खबर लहरिया Hindi Indian traditional jewellery: हर राज्य के गहनों में छिपी है अपनी कहानी, गुजरात के ये पारंपरिक आभूषण आज भी क्यों हैं खास?

Indian traditional jewellery: हर राज्य के गहनों में छिपी है अपनी कहानी, गुजरात के ये पारंपरिक आभूषण आज भी क्यों हैं खास?

भारत को अगर करीब से समझना हो तो सिर्फ उसके शहरों और भाषाओं को जानना काफी नहीं है। देश की असली तस्वीर उसके पहनावे, खान-पान, लोक परंपराओं और आभूषणों में भी दिखाई देती है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात से लेकर पूर्वोत्तर तक, हर इलाके के पारंपरिक गहनों का अपना अलग रंग, डिजाइन और इतिहास है। कहीं महिलाएं भारी चांदी के आभूषण पहनती हैं तो कहीं सोने के महीन काम वाले गहने उनकी पहचान बन जाते हैं। कई जगहों पर नाक की नथ, सिर का आभूषण या चांदी की पायल सिर्फ श्रृंगार नहीं, बल्कि समुदाय और सामाजिक परंपरा का हिस्सा होती है।

अयोध्या घूमने आई गुजरात की महिला (फोटो साभार: गीता)

हमारा भारत कृषि प्रधान देश के साथ-साथ विविधताओं का भी देश है। इसी विविधता के बीच गुजरात के पारंपरिक आभूषण अपनी अलग पहचान रखते हैं। यहां महिलाओं के गहनों में चमक के साथ-साथ संस्कृति, परिवार की विरासत और पुरानी यादें भी जुड़ी होती हैं। कई आभूषण ऐसे हैं जिन्हें महिलाएं अपनी मां, दादी या नानी से विरासत में पाती हैं। यही वजह है कि समय बदलने और फैशन के नए दौर के बावजूद इन गहनों का आकर्षण पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

हर राज्य के गहनों की अपनी पहचान

गुजरात के पारंपरिक आभूषणों में चूड़ला, पाटला, बाजूबंद, हाथफूल, वींटी, झुमका, कर्णफूल, दामणी, बोरला, नथड़ी, हांसड़ी, कंठी, रानी हार, चंदनहार, करधनी, कंदोरा, पायल, झांझर और बिछिया प्रमुख हैं। चूड़ला और पाटला कलाई में, बाजूबंद ऊपरी बांह में और हाथफूल व वींटी हाथ और उंगलियों में पहने जाते हैं। झुमका और कर्णफूल कानों में, जबकि दामणी और बोरला माथे पर पहने जाते हैं। नथड़ी नाक में और हांसड़ी, कंठी, रानी हार व चंदनहार गले में पहने जाते हैं। करधनी और कंदोरा कमर के आभूषण हैं, वहीं पायल और झांझर टखनों तथा बिछिया पैरों की उंगलियों में पहनी जाती है। इन गहनों में मुख्य रूप से सोने और चांदी का इस्तेमाल होता था, जबकि कुछ आभूषणों में मोती, लाख और हाथीदांत भी इस्तेमाल किए जाते थे।

इन पारमपरिक आभूषणों में कोकरवा, नखली, पोखानी, भेटला, वाटलो और पेटन  के नाम भी शमिल हैं। गुजरात के कच्छ और सौराष्ट्र क्षेत्र की पारंपरिक महिला ज्वेलरी में ऐसे स्थानीय नाम मिलते हैं। 

कौन सा गहना कहां पहना जाता है?

गुजरात के पारंपरिक आभूषणों की खासियत सिर्फ उनके नाम और डिजाइन में नहीं, बल्कि इस बात में भी है कि शरीर के अलग-अलग हिस्सों के लिए अलग तरह के गहने बनाए जाते रहे हैं।

कोकरवा:

यह कान के ऊपरी या अंदरूनी हिस्से में पहना जाने वाला छोटा, गोल और चपटा आभूषण बताया जाता है। यह कान की खूबसूरती बढ़ाने के साथ पारंपरिक पहनावे को भी पूरा करता है।

नखली:
कान के ऊपरी हिस्से में पहना जाने वाला पारंपरिक आभूषण है। गुजरात के कुछ पारंपरिक समुदायों में महिलाओं के बीच इसके इस्तेमाल की परंपरा रही है।

पोखानी:
यह कान के फैले हुए हिस्से यानी कान की कुचिया में पहना जाने वाला बड़ा और गोल आभूषण है, जिसका आकार टोपी या बड़े टॉप्स जैसा दिखाई देता है।

भेटला:
यह भी कान की कुचिया में पहना जाता है। यह अपेक्षाकृत लंबा और भारी आभूषण माना जाता है।

