खबर लहरिया Blog रामचंद्र की लस्सी बनी गर्मी में राहत का ठिकाना, छोटे क़स्बे की बड़ी पहचान 

रामचंद्र की लस्सी बनी गर्मी में राहत का ठिकाना, छोटे क़स्बे की बड़ी पहचान 

इसी गर्मी ने एक व्यक्ति को नया रास्ता दिखाया और उसने लस्सी की दुकान खोलकर अपनी रोज़ी-रोटी के साथ लोगों को ठंडक देने का काम शुरू कर दिया। इस बार महोबा के कबरई में गर्मी ने सिर्फ लोगों को परेशान नहीं किया बल्कि है इस गर्मी ने एक छोटी सी दुकान को बड़ी पहचान भी दे दी  

रिपोर्ट – श्यामकली, लेखन – रचना                            

रामचंद्र लस्सी बनाते हुए (फोटो साभार: श्यामकली)

हर साल की तरह इस बार भी गर्मी ने दस्तक दी तो लोगों ने अपने-अपने तरीके से उससे राहत ढूंढनी शुरू कर दी। कोई घर में ठंडा इंतज़ाम करता है तो कोई सड़क किनारे ठंडी चीज़ों का सहारा लेता है। इसी गर्मी ने एक व्यक्ति को नया रास्ता दिखाया और उसने लस्सी की दुकान खोलकर अपनी रोज़ी-रोटी के साथ लोगों को ठंडक देने का काम शुरू कर दिया। इस बार महोबा के कबरई में गर्मी ने सिर्फ लोगों को परेशान नहीं किया बल्कि है इस गर्मी ने एक छोटी सी दुकान को बड़ी पहचान भी दे दी। सड़क किनारे मिट्टी के कुल्हड़ों में परोसी जाने वाली लस्सी अब यहां की पहचान बन चुकी है। लोग सिर्फ प्यास बुझाने नहीं उस स्वाद और सुकून के लिए आते हैं जो उन्हें कहीं और नहीं मिलता।

सुबह के 4 बजे होते हैं जब कबरई कस्बे का एक छोटा सा चौराहा अभी पूरी तरह जागा भी नहीं होता लेकिन रामचंद्र कुशवाहा की दुकान पर हलचल शुरू हो जाती है। मिट्टी के कुल्हड़ सजे होते हैं दही मथा जा रहा है और दिन भर की तैयारी चल रही होती है।                                 

मिट्टी के बर्तन में लस्सी (फोटो साभार: श्यामकली)

45 साल के रामचंद्र के लिए ये सिर्फ रोज़ का काम नहीं वे उनके पिछले 25 साल की मेहनत का हिस्सा है एक ऐसा सफर जो उन्होंने बहुत छोटी उम्र से शुरू किया था।

कबरई कस्बे के इलाके में रामचंद्र की अपनी एक दुकान है जिसमें वे लस्सी बेचते हैं। इस दुकान की खासियत सिर्फ लस्सी नहीं है उसे बनाने का तरीका और उसमें झलकती मेहनत भी शामिल है। रामचंद्र अपनी पत्नी और बेटे के साथ मिलकर सुबह 4 बजे से रात 11 बजे तक बिना रुके काम करते हैं। रोज करीब 1 कुंतल दूध से लगभग 400 कुल्हड़ लस्सी तैयार होती है जिसमें दही, चीनी, काजू और किशमिश के साथ सालों से वही एक जैसा स्वाद बना हुआ है जो लोगों को बार-बार यहां खींच लाता है।                               

लस्सी बन कर तैयार (फोटो साभार: श्यामकली)

2026 की इस तेज गर्मी में इसकी मांग और बढ़ गई है अब लोग सिर्फ यहीं पीने नहीं बल्कि पैक कराकर घर ले जाने भी आते हैं। उन्होंने लस्सी का दाम 30 रुपए से बढ़ाकर 35 जरूर कर दिया है लेकिन ग्राहकों की भीड़ कम नहीं हुई। लोगों का कहना है कि कोल्ड ड्रिंक के मुकाबले यह लस्सी ज्यादा सुकून देती है और सेहत के लिए भी बेहतर है। यही वजह है कि कबरई जो पहले धूल और क्रेशर के लिए जाना जाता था अब इस लस्सी की वजह से भी अपनी अलग पहचान बना रहा है। साथ ही रामचंद्र की मेहनत यह दिखाती है कि छोटे कस्बे में भी ईमानदारी से काम करके बड़ा भरोसा कमाया जा सकता है।

