खबर लहरिया Blog सम्मान और सुरक्षा मौलिक अधिकार फिर सेक्स वर्कर्स के संबंध में आधिकारिक बयान की ज़रुरत क्यों?

सम्मान और सुरक्षा मौलिक अधिकार फिर सेक्स वर्कर्स के संबंध में आधिकारिक बयान की ज़रुरत क्यों?

सुप्रीम कोर्ट ने सेक्स वर्क को प्रोफ़ेशन करार दिया। इसके साथ ही यह भी कहा कि उन्हें भी सम्मान और क़ानूनी सुरक्षा का अधिकार है।

 

वैश्यावृति को पेशा करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई 2022 को यह फैसला सुनाया कि सेक्स वर्कर्स को भी सम्मान और क़ानूनी सुरक्षा का अधिकार है। यहां सबसे अजीब बात यह है कि सेक्स वर्क भारत में कभी अवैध ही नहीं था। आईपीसी के अनुसार, वैश्यावृति के तहत दलाली करना या इससे पैसे कमाना ही दंड के दायरे में आता है।

साथ ही 1956 का Immoral Traffic (Prevention) एक्ट कहता है कि सेक्स वर्कर्स अपना पेशा कर सकती हैं लेकिन जो व्यक्ति इसके ज़रिये लाभ कमा रहा है वह सज़ा का पात्र होगा।

यहां सवाल यह है कि आखिर ऐसी कितनी महिलाएं हैं जो अपनी मर्ज़ी से वैश्यावृति का पेशा करती हैं या अपनाती है? अदालत ने 19 मई को फैसला सुनाते हुए बस इस बात को और स्पष्ट कर दिया कि महिलाएं अपनी मर्ज़ी से व स्वतंत्र रूप में सेक्स वर्कर का काम कर सकती हैं।

चलिए, महिलाएं अपनी मर्ज़ी से सेक्स वर्क का काम कर रही हैं जो की कानून के अनुसार न तो अवैध है और न ही दंड के अंदर आता है। यहां कानून ने तो महिलाओं को कह दिया कि उनकी चॉइस है लेकिन समाज ने कहा, महिलाओं द्वारा सेक्स वर्क करना अनैतिक है।

आखिर ये नैतिकता का भार महिलाओं के सिर-माथे ही क्यों? वैसे भी समाज ने कभी महिलाओं की चॉइस को अपनाया ही नहीं। अब सेक्स वर्क तो समाज के लिए नाक कटाने जैसे होगा। अब उनके घर की इज़्ज़त नहीं रहेगी?

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सेक्स वर्कर्स : सम्मान और सुरक्षा

साभार – इंडियन एक्सप्रेस

 

अब यहां इज़्ज़त की बात आई है तो यह बात भी गौर करने वाली है कि अदालत ने कहा कि सेक्स वर्कर्स को भी सम्मानता और क़ानूनी सुरक्षा पाने का अधिकार है। सम्मान और सुरक्षा का अधिकार तो हमारे मौलिक अधिकार व आर्टिकल 21 के तहत हमें सम्मान जनक जीवन जीने का अधिकार दिया ही गया है फिर यह अधिकार सेक्स वर्कर्स के लिए अलग से क्यों कहना पड़ रहा है? शायद इसलिए तो नहीं कि हमने उन्हें समाज में कभी सम्मिलित ही नहीं किया? उन्हें आम नागरिक नहीं समझा तभी तो उनके पास न तो आधार कार्ड होते हैं और न ही कोई अन्य सरकारी दस्तावेज़। उनके सेक्स वर्क के कार्य को समाज हीन नज़र से देखता है जबकि सबसे बड़ा भोगी तो वह खुद है।

वैश्यावृति के काम को भी सम्मान के नज़र से देखा जाए, महिलाओं के संदर्भ में व कार्य से संबंधित जब भी यह बातें कही जाती है तो बहुत अटपटी लगती है। रूढ़िवादी समाज में जब महिलायें समाज द्वारा बांधे गए कामों से अलग काम करती है तो उसे बेइज़्ज़त किया जाता है। यह कोई अलग बात नहीं है कि वैश्यावृति के काम को समाज तिरछी निगाहों से देखता है।

जहां सम्मान पाना मौलिक अधिकारों में शामिल है, वहां सम्मान देने के लिए और पाने के लिए आधिकारिक बयानों की ज़रुरत पड़ रही है।

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सेस्क वर्कर्स : शरीर मेरा तो फैसला किसी और का क्यों?