हंसली और नखलो:

गले में पहने जाने वाले इन आभूषणों का डिजाइन गर्दन से चिपका हुआ होता है। पारंपरिक पहनावे में इनकी खास पहचान रही है।

वाटलो:
गले में पहनी जाने वाली लंबी माला को वाटलो कहा जाता है। इसका पारंपरिक पहनावे में अलग महत्व है।

पेटन:
काले डोरे और मंगलसूत्र जैसे पारंपरिक गले के आभूषणों से जुड़ा यह आभूषण भी महिलाओं के पहनावे का हिस्सा रहा है।

कई राज्यों से आने वाले पर्यटक भी इन पांरपरिक आभूषणों को पहनकर जब कहीं जाते हैं तो देखने वाले भी इन्हें आश्चर्य भरी निगाहों से देखते हैं। यह पर्यटक इन आभूषणों के साथ अपने राज्य का इतिहास भी लेकर चलते हैं और उनके साथ उनकी कहानी जुड़ी होती है। खबर लहरिया की रिपोर्टर गीता की अयोध्या भर्मण पर ऐसे ही लोगों से मुलाकत हुई। 

गुजरात से आई महिलाओं ने बताई आभूषणों की कहानी 

गुजरात से अयोध्या घूमने आईं पम्मी ने गीता को बताती हैं कि उनके यहां पारंपरिक गहनों का चलन आज का नहीं, बल्कि बहुत पुराना है। नई पीढ़ी भले ही रोजमर्रा की जिंदगी में इन आभूषणों को कम पहनती हो, लेकिन बुजुर्ग महिलाएं आज भी इन्हें गर्व और शौक से पहनती हैं।

उनके लिए ये गहने केवल सजने-संवरने का सामान नहीं हैं। इनमें उनकी पहचान, परिवार की विरासत और बीते समय की यादें जुड़ी हुई हैं। कई गहने मां से बेटी और दादी से पोती तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचते हैं। गहना भले ही पुराना हो जाता है, लेकिन उससे जुड़ी कहानी हर पीढ़ी के साथ और गहरी होती जाती है।

गुजरात की रहने वाली श्यामा बताती हैं कि आज की नई पीढ़ी पारंपरिक गहनों को ज्यादातर त्योहार, शादी-विवाह या किसी खास अवसर पर ही पहनती है। लेकिन जब महिलाएं इन आभूषणों से सजती हैं तो उनके साथ एक पूरी सांस्कृतिक विरासत भी सामने आती है।

कानों से लेकर गले, हाथों और पैरों तक पहने जाने वाले ये आभूषण सिर्फ खूबसूरती नहीं बढ़ाते, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं की कहानी भी बताते हैं। पुराने समय में सोने-चांदी के गहनों को स्त्रीधन के रूप में भी देखा जाता था। यानी ये आभूषण सुंदरता के साथ महिलाओं के लिए आर्थिक सुरक्षा का साधन भी होते थे।

गुर्जर समुदाय में भी गहनों की रही है खास परंपरा

गुजरात की रहने वाली एक अन्य महिला बताती हैं कि उनके यहां गुज्जर समुदाय की महिलाओं के बीच पारंपरिक गहनों का चलन पहले भी काफी था और आज भी देखने को मिलता है। आज भी कुछ बुजुर्ग महिलाओं के बीच भेटला, कोकरवा, नखली, पोखानी और कोनिया जैसे पुराने आभूषणों का आकर्षण बना हुआ है।

किस राज्य में कैसे पारम्परिक आभूषण पहने जाते हैं

भारत की खूबसूरती यही है कि यहां आभूषणों की परंपरा एक जैसी नहीं है। राजस्थान में चांदी के भारी गहने और बोरला, पंजाब में परांदा और पारंपरिक नथ, महाराष्ट्र में नथ और ठुशी, दक्षिण भारत में मंदिर आभूषण और कासुमाला, हिमाचल में चांदी के पारंपरिक गहने और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में स्थानीय डिजाइन वाले आभूषण अपनी अलग पहचान रखते हैं।

कहीं गहनों पर प्रकृति, फूल और पक्षियों की आकृतियां दिखाई देती हैं तो कहीं देवी-देवताओं या धार्मिक प्रतीकों की झलक मिलती है। कुछ समुदायों में आभूषण वैवाहिक स्थिति बताते हैं, तो कहीं इनसे समुदाय और क्षेत्र की पहचान जुड़ी होती है।

यानी भारत में आभूषण सिर्फ फैशन का हिस्सा नहीं हैं। वे इतिहास, संस्कृति, सामाजिक पहचान और पारिवारिक विरासत को अपने साथ लेकर चलते हैं।

 

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