खबर लहरिया Blog Nacha/Chhattisgarh: नाचा-गम्मत छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत जो मिटने की कगार पर है, जानिए क्या नाचा 

Nacha/Chhattisgarh: नाचा-गम्मत छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत जो मिटने की कगार पर है, जानिए क्या नाचा 

राज्य के अधिकांश हिस्सों में ग्रामीण और आदिवासी समुदाय निवास करते हैं, जिनके जीवन में लोक कला और लोक परंपराएं आज भी गहराई से जुड़ी हुई हैं। पीढ़ियों से यहां के लोग अपने सुख-दुख, उत्सव और सामाजिक अनुभवों को गीत, संगीत, नृत्य और लोकनाट्य के माध्यम से अभिव्यक्त करते आए हैं। इन्हीं लोक कलाओं में एक महत्वपूर्ण नाम है नाचा-गम्मत। यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं है यह छत्तीसगढ़ की सामूहिक स्मृतियों, लोक ज्ञान और सांस्कृतिक पहचान का जीवंत दस्तावेज है।

फोटो साभार: दक्षिण कोसल टुडे                                               

भारत का हृदय कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ की पहचान केवल उसके जंगलों, नदियों और खनिज संपदा से नहीं है छत्तीसगढ़ की पहचान बल्कि उसकी समृद्ध लोक संस्कृति से भी है। यह ऐसा प्रदेश है जहां सालभर किसी न किसी पर्व, उत्सव या सामाजिक आयोजन की रौनक बनी रहती है। राज्य के अधिकांश हिस्सों में ग्रामीण और आदिवासी समुदाय निवास करते हैं, जिनके जीवन में लोक कला और लोक परंपराएं आज भी गहराई से जुड़ी हुई हैं। पीढ़ियों से यहां के लोग अपने सुख-दुख, उत्सव और सामाजिक अनुभवों को गीत, संगीत, नृत्य और लोकनाट्य के माध्यम से अभिव्यक्त करते आए हैं।

इन्हीं लोक कलाओं में एक महत्वपूर्ण नाम है नाचा-गम्मत। यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं है यह छत्तीसगढ़ की सामूहिक स्मृतियों, लोक ज्ञान और सांस्कृतिक पहचान का जीवंत दस्तावेज है। गांवों की चौपालों से लेकर बड़े मेलों और उत्सवों तक, नाचा ने लोगों को हंसाया भी है सोचने पर मजबूर भी किया है और समाज को आईना दिखाने का काम भी किया है। यही वजह है कि इसे भारतीय लोक रंगमंच की एक अनमोल धरोहर माना जाता है। कई लोक कला प्रेमी तो इसे विश्व स्तर पर पहचान मिलने योग्य सांस्कृतिक विरासत मानते हैं।

पहले मशाल के रौशनी से होता था नाचा 

आज भले ही मंचों पर रंग-बिरंगी लाइटें और आधुनिक साउंड सिस्टम दिखाई देते हों लेकिन एक समय ऐसा भी था जब गांवों में बिजली नहीं होती थी। उस दौर में कलाकार मशाल की रोशनी में नाचा प्रस्तुत करते थे। लोग दिनभर खेतों में काम करने के बाद शाम को गांव के चौपाल या खुले मैदान में इकट्ठा होते थे। वहां स्थानीय कलाकार पूरी रात नाचा का मंचन करते थे। उस दौर में मशाल की रोशनी में नाचा प्रस्तुत किया जाता था। यही मनोरंजन का एक मात्र साधन हुआ करता था। बाद में पेट्रोमैक्स और फिर आधुनिक रोशनी का इस्तेमाल शुरू हुआ। लेकिन नाचा के प्रति लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ। आज भी कई गांवों में लोग अपने घरों से दरी, चादर और बोरा लेकर नाचा देखने पहुंचते हैं और पूरी रात उसका आनंद लेते हैं।

कैसे हुई नाचा की शुरुआत?