साभार – गूगल

देह का व्यापार, इस रूढ़िवादी समाज में सम्मान के साथ रहे, यह कल्पना भी बेहद दूर है। महिलाओं की जब बात आती है तो उससे जुड़े फैसले, उसके शरीर से जुड़े फैसले महिला के अपने होने से ज़्यादा किसी समाज, किसी व्यक्ति या किसी कथित विचारधारा के होते हैं।

जब शरीर महिला का तो उसे लेकर फैसला कोई दूसरा क्यों सुनाये? क्या महिला का उसके खुद के शरीर पर भी हक़ नहीं? ये नैतिक-अनैतिक का पाठ महिलाओं के दायरे में बांधने का क्या मतलब जिसका पालन समाज खुद नहीं करता?

महिलाओं को इज़्ज़त के चोले में बांधते-बांधते ये समाज खुद उसे बेआबरू कर देता है। यहां तो वह सिर्फ अपने तन से लिबास सिरका रही है लेकिन समाज के पास तो वह भी नहीं कि वह अपनी हीन भावनाओं को छिपा सके।

सालों से सेक्स वर्कर्स के लिए काम करती संस्था का फैसले पर विचार

कई लोग ऐसे भी हैं जो सेक्स वर्कर्स से जुड़े मुद्दों को लेकर सालों से काम कर रहें हैं। खबर लहरिया ने सेक्स वर्कर्स के लिए 33 सालों से काम कर रहें गुड़िया संस्था के संस्थापक व डायरेक्टर सुजीत सिंह से बात की। उनके अनुसार, सरकार ने कोई नया कानून नहीं बनाया है बल्कि पुराने कानून को ही स्पष्ट कर दिया है।

वह 1956 के Immoral Traffic (Prevention) एक्ट के बारे में बताते हुए कहते हैं कि इसका उद्देश्य महिलाओं और लड़कियों की ‘अनैतिक तस्करी’ को रोकना है। यह एक्ट दलालों और वैश्यावृति के काम के ज़रिये पैसे कमाने वाले लोगों के खिलाफ़ है लेकिन पुलिस इसे सेक्स वर्कर्स के खिलाफ ही इस्तेमाल करती। पुलिस कहती है कि ये महिलाएं खुले में पुरुषों को सिड्यूस कर रहीं हैं।

आगे कहा कि ‘मर्द पुलिस मर्द नज़रिये से कानून को लागू करती थी।’

पुलिस द्वारा कानून को न पढ़ा जाता है और न ही उसकी आत्मीयता को समझा जाता है। अदालत द्वारा कोई नया कानून न बनाया गया है और न ही किसी भी तरह की मान्यता दी गयी है।

सुजीत कहते हैं, “सवाल यह है कि आखिर कितनी ऐसी महिलाएं हैं जो अपनी मर्ज़ी से वैश्यावृति कर रही हैं? वैश्यावृति के कार्य में लिप्त अधिकतर महिलायें दलालों के चंगुल में फंसी हुई है। यह एक ऐसा पेशा है जिसमें महिलाएं दलालों के बीच फंसी रहती है। इसमें यह सवाल आता है कि आखिर अदालत कितने कोठों को बंद करने की सोच रही है? कितने दलालों को पकड़ने की सोच रही है?”