ग्राहक भी हैं रामचंद्र के दुकान की लस्सी के दीवाने 

कबरई की इस लस्सी की पहचान अब सिर्फ दुकान तक सीमित नहीं है लस्सी का स्वाद ग्राहकों की बातों में भी साफ झलकती है। 

बांदा से आए राजेंद्र बताते हैं कि “रामचंद्र की दुकान की लस्सी की बात ही अलग है कुछ लोगों के हाथ का स्वाद खास होता है।” वे खास तौर पर 20 लस्सी बनवाकर घर ले जा रहे थे और इसके लिए 100-150 रुपए खर्च कर यहां पहुंचे। उनका कहना है कि बड़े शहरों में भले ही कई दुकानें हों लेकिन वहां स्वाद धीरे-धीरे बदल जाता है जबकि यहां चार साल पहले जैसा स्वाद था आज भी वैसा ही मिलता है।  

ग्राहक लस्सी लेते हुए (फोटो साभार: श्यामकली)                                

वहीं बम्होरी गांव के रहने वाले शिबू राय जो पहली बार लस्सी पीने आए थे वे कहते हैं कि “न ज्यादा मीठी न खट्टी बस एकदम सही स्वाद है। गर्मी में इसे पीने से पेट ठंडा हो जाता है और प्यास भी कम लगती है।” उनका मानना है कि कोल्ड ड्रिंक से बेहतर लस्सी शरीर के लिए फायदेमंद है। 

वहीं चरखारी ब्लॉक के अनघोरा गांव से आए प्रेमचंद कहते हैं कि “जब भी यहां से गुजरते हैं कुशवाहा लस्सी जरूर पीते हैं क्योंकि हर जगह लस्सी मिलती है लेकिन पसंद का स्वाद कहीं-कहीं ही मिलता है।” यही वजह है कि यह छोटी सी दुकान अब लोगों की पसंद और भरोसे की पहचान बन चुकी है। 

ग्राहक प्रेमचंद्र (फोटो साभार: श्यामकली)                                    

रामचंद्र की लस्सी की असली पहचान

जब रामचंद्र से पूछा गया कि वे खुद अपनी लस्सी के स्वाद के बारे में क्या कहते हैं तो वे मुस्कुराते हुए बोले “हम तो पेप्सी पी लेते हैं लस्सी खुद कम ही पी पाते है। दिन भर बनाते रहते हैं तो मन नहीं करता लेकिन ऐसा नहीं है कि पी नहीं सकते।” 

उनके इस साधारण जवाब में ही उनकी मेहनत झलकती है। वे बताते हैं कि लस्सी बनाने के लिए वे मिट्टी के कुल्हड़ों में दही जमाते हैं और उसी से दिन भर काम चलता है। उनकी दुकान पर लोग बैठकर लस्सी कम पीते हैं और ऑर्डर ज्यादा लेते हैं। रोज करीब 400 कुल्हड़ लस्सी बिक जाती है। इसके लिए वे रोज लगभग 1 कुंतल दूध और करीब चार पसेरी चीनी इस्तेमाल करते हैं और एक किलो दूध से करीब चार कुल्हड़ लस्सी तैयार हो जाती है।

“एक कुल्हड़ की कीमत 35 है जो पहले 30 हुआ करती थी लेकिन बढ़ती गर्मी के साथ मांग भी बढ़ी है और अब पैकिंग के ऑर्डर भी ज्यादा आने लगे हैं।” वे मानते हैं कि मेहनत और क्वालिटी ही उनकी असली पहचान है यही वजह है कि एक छोटे कस्बे की दुकान भी आज लोगों के लिए एक भरोसेमंद नाम बन गई है।

कबरई की यह कहानी सिर्फ एक लस्सी की दुकान की नहीं है यह मेहनत, धैर्य और ईमानदारी से बनी पहचान की कहानी है। रामचंद्र कुशवाहा ने बिना किसी बड़े साधन के अपने काम और स्वाद के दम पर एक छोटी सी दुकान को लोगों के दिलों तक पहुंचा दिया। आज जब लोग मिलावट और बदलते स्वाद से परेशान हैं ऐसे में कबरई की यह लस्सी उन्हें एक भरोसेमंद और सादा विकल्प देती है। यह कहानी दिखाती है कि अगर काम में लगन और गुणवत्ता हो तो छोटे कस्बे से भी बड़ा नाम बनाया जा सकता है।

आखिर में यह सिर्फ ठंडक देने वाली लस्सी नहीं यह उस भरोसे का स्वाद है जिसे लोग दूर-दूर से आकर अपने साथ ले जाते हैं।

 

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