खबर लहरिया Blog प्रयागराज के शंकरगढ़ में ‘जंगल बनाम जिंदगी’ का सवाल, ‘पांच पीढ़ी यहीं बीती अब हटाएंगे तो कहां जाएं?

प्रयागराज के शंकरगढ़ में ‘जंगल बनाम जिंदगी’ का सवाल, ‘पांच पीढ़ी यहीं बीती अब हटाएंगे तो कहां जाएं?

 

प्रयागराज जिले के शंकरगढ़ ब्लॉक का मबईया (मजरा टंडन वन) गांव इन दिनों एक ऐसे विवाद में फंसा है, जहां एक तरफ जंगल और कानून की बात है, तो दूसरी तरफ हजारों लोगों की जिंदगी और सिर पर छत का सवाल।

रिपोर्ट – सुनीता, लेखन – मीरा देवी 

अपने छोटे से झोपड़ी में गुजर बसर करते (फोटो साभार: सुनीता)

यहां के लोग कहते हैं-“हम कोई आज के बसे हुए नहीं हैं, हमारे दादा-परदादा भी यहीं थे। अब अचानक कहा जा रहा है कि ये जमीन वन विभाग की है घर मत बनाओ।”

क्या है पूरा मामला?

गांव में रहने वाले आदिवासी परिवार सालों से जंगल के किनारे बसे हैं। उनका जीवन जंगल और मजदूरी पर टिका है। हाल के महीनों में कुछ परिवारों ने अपने कच्चे घर की जगह पक्का मकान बनाना शुरू किया। दीवारें खड़ी हो गईं, लेकिन जैसे ही छत डालने की बारी आई, वन विभाग ने काम रुकवा दिया। गांव में रहने वाले लोगों के मुताबिक करीब 6 महीने पहले 8 मकानों का निर्माण रोका गया। इसके बाद 14 लोगों को नोटिस भी दिया गया कि वे पक्का निर्माण न करें।

घर का काम अधूरा (फोटो साभार: सुनीता)

कितने लोग प्रभावित हैं?

यह मामला शंकरगढ़ ब्लॉक के मबईया गांव (टंडन वन क्षेत्र) का है। ग्रामीणों का दावा है कि यह समस्या सिर्फ उनके गांव की नहीं है बल्कि टंडन वन, ओसा, गढ़वा समेत पूरे इलाके के करीब 42 गांव इससे प्रभावित हैं। इन गांवों में ज्यादातर कोल (आदिवासी) समाज के लोग रहते हैं। सिर्फ मबईया गांव की आबादी ही करीब 2000 बताई जा रही है। अगर कार्रवाई होती है, तो हजारों परिवारों के बेघर होने का खतरा है।

कच्चे मकानें (फोटो साभार: सुनीता)

क्यों बढ़ा गया विवाद?

वन विभाग का कहना है कि हाल ही में जमीन का सीमांकन (नाप) हुआ है और यह जमीन वन विभाग की निकली है। इसलिए नए पक्के मकानों पर रोक लगाई गई है लेकिन ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं-“अगर जमीन वन विभाग की थी तो पहले क्यों नहीं रोका गया?”

गांव के लोग बताते हैं कि करीब 4 साल पहले इसी गांव में 30 आवास बने थे तब किसी अधिकारी ने आपत्ति नहीं जताई।

ग्रामीणों की जिंदगी: झोपड़ी, मजदूरी और डर

गांव की शांति कहती हैं-“हम लोग यहीं मजदूरी करते हैं। रोज कमाते हैं तभी चूल्हा जलता है। अगर यहां से हटाए गए, तो छोटे-छोटे बच्चों को लेकर कहां जाएंगे?”

रूना का आरोप है-“जो लोग सड़क किनारे पक्के घर बना चुके हैं उन्हें नहीं हटाया जा रहा। हम गरीब हैं इसलिए हमें निशाना बनाया जा रहा है।” श्यामकली बताती हैं-“एक झोपड़ी में 10-15 लोग रहते हैं। आंधी-तूफान में झोपड़ी उड़ जाती है फिर पेड़ के नीचे रात काटनी पड़ती है। आवास का काम रुका है, इसलिए गांव में विकास भी ठप हो गया है।”

छोटे से कच्चे मकान में रहने को मजबूर (फोटो साभार: सुनीता)

कोल समाज की मांग, क्या कहते हैं कोल समाज के अध्यक्ष हंसराज?

“पाठा क्षेत्र के 42 गांवों में वन विभाग कोई विकास नहीं होने दे रहा। हमने मुख्यमंत्री को लिखकर बताया है और प्रदर्शन भी किया है। हमारी मांग साफ है कि जो गांव पहले से बसे हैं उन्हें उजाड़ा न जाए।”

प्रधान की बात: पहले आवास बने अब क्यों रोक?

गांव के पूर्व प्रधान मगलेश के बेटे और वर्तमान प्रतिनिधि गोलू कहते हैं-“चार साल पहले जब हमारे पिता प्रधान थे तब गांव में 30 आवास बने थे। उस समय किसी ने नहीं रोका। अब इस बार 8 नए आवास स्वीकृत हुए तो वन विभाग ने काम रुकवा दिया।” वह आगे कहते हैं-“ये लोग यहीं के निवासी हैं। यहीं वोट डालते हैं। गांव की आबादी करीब 2000 है। अगर इन्हें घर नहीं बनाने दिया जाएगा तो ये लोग कहां जाएंगे?”

गोलू का कहना है कि गांव पंचायत के स्तर पर लोगों को आवास देने की कोशिश की जा रही थी लेकिन वन विभाग की रोक के कारण काम अटक गया।

नेताओं और प्रशासन का पक्ष

स्थानीय विधायक वाचस्पति कहते हैं-“मामला हमारे संज्ञान में है। पहले लोग यहां काम करने आए और यहीं बस गए। अब जमीन का सीमांकन हुआ है, जिससे यह वन विभाग की भूमि में आ रही है। हमने मांग की है कि जो लोग पहले से बसे हैं उन्हें रहने दिया जाए लेकिन आगे नया कब्जा न हो।”

वहीं वन क्षेत्रीय अधिकारी अजय कुमार का कहना है-“पहले जमीन की नाप नहीं हुई थी, इसलिए लोग बस गए। अब सीमांकन में यह जमीन वन विभाग की निकली है। इसलिए नए पक्के निर्माण पर रोक लगाई गई है और 14 लोगों को नोटिस दिया गया है।”

सबसे बड़ा सवाल: आगे क्या?

इस पूरे मामले में दोनों पक्ष अपनी-अपनी जगह खड़े हैं। एक तरफ कानून और जंगल बचाने की बात है। दूसरी तरफ लोगों का जीवन, रोजगार और सिर पर छत का सवाल। गांव के एक बुजुर्ग की बात इस पूरे हालात को साफ कर देती है। वह कहते हैं -“जंगल से ही हमारा पेट पलता है, यहीं घर है। अगर यहां से हटाएंगे तो हम कहीं के नहीं रह जाएंगे।”

फिलहाल मबईया गांव और आसपास के 42 गांव इसी इंतजार में हैं कि कोई ऐसा रास्ता निकले जिससे जंगल भी बचे और उनकी जिंदगी भी उजड़ने से बच जाए।

 

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