में खनन शुरू होता है तो उनका जंगलों से जुड़ा जीवन पूरी तरह प्रभावित होगा। अभी वे तेंदू पत्ता, चार, महुआ, कोया और अन्य वन उपज से अपनी आजीविका चलाते हैं लेकिन अगर खनन होता है इन संसाधनों तक उनकी पहुंच खत्म हो सकती है। उनका कहना है कि यदि सरकार उन्हें किसी दूसरी जगह विस्थापित करती है तो नई जगह पर जीवन फिर से बसाना आसान नहीं होगा। जमीन और जंगल छिन जाने पर रोजगार की तलाश में पलायन करना पड़ सकता है। जिस तरह का जीवन उनके पूर्वजों ने कभी नहीं जिया वैसी परिस्थितियों में उन्हें मजबूर होकर काम करना पड़ सकता है। इसलिए वे अपनी जंगल और जमीन और पारंपरिक जीवन शैली को बचाए रखने की मांग कर रहे हैं।
लोगों की चिंता और दर्द
दूसरी ओर सोनाखान और उसके आसपास के क्षेत्रों में जमीन के नीचे सोने की भंडार होने की बात सामने आने के बाद खनन की संभावनाएं बढ़ी हैं। इसी को लेकर क्षेत्र में जल जंगल और जमीन बचाने की माँग के साथ आंदोलन भी चल रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि ग्राम सभाओं की सहमति के बिना किसी भी खनन परियोजना को आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। वे अपने क्षेत्र में खनन कंपनी नहीं चाहते और चाहते हैं कि उनके पारंपरिक अधिकारों और जंगलों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए।
सचिव, वन अधिकार समिति हृदयलाल सिंह ठाकुर कहते हैं कि वे अपने क्षेत्र में किसी भी खनन कंपनी को नहीं चाहते क्योंकि इससे उन्हें अपने प्रकृति अपने धरोहर से दूर होना पड़ेगा। खनन कंपनी अपने हितों को ध्यान में रखकर काम करेगी, जबकि स्थानीय लोगों के भविष्य और जीवन पर पड़ने वाले असर की चिंता कोई नहीं करेगा। वे किसी भी कीमत पर अपनी ज़मीन देने को राज़ी नहीं हैं। “वेदांता कंपनी सिर्फ अपने फ़ायदे को देख रही है लेकिन हमारा इतना कुछ पूरा जीवन बदल जाएगा उसका क्या? हम आदिवासी हैं और यही जल जंगल हमारे जीवन का एक मात्र सहारा है।”
असन यादव का कहना है कि “सरकार हमें किसी दूसरे जगह भेजता है तो हमें दूसरे जगहों में ऐसी सुविधा नहीं मिलेगा। जहां हम अभी रह रहे हैं वहां पर हमें बहुत सारी चीजों की सुविधा मिल रही है जैसे स्कूल,पानी, सड़क, बिजली आदि। हम इस जगह को छोड़ना ही नहीं चाहते हैं अगर कंपनी खुलता है तो हमारे फसल और स्वास्थ्य पर भी उतना ही प्रभाव पड़ेगा जो हमारे लिए बहुत हानिकारक और चिंता जनक है।”
ग्रामीण चमन यादव कहते हैं कि “हम आदिवासी हैं हमें वन विभाग के तरफ से भी लाभ मिलता है जैसे तेंदू पत्ता तोड़कर बेचना, महुआ बेचना ये सुविधाएँ हमें और कहीं पर नहीं मिल सकती है। अगर कंपनी आएगी तो फसल को भी उतना ही नुक़सान होगा क्योंकि कंपनी आने से काफी धूल और प्रदूषण बढ़ जाता है। अगर कंपनी लगती है तो उस कंपनी में एक परिवार के एक ही व्यक्ति को रोजगार दिया जाएगा जो बीस लोगों के परिवार के लिए पर्याप्त नहीं है अगर दूसरे जगह जाते हैं तो भी। वहीं हम यहाँ रह कर पूरा परिवार मिल कर खेती किसानी करते हैं। नुक़सान तो हमारा ही है। फूल बाई ठाकुर का कहना है कि एक तरफ जो घर लोगों ने अपने मेहनत से घर बनाया है उसे छिनने या तोड़ने की बात की जा रही है और दूसरी इंद्रा आवास जैसा आवास का घर दे रहे हैं तो इसमें फर्क क्या है बस अपना जमीन छोड़कर सरकार के जमीन में ग़ुलाम बन कर रहना यही समझ आ रहा है। घर देने और नहीं देने से कोई खास मतलब नहीं दिखता है।
लोगों को वेदांता कंपनी आने की किसी भी तरह की कोई खबर नहीं दी गई है। 6वी पीढ़ी के उत्तराधिकारी राजेंद्र दीवान बताते हैं कि अख़बरों में छपी खबर के माध्यम से उन्हें ये बात पता चली कि वेदांता कंपनी सोनाखान इलाके में आने वाली है। जबकि जिला प्रशासन में पता करने के बाद यह जानकारी मिली कि वहां भी इसकी कोई जानकारी नहीं है। न ही आसपास के गांव में एनओसी दिया गया है।
वहीं यह वही धरती हैं जहां जहां शहीद वीर नारायण ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। एक बार फिर आज सोनाखान संघर्ष के दौर से गुजर रहा है। एक बार फिर से यहाँ के 24 गांव के करीब 30 हजार लोग जल जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं।
शहीद वीर नारायण सिंह कौन थे?