नाचा के विकास की बात करें तो नाचा में दाऊ दुलार सिंह साव ‘मंदराजी’ का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। उन्हें नाचा का पितामह कहा जाता है। रवेली नाचा पार्टी को प्रदेश की पहली नाचा पार्टी माना जाता है। मंदराजी ने इस कला को संगठित रूप दिया और नाचा में हारमोनियम जैसे वाद्ययंत्रों का उपयोग शुरू किया। वर्ष 1940 के आसपास उनके कार्यक्रमों की लोकप्रियता इतनी थी कि उन्हें देखने के लिए भारी भीड़ जुटती थी। उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि कई बार सिनेमाघरों तक पर इसका असर पड़ता था। माना जाता है कि शुरुआती दौर में यह मशाल नाच के रूप में प्रस्तुत किया जाता था और धीरे-धीरे एक संपूर्ण लोकनाट्य के रूप में विकसित हुआ।

जिस तरह महाराष्ट्र का तमाशा, गुजरात का गरबा, असम का बिहू, हरियाणा का सांग और पंजाब का भांगड़ा वहां की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं उसी तरह नाचा छत्तीसगढ़ की पहचान है। नाचा शब्द की उत्पत्ति ‘नाच्या’ से मानी जाती है। नाच्या उन कलाकारों को कहा जाता था जो मंच पर महिला पात्रों की भूमिका निभाते थे। समय के साथ यही शब्द नाचा के रूप में प्रचलित हो गया।

नाचा का उद्देश्य 

नाचा का मुख्य उद्देश्य प्रदेश की लोक संस्कृति का संरक्षण और प्रचार-प्रसार करना है। यह कला हास्य, गीत, संगीत और अभिनय के माध्यम से आम लोगों विशेषकर श्रमिक और ग्रामीण समुदाय के मनोरंजन का कार्य करती है। 

फोटो साभार: रचना                                       

नाचा के जरिए छत्तीसगढ़ की जीवन शैली, लोक परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामाजिक मूल्यों को मंच पर प्रस्तुत किया जाता है। यह जनजीवन में घटित घटनाओं और समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप कथाओं का निर्माण कर लोगों तक उनकी समस्याओं और अनुभवों को पहुंचाने का माध्यम भी है।

इसके अलावा नाचा सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक घटनाओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे लोगों को अपनी विरासत और इतिहास से जुड़ने का अवसर मिलता है। यह कला गंभीर सामाजिक मुद्दों, कुरीतियों और जनसमस्याओं को मंचित कर समाज में जागरूकता और चेतना पैदा करने का भी महत्वपूर्ण कार्य करती है। 

नाचा केवल मनोरंजन नहीं, समाज का आईना भी

नाचा को केवल एक लोकनाट्य या मनोरंजन का साधन मानना उसके महत्व को कम करके आंकना होगा। यह छत्तीसगढ़ के ग्रामीण समाज का आईना रहा है जिसने समय-समय पर लोगों के सुख-दुख, संघर्ष और सामाजिक वास्तविकताओं को मंच पर जीवंत किया है। नाचा की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह हंसाते-हंसाते गंभीर बातें कह जाता है। इसके गीतों, संवादों और अभिनय के माध्यम से कलाकार समाज में फैली कुरीतियों और समस्याओं को लोगों के सामने रखते हैं।

नाचा के मंच पर अंधविश्वास, सामाजिक भेदभाव, महिलाओं की स्थिति, प्रेम, गरीबी, शोषण और ग्रामीण जीवन की चुनौतियों जैसे विषयों को बड़ी सहजता से प्रस्तुत किया जाता है। इसके गीतों में कबीरदास और तुलसीदास जैसे संत कवियों की रचनाएं भी सुनाई देती हैं, जो लोगों को नैतिकता, समानता और मानवता का संदेश देती हैं। यही कारण है कि नाचा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा है यह नाचा समाज सुधार और जनजागरण का एक प्रभावी मंच भी बन गया। आज भी कई ग्रामीण इलाकों में सरकारी योजनाओं और जनहित के संदेशों को लोगों तक पहुंचाने के लिए नाचा-गम्मत का सहारा लिया जाता है।