सेक्स वर्क को प्रोफेशन करार देने पर अधिवक्ता की राय

सुप्रीम कोर्ट द्वारा सेक्स वर्क को प्रोफेशन कहे जाने के फैसले को लेकर हमने चित्रकूट जिले के कर्वी के अधिवक्ता राम कृष्ण से बात की। वह कहते हैं कि कोर्ट के फैसले ने इस बात को और स्पष्ट कर दिया कि सेक्स वर्क का काम अवैध नहीं है वहीं वैश्यालय (कोठा) चलाना अवैध है। इस फैसले के बाद यह फायदा होगा कि पुलिस द्वारा सेक्स वर्कर्स को प्रताड़ित नहीं किया जाएगा। वह एक सम्मानजनक जीवन जी पाएंगी। अधिकार तो पहले से भी था लेकिन उन्हें वह पहचान नहीं मिल पायी थी। पहचान न होने से व्यक्ति को किसी प्रकार के अधिकार नहीं मिल पाते लेकिन अब उनकी अपनी एक पहचान बन पाएगी।

यहां अधिवक्ता भी वही बात कर रहें हैं कि जो नियम अदालत ने फैसला सुनाने के दौरान कहा। बस पुलिस द्वारा न तो उसे समझा गया और न ही पढ़ा। अदालत के निर्देश के बाद अब सेक्स वर्कर्स अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा कर पाएंगी और गरिमा के साथ सेक्स वर्कर्स का पेशा करते हुए अपने जीवन को जी पाएंगी।

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अदालत द्वारा सेक्स वर्कर्स के लिए रखी गयी मुख्य बातें

– अगर महिला द्वारा सहमति से सेक्स किया जा रहा है तो पुलिस इस पर कोई आपराधिक मामला दर्ज़ नहीं करेगी।
– कोठों में काम करती सेक्स वर्कर्स को पुलिस द्वारा परेशान नहीं किया जाएगा। अगर सेक्स वर्कर्स कोई शिकायत करती हैं तो उनकी शिकायत को महत्वता देते हुए कानून के अनुसार उस पर कार्यवाही करनी है।
– सेक्स वर्कर्स के बच्चों को उनकी माँ से अलग न किया जाए।
– किसी भी कानून या नीति को पारित करने से पहले यौनकर्मियों और उनके प्रतिनिधि संगठनों की राय लेना।
– सेक्स वर्कर्स को मेडिकल क़ानूनी मदद मुहैया कराई जाए।
– मीडिया सेक्स वर्कर्स की पहचान सार्वजनिक नहीं कर सकती।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि सेक्स वर्कर्स को आधार कार्ड एक प्रोफार्मा प्रमाण पत्र के आधार पर ज़ारी किया जाएगा जो यूआईडीएआई द्वारा ज़ारी किया जाता है।

भारत में सेक्स वर्कर्स से जुड़ा डाटा

इंडियन एक्सप्रेस की 30 मई 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 3 मिलियन सेक्य वर्कर्स हैं जिसमें 15 से 35 के उम्र की ज़्यादा महिलाएं हैं।

इण्डिया टुडे की 27 मई 2022 को प्रकाशित रिपोर्ट कहती है कि भारत में पहचाने गए 8.25 लाख सेक्स वर्कर्स में से आधे से ज़्यादा सेक्स वर्कर्स पांच दक्षिणी राज्यों आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना से हैं। आंध्र प्रदेश में 1.33 लाख यौनकर्मी हैं जबकि कर्नाटक में 1.2 लाख हैं। उत्तर प्रदेश में 22,060 और नई दिल्ली में 46,787 सेक्स वर्कर्स हैं।

अदालत द्वारा सेक्स वर्क को पेशा करार देना और उनसे जुड़े एक्ट को स्पष्ट करना, कहीं न कहीं आगे सेक्स वर्कर्स को राहत प्रदान करेगा। साथ ही जो परेशानियां उन्हें पुलिस की वजह से उठानी पड़ती थी, अदालत के फैसले के बाद शायद वह कम हो जाए। पर यहां एक सवाल अब भी रहता है कि जो अवैध कोठे अभी भी भारत के राज्यों में चलाये जा रहें हैं उसे लेकर अदालत का क्या रुख है? सेक्स वर्कर्स का इस्तेमाल पैसे कमाने के लिए करने वाले लोगों पर किस तरह से क़ानूनी कार्यवाही की जायेगी और उन्हें किस तरह से पकड़ा जाएगा? हालाँकि, इसे लेकर अदालत द्वारा कोई बात नहीं रखी गयी है।

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