छत्तीसगढ़ के प्रथम योद्धा शहीद वीर नारायण सिंह का नाम 1857 स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख योद्धाओं में लिया जाता है। बलौदा बाजार जिले के सोनाखान क्षेत्र के जमींदार और बिंझवार जनजाति से संबंध रखने वाले वीर नारायण सिंह ने उस समय लोगों की मदद की, जब 1856 में इलाके में भीषण अकाल पड़ा था। भूख से परेशान ग्रामीणों को अनाज नहीं मिलने पर उन्होंने एक व्यापारी के गोदाम से जरूरत भर का अनाज निकलवाकर लोगों में बंटवा दिया। इस घटना के बाद अंग्रेजी प्रशासन ने उन पर डकैती का मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया लेकिन बाद में वे जेल से निकलने में सफल रहे और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष शुरू कर दिया। उन्होंने स्थानीय लोगों को संगठित कर अपनी सेना बनाई और अंग्रेजी हुकूमत का डटकर मुकाबला किया। हालांकि, विश्वासघात और अंग्रेजों की सैन्य कार्रवाई के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अंततः 10 दिसंबर 1857 को रायपुर के वर्तमान जय स्तंभ चौक में उन्हें सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई। उनके बलिदान ने छत्तीसगढ़ में अंग्रेजों के खिलाफ जनआंदोलन को नई ताकत दी और आज भी उन्हें अन्याय के खिलाफ संघर्ष और जनसेवा के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।
सोनाखान ने अंग्रेजों और अन्याय के खिलाफ विद्रोह देखा है और आज फिर वही सोनाखान अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। अब यह लड़ाई केवल जमीन की नहीं रह गई है यह लड़ाई उन महिलाओं की भी है जिनकी रसोई जंगल से चलती है। यह लड़ाई उन बच्चों का भी है जिनका भविष्य इससे जुड़ा हुआ है। क्या सोनाखान से शाहिद वीर नारायण सिंह का अस्तित्व खत्म हो जाएगा? सवाल सिर्फ सोने की ज़मीन का नहीं है सवाल उनके लिए भी है जिनके लिए यह जमीन दौलत है।
सोनाखान में प्रस्तावित खनन को लेकर स्थानीय लोगों के मन में कई सवाल हैं। यदि उन्हें अपनी जमीन और जंगल छोड़ने पड़ते हैं तो क्या किसी मुआवजे या पुनर्वास पैकेज से उनके और प्रकृति के बीच पीढ़ियों से बने रिश्ते की भरपाई हो सकेगी? खनन से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान और सामाजिक प्रभावों की भरपाई करना आसान नहीं होगा।
स्थानीय लोग यह भी पूछ रहे हैं कि यदि खनन क्षेत्र के पास स्थानीय लोग यह भी पूछ रहे हैं कि यदि खनन क्षेत्र के पास वन्यजीव अभयारण्य और पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र मौजूद हैं तो खनन का असर उन इलाकों पर कैसे नहीं पड़ेगा। एक ओर सरकार पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण की बात करती है वहीं दूसरी ओर उसी क्षेत्र में खनन परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। ऐसे में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि विकास की योजनाओं का लाभ किसे मिलेगा और उसकी कीमत कौन चुकाएगा इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
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