SIR यानी वोटर लिस्ट की जांच और सुधार की प्रक्रिया को फर्जी, डुप्लीकेट और मृत लोगों के नाम हटाने के लिए जरूरी बताया गया। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के दौरान कई सवाल भी सामने आए हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों पर आपत्ति जताई थी। इनमें नए वोटर जोड़ने, नाम हटाने और ECINET से जुड़े फैसले शामिल हैं। वहीं, SIR के दौरान Form 6 में किए गए बदलावों पर भी आपत्ति उठाई गई थी। दूसरी तरफ, खबर लहरिया की रिपोर्टिंग में हमने देखा कि इस प्रक्रिया का असर आम वोटरों पर कैसे पड़ा। महोबा के गौहाई खोड़ा गांव में करीब 130 लोगों के सामने 2003 की वोटर लिस्ट का रिकॉर्ड ही नहीं मिल पाया। कई लोगों ने BLO को दस्तावेज दिए, लेकिन उन्हें यह पता नहीं चला कि उनके कागज आगे क्या हुए। शादी के बाद गांव बदल चुकी महिलाओं के लिए पुराने रिकॉर्ड ढूंढना और मुश्किल रहा। तो सवाल सिर्फ यह नहीं है कि SIR में कितने नाम हटे। सवाल यह भी है कि वोटर लिस्ट को ठीक करने की इस प्रक्रिया में आम वोटर के सामने कौन-कौन सी मुश्किलें आईं और क्या चुनाव आयोग ने उन्हें दूर करने के लिए पर्याप्त व्यवस्था की?
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