पुरुष कलाकार ही करते हैं महिलाओं का पात्र 

नाचा की लोकप्रियता के पीछे उसके अनोखे और जीवंत पात्रों का बड़ा योगदान है। देवार नाचा को छोड़कर अधिकांश नाचा मंचनों में पुरुष कलाकार ही महिला पात्रों की भूमिका निभाते हैं। ऐसे कलाकारों को परी और नजरिया कहा जाता है। पारंपरिक वेशभूषा और श्रृंगार से सजे ये कलाकार अपनी अदाओं, लचक और नृत्य कौशल से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। नाचा की एक खास पहचान यह भी है कि नजरिया अपने सिर पर कांस धातु से बने लोटे को रखकर चक्करदार नृत्य करते हैं, लेकिन शानदार संतुलन के कारण वह लोटा गिरता नहीं है। उनकी प्रस्तुति इतनी प्रभावशाली होती है कि कई बार दर्शक उन्हें वास्तविक महिला कलाकार समझ बैठते हैं। ग्रामीण इलाकों में परी और नजरिया के प्रति लोगों का आकर्षण इतना अधिक होता है कि दर्शक उनकी प्रस्तुति से खुश होकर उन पर पैसे भी न्योछावर करते हैं।                                           

फोटो साभार: रचना

परी और नजरिया के अलावा नाचा का सबसे लोकप्रिय पात्र जोक्कड़ होता है जिसे लोक रंगमंच का विदूषक भी कहा जाता है। सिर पर टोपी, हाथ में टेढ़ी-मेढ़ी बांस की छड़ी और रबर की ट्यूब लिए जोक्कड़ मंच पर आते ही माहौल को जीवंत बना देता है। वह केवल लोगों को हंसाने का काम नहीं करता बल्कि वह हास्य और व्यंग्य के जरिए समाज की विसंगतियों पर भी तीखा प्रहार करता है। अपनी चुटीली बातों, दोहों, पहेलियों, शायरी और मजेदार हाव-भाव से वह दर्शकों को हंसी से लोटपोट कर देता है। तबला और ढोलक की थाप पर अपने साथी कलाकारों के साथ संवाद करते हुए वह मनोरंजन के साथ-साथ जीवन की महत्वपूर्ण बातें भी लोगों तक पहुंचाता है। यही वजह है कि नाचा के ये पात्र केवल कलाकार नहीं होते वे छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की जीवंत पहचान बन चुके हैं।

कलाकार कोई लिखित स्क्रिप्ट इस्तेमाल नहीं करते 

चौंकाने वाली बात यह है कि इसके अधिकांश कलाकार किसी औपचारिक प्रशिक्षण संस्थान से जुड़े नहीं होते। कई कलाकार पढ़े-लिखे भी नहीं होते, लेकिन उनकी मंच प्रस्तुति और अभिनय क्षमता किसी प्रशिक्षित कलाकार से कम नहीं होती। वे लिखित स्क्रिप्ट पर निर्भर रहने के बजाय किसी कहानी या नाटक को सुनकर उसके आधार पर अपने संवाद तैयार करते हैं। स्थानीय बोली, जीवन के अनुभव और तत्काल परिस्थितियों के अनुसार वे मंच पर मनगढ़ंत संवाद बोलते हैं, जिससे उनकी प्रस्तुति और भी स्वाभाविक और जीवंत लगती है। यही सहजता नाचा को अन्य नाट्य विधाओं से अलग पहचान देती है।

नाचा के कलाकार अभिनय के साथ-साथ अपनी वेशभूषा और रूप-सज्जा भी स्वयं तैयार करते रहे हैं। पहले के समय में वे कोयला, पीली मिट्टी, सफेद छुई, मुरदालशंख और अन्य स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर श्रृंगार करते थे। सीमित साधनों के बावजूद उनकी प्रस्तुति दर्शकों को प्रभावित करने में सफल रहती थी। हालांकि समय के साथ आधुनिक मेकअप और मंच सज्जा का इस्तेमाल बढ़ा है लेकिन पुराने दौर की सादगी और आत्मीयता आज भी लोगों को आकर्षित करती है।

