दोस्तों, ऐसी कौन-सी चीज है जो जड़ से लेकर फल तक खाने और उपयोग में आती है? आज हम आपको ऐसे ही अनोखे पौधे कमल के बारे में बताएंगे, जो सुंदरता के साथ-साथ उपयोगिता का भी शानदार उदाहरण है। कमल का फूल, तना (कमल ककड़ी) और बीज यानी कमलगट्टा सभी किसी न किसी रूप में लोगों के काम आते हैं। यही वजह है कि इसे सबसे उपयोगी जलीय पौधों में गिना जाता है।
रिपोर्ट – श्यामकली, लेखन – सुचित्रा
आजकल कमलगट्टा (कमल के बीज) और बसींढा का मौसम चल रहा है। यूपी के महोबा जिले के तिन्दुही गांव में एक तालाब में कमल के पौधे बड़ी संख्या में होते हैं। ग्रामीण इलाकों में लोग तालाबों से कमलगट्टा निकालते हैं, जिसे सुखाकर खाया जाता है और कई जगहों पर धार्मिक कार्यों में भी इसका विशेष महत्व होता है। कमलगट्टा पोषक तत्वों से भरपूर माना जाता है और इसकी बाजार में भी अच्छी मांग रहती है।
कमल की सुंदरता और शीतलता
तालाबों में उगने वाला कमल सिर्फ अपनी खूबसूरती के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यह तालाब की रौनक भी बढ़ाता है। जहां कमल और उसके पत्ते भरपूर मात्रा में होते हैं, वहां तालाब हरा-भरा और आकर्षक दिखाई देता है। ग्रामीणों का मानना है कि ऐसे तालाबों का पानी भी अपेक्षाकृत ठंडा रहता है।
कमल के बड़े-बड़े पत्तों का उपयोग भी वर्षों से होता आ रहा है। पहले गांवों में शादी-विवाह और अन्य सामूहिक आयोजनों में लोग कमल के पत्तों पर भोजन परोसते और खाते थे। आज भी कई जगहों पर भंडारे और धार्मिक कार्यक्रमों में तालाब से पत्ते तोड़कर उनका इस्तेमाल किया जाता है। यह परंपरा न सिर्फ पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि ग्रामीण संस्कृति की एक खूबसूरत पहचान भी है।
इस तरह कमल एक ऐसा पौधा है, जो प्रकृति की सुंदरता बढ़ाने के साथ-साथ लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों और खानपान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जड़ से लेकर बीज तक इसका हर हिस्सा किसी न किसी रूप में उपयोगी साबित होता है।
कमल के पत्तों का इस्तेमाल
जिला महोबा के तिन्दुही गांव निवासी कृष्ण प्रसाद वर्मा बताते हैं कि कमल को देश का राष्ट्रीय फूल माना जाता है। कमल के बड़े-बड़े पत्तों का उपयोग भी वर्षों से होता आ रहा है। जिला महोबा के तिन्दुही गांव निवासी कृष्ण प्रसाद वर्मा बताते हैं कि कमल को देश का राष्ट्रीय फूल माना जाता है। इसके फूलों की बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। उन्होंने कहा ” गांव में लगभग 18 बीघा से अधिक क्षेत्रफल का तालाब है, जिसमें इस समय कमल की भरमार है। कमल के पत्तों पर भोजन किया जाता है। पत्तों में खाना खाने का अलग ही आनंद होता है। हालांकि अब रोजमर्रा में इसका उपयोग कम हो गया है, लेकिन भोज, भंडारे और बड़े कार्यक्रमों में आज भी इनका इस्तेमाल किया जाता है।”
कृष्ण प्रसाद वर्मा के अनुसार, साल 1980 में उन्होंने तालाब की खुदाई करवाई थी। उस समय उन्हें चिंता थी कि कहीं खुदाई के कारण तालाब से कमल पूरी तरह समाप्त न हो जाए। लेकिन कुछ पौधे और जड़ें बची रह गईं। धीरे-धीरे उनका विस्तार होता गया और आज स्थिति यह है कि कमल पूरे तालाब में फैल चुका है और तालाब की पहचान बन गया है।
कमल के तनें (कमल ककड़ी) का इस्तेमाल