फोटो साभार: रचना                                                

नाचा कलाकार हीरालाल साहू जो अभी 74 साल के हैं और वे अपनी 15 साल की ऊम्र से नाचा में अभिनय करते आ रहे हैं, उन्होंने बताया कि जब वे 15 साल के थे तब चुना या पीली मिट्टी से मेकअप कर नाचा के लिए तैयार होते थे। “पहले हमारे बुजुर्ग घर में काजल बनाते थे घी और आग से उसी को ही इस्तेमाल करते थे लेकिन अब तो कई प्रकार का क्रीम और सामान आ गया है सजावट का जिसे हम नहीं ख़रीद सकते क्योंकि कि वो इतने महँगे हो गए हैं। अभी के दौर में जितने में हमारा नाचा (कार्यक्रम) बुक किया जाता है उतने में तो मेकअप का सामान आता है।” 

हीरा लाल साहू, नाचा कलाकार (फोटो साभार: रचना)

नाचा कलाकारों की प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोक कलाकारों को लेकर पद्म भूषण हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ी लोककथाओं के साथ-साथ प्रसिद्ध नाटककार विलियम शेक्सपियर और बर्टोल्ट ब्रेख्त के नाटकों का भी मंचन किया था। इन प्रस्तुतियों को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली। यह इस बात का प्रमाण है कि लोक परंपरा से निकले नाचा कलाकारों की कला और अभिनय क्षमता किसी भी बड़े रंगमंच पर अपनी छाप छोड़ सकती है।

आधुनिक मनोरंजन के दौर में बदला नाचा का स्वरूप

दिन बीतते गए और नया दौर आते गया। वर्तमान में समाज और तकनीक में आए बदलावों का असर नाचा पर भी पड़ा है। एक समय था जब कलाकार केवल पारंपरिक वाद्ययंत्रों और मशाल की रोशनी के सहारे पूरी रात दर्शकों का मनोरंजन करते थे। बाद में पेट्रोमैक्स आया और फिर आधुनिक रोशनी तथा साउंड सिस्टम ने मंच की तस्वीर बदल दी। देखा जाए तो आज कई नाचा मंडलियां इलेक्ट्रॉनिक वाद्ययंत्रों और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं। इससे प्रस्तुति अधिक आकर्षक बनी है लेकिन कई पुराने कलाकार मानते हैं कि आधुनिकता की इस दौड़ में नाचा की मूल आत्मा और पारंपरिक स्वरूप को बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

छत्तीसगढ़ ग्राम सेमरिया के रहने वाले वाले कुबेरदास मानिकपुरी जो नाचा कलाकार हैं के मुताबिक कभी गांवों में नाचा का आयोजन किसी उत्सव से कम नहीं होता था। लोग दूर-दूर से इसे देखने आते थे और पूरी रात कलाकारों की प्रस्तुति का आनंद लेते थे। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। अब मोबाइल फोन, टीवी, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने मनोरंजन के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है।

नई पीढ़ी का झुकाव डिजिटल माध्यमों की ओर बढ़ गया है जिसके कारण नाचा देखने वालों की संख्या लगातार कम हो रही है। इसके अलावा आधुनिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों और मंचीय प्रस्तुतियों ने भी दर्शकों की पसंद को प्रभावित किया है। कुबेरदास मानिकपुरी का कहना है कि “पहले जहां एक नाचा कार्यक्रम में बड़ी भीड़ उमड़ती थी वहीं अब दर्शकों को जुटाना भी चुनौती बनता जा रहा है। यही कारण है कि यह कला धीरे-धीरे विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रही है।”

अब लोक कलाकार आर्थिक संकट से जूझ रहे

नाचा से जुड़े कई कलाकारों और उनके परिवारों की आजीविका पूरी तरह इसी कला पर निर्भर थी और निर्भर है। लेकिन कार्यक्रमों की संख्या घटने और आमदनी कम होने से उनकी आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। कलाकार बताते हैं कि एक रात के कार्यक्रम से मिलने वाली राशि पूरी टीम के खर्च और परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त नहीं होती।

फोटो साभार: रचना

कई कलाकारों के पास नाचा के अलावा आय का कोई दूसरा साधन भी नहीं है। ऐसे में उन्हें रोजगार और जीवनयापन की गंभीर चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है। जिन कलाकारों ने पूरी जिंदगी इस कला को समर्पित कर दी आज वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। कहीं पानीपुरी तो कहीं चूड़ियों का छोटा दुकान खोल कर जीवन चलाने की कोशिश कर रहे हैं। 

कुबेरदास मानिकपुरी कहते हैं “हमारे आसपास कई कलाकार हैं जो पिछले 70-80 सालों से नाचा में अभिनय करते आ रहे हैं अब वो मानो बेरोजगार से हो गए हैं पहले कुछ सुविधाएँ नहीं थी तो सब नाचा का आनंद लेते थे जिससे बुकिंग ज़्यादा होती थी तो पैसा भी आ जाता था। किसी किसी कलाकारों का इस नाचा से घर चलता था। लेकिन अब सब कुछ बदल चुका है लोगों को और कुछ काम नहीं मिलता और जो कलाकार हैं उन्हें कलाकारी से कला से ही मोह और प्यार होता है उनके लिए अपनी कला छोड़ कर दूसरे कामों में कम दिलचस्पी होती है।” 

कुबेरदास मानिकपुरी, नाचा कलाकार (फोटो साभार: रचना)

सरकार और समाज से सहयोग की उम्मीद

नाचा कलाकारों का मानना है कि यदि समय रहते इस कला के संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां इसे केवल किताबों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी। कलाकार चाहते हैं कि सरकार आर्थिक सहायता, नियमित सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रशिक्षण की व्यवस्था करे ताकि नई पीढ़ी भी इस लोककला से जुड़ सके।

कलाकारों का कहना है कि जब भी छत्तीसगढ़ की संस्कृति, इतिहास और लोक परंपराओं को प्रदर्शित करने का मौका आता है तब नाचा को प्रमुखता से मंच दिया जाता है। सरकारी कार्यक्रमों, सांस्कृतिक आयोजनों और बड़े उत्सवों में दूर-दूर से नाचा दलों को बुलाया जाता है और इसे छत्तीसगढ़ की पहचान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन कलाकारों का आरोप है कि ऐसे आयोजनों के बाद पूरे साल उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता। जो कला राज्य की सांस्कृतिक पहचान के रूप में दिखाई जाती है उसी कला से जुड़े कलाकार रोजगार और आर्थिक संकट से जूझते रहते हैं।

उनका कहना है कि नाचा सिर्फ कलाकारों की रोजी-रोटी का साधन नहीं है छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान है। इसके साथ प्रदेश का इतिहास, लोक ज्ञान, लोकभाषा और सामाजिक स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। कलाकारों का मानना है कि यदि सरकार और समाज मिलकर इस लोककला के संरक्षण के लिए गंभीर प्रयास करें तो नाचा जीवित रहने के साथ आने वाली पीढ़ियों तक भी अपनी समृद्ध विरासत पहुंचा सकता है।

नाचा-गम्मत छत्तीसगढ़ की उस सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है जिसने वर्षों तक गांवों की चौपालों को जीवंत बनाए रखा। इसने लोगों को हंसाया, समाज को जागरूक किया और लोक संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया। आज जब यह कला अस्तित्व के संकट से जूझ रही है तब इसे बचाने की जिम्मेदारी केवल कलाकारों की नहीं होती ये पूरे समाज की है। क्योंकि किसी भी संस्कृति की पहचान उसकी परंपराओं और लोक कलाओं से होती है और नाचा छत्तीसगढ़ की ऐसी ही एक अनमोल पहचान है।

 

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