कमल के तने का इस्तेमाल भी किया जाता है जिसे आम भाषा में कमल ककड़ी और ग्रामीण भाषा में भसीढ़ा कहा जाता है। महोबा शहर की रहने वाली गुड़िया बताती हैं कि जून से जुलाई के बीच बाजार में कमल ककड़ी (भसीढ़ा) आसानी से मिल जाता है। वह इसे बाजार से खरीदकर लाती हैं और घर में लगभग आठ-दस दिन में एक बार जरूर बनाती हैं। इस समय ताजा मुरार बाजार में मिलता है, जिसकी कीमत करीब 20 रुपये पाव होती है।
गुड़िया के अनुसार, मुरार खाने में बेहद स्वादिष्ट होता है। वह कहती हैं, “जिस दिन घर में मुरार बनता है, उस दिन रोटी ज्यादा खा ली जाती है क्योंकि इसका स्वाद बहुत अच्छा लगता है।”
मुरार बनाने की विधि बताते हुए उन्होंने कहा कि सबसे पहले तेल में मसाले भूनते हैं। जब मसाला अच्छी तरह पक जाता है, तब कटे हुए मुरार को उसमें डालकर भून लिया जाता है। इसे चाहें तो पानी डालकर तरी वाली सब्जी बना सकते हैं और चाहें तो सूखी सब्जी के रूप में भी तैयार किया जाता है। उनकी मानें तो इसकी खुशबू भी बहुत अच्छी होती है और स्वाद भी लाजवाब होता है।
गुड़िया कहती हैं, “यह एक मौसमी और खास चीज है, जो हर समय नहीं मिलती। इसलिए जब इसका मौसम आता है तो हम इसे जरूर बनाते और खाते हैं।”
कमल के बीजों का इस्तेमाल (कमलगट्टा)
कमल के बीज भी उपयोगी माने जाते हैं। कहा जाता है कि इसके पक्के हुए बीज पूजा पाठ और माला बनाने के काम आते हैं। महोबा जिले के शहर के रहने वाले हल्कू बताते हैं कि वे पिछले लगभग 15 वर्षों से कमलगट्टा बेचने का काम कर रहे हैं। वे कबरई बाजार से कमलगट्टा लाकर बिक्री करते हैं। इन दिनों बाजार में कमलगट्टा भरपूर मात्रा में मिल रहा है और इसकी अच्छी बिक्री भी हो रही है।
वे बताते हैं कि दो रुपये में एक कमलगट्टा मिलता है और दाना 20 रुपये प्रति पैकेट के हिसाब से बिकता है। कमलगट्टा खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है और ज्यादातर लोग इसे कच्चा ही खाना पसंद करते हैं। लोग इसे आधा किलो या एक किलो तक खरीदते हैं क्योंकि यह एक तरह का मेवा माना जाता है। कई लोग इसे मखाना समझते हैं, हालांकि हल्कू बताते हैं कि उनके इलाके में कमलगट्टे से मखाना नहीं बनता। फिर भी वे रोज कमलगट्टा खरीदकर लाते हैं और अच्छी बिक्री कर लेते हैं।
कमल के बीज निकालने की प्रक्रिया
मालती बताती हैं कि बाजार में कमल के दाने (बीज) ज़्यादा बिकते हैं। कमल के बीज को ग्रामीण भाषा में छतिया कहा जाता है। कमल के बीज निकालने के लिए हरे रंग के हिस्से को पानी में डाल दिया जाता है। हरे रंग का वह हिस्सा जिसमें बहुत सारे कमल के बीज मौजूद होते हैं। इसके बाद बीज को निकाला जाता है। कई बार पूरे दिन मेहनत करने पर भी छतिया (बीज) बहुत कम मिलती है। इसलिए हम लोग रोज़ बाज़ार में बैठकर दाने बेचते हैं। इसी से हमारी रोज़ी-रोटी चलती है। जब तक तालाबों में पर्याप्त पानी भरा रहेगा, तब तक हमारा यह धंधा भी अच्छी तरह चलता रहेगा।
कमल के इतने सारे इस्तेमाल का पता शायद कम लोगों को पता होगा लेकिन ग्रामीण स्तर पर लोग इसके इस्तेमाल से बखूबी परिचित होते हैं। क्योंकि वे लोग बचपन से ही इन्हीं के बीच पले बड़े होते हैं इस वजह से उन्हें इसकी ज्यादा जानकारी होती है जो उनके अनुभव से हमें मिलती है।
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