खबर लहरिया Blog MP, Ground Report: 79 साल आज़ादी के बाद बिक्रमपुर पंचायत चुनाव, सरपंच की कुर्सी पर कोई और फैसलों पर ठाकुरों का दबदबा, क्यों? 

MP, Ground Report: 79 साल आज़ादी के बाद बिक्रमपुर पंचायत चुनाव, सरपंच की कुर्सी पर कोई और फैसलों पर ठाकुरों का दबदबा, क्यों? 

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले की बिक्रमपुर ग्राम पंचायत में लोगों से बात करने पर पंचायत की राजनीति को लेकर एक अलग तस्वीर सामने आती है। रिपोर्टिंग के दौरान कुछ गांव वालों से बात करने पर उनका कहना रहा कि गांव में चुनाव तो होते हैं और लोग अपने वोट से सरपंच और दूसरे प्रतिनिधियों को चुनते भी हैं पर चुनाव के बाद पंचायत की असली ताकत किसी और के हाथ में होती हैं।

रिपोर्ट – अलीमा, गीता, लेखन – रचना     

महिला सरपंच सरी बाई कुशवाहा (फोटो साभार: खबर लहरिया)                   

15 अगस्त आते ही देश में आजादी का जश्न शुरू हो जाता है। 79 साल पहले इसी दिन भारत अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हुआ था। उस समय देश में फैसले लोगों की मर्जी से नहीं अंग्रेजी हुकूमत के हिसाब से होते थे। आजादी के बाद लोकतंत्र आया और चुनाव इसकी सबसे बड़ी पहचान बने। चुनाव के जरिए आम लोगों को अपने प्रतिनिधि चुनने और अपनी पसंद की सरकार बनाने का अधिकार मिला। एक आम नागरिक अपना वोट देकर यह तय कर सकता है कि उसके गांव, शहर और देश की बागडोर किसके हाथ में हो। यही चुनाव आजादी का वह हिस्सा है जहां हर व्यक्ति का वोट बराबर माना जाता है और उम्मीद की जाती है कि चुने गए प्रतिनिधि सबके लिए काम करेंगे और विकास का रास्ता सबके लिए खुलेगा।

लेकिन 79 साल बाद भी सिर्फ चुनाव हो जाना ही बराबरी की गारंटी नहीं है। यह बात साबित होती है मध्य प्रदेश की बिक्रमपुर ग्राम पंचायत की कहानी कम और ज़्यादा सच्चाई से। यहां चुनाव होते हैं लोग वोट देते हैं और सरपंच भी चुना जाता है लेकिन गांव की सत्ता पर उच्च जाति के ठाकुर परिवारों का दबाव और दबदबा बना हुआ है। जिनके पास पैसा, सत्ता, राजनीतिक पहुंच और सामाजिक ताकत है उनका प्रभाव इतना ज्यादा है कि चुना हुआ सरपंच भी कई बार उनके सामने कमजोर पड़ जाता है। यानी वोट से चुनी गई कुर्सी किसी के पास हो सकती है लेकिन गांव में असली फैसले कोई और ही ले रहा है। 

खबर लहरिया के रिपोर्टिंग के द्वारा बिक्रमपुर की इसी कहानी को गांव की जमीन से समझने की कोशिश गई।

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले की बिक्रमपुर ग्राम पंचायत में लोगों से बात करने पर पंचायत की राजनीति को लेकर एक अलग तस्वीर सामने आती है। रिपोर्टिंग के दौरान कुछ गांव वालों से बात करने पर उनका कहना रहा कि गांव में चुनाव तो होते हैं और लोग अपने वोट से सरपंच और दूसरे प्रतिनिधियों को चुनते भी हैं पर चुनाव के बाद पंचायत की असली ताकत किसी और के हाथ में होती हैं। गांव में लंबे समय से एक प्रभावशाली समुदाय का दबदबा बना हुआ है और पंचायत के फैसलों पर भी उसका असर दिखाई देता है और वो ठाकुर समाज के कुछ लोग हैं।  

गांव वालों से बातचीत पर बताते हैं कि आरक्षित सीट से कोई महिला या कोई वंचित वर्ग का व्यक्ति चुनाव जीतकर सरपंच बन भी जाए तो कई बार पंचायत के बड़े फैसले उनकी अपनी मर्जी से नहीं हो पाते। उन्हें उन्हीं गांव के प्रभावशाली लोगों की बात और दबाव के बीच काम करना पड़ता है। आरोप है कि गांव में किसी भी प्रकार के काम में या फैसलों में किसी सरपंच या ग्रामीणों की नहीं होती बल्कि उन्ही ठाकुर समाज के प्रभावशाली लोगों के इशारे पर ही सब कुछ होता है।   

गांव का चौक (फोटो साभार: खबर लहरिया)                                   

गांव के ही स्कूल के पास छपरे के नीचे घास काट रही एक महिला ने पंचायत चुनाव को लेकर कहती हैं सीट चाहे सामान्य हो, एससी की हो, एसटी की हो, पिछड़े वर्ग की हो या महिला के लिए आरक्षित हो इससे यहां ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। चुनाव में कोई भी जीतकर सरपंच बन जाए लेकिन गांव में आखिरी फैसला तो उन्हीं लोगों का चलता है जिनका यहां पहले से दबदबा है। “यहां सरपंच अपनी मर्जी से कितना फैसला ले पाता है ये सब जानते हैं।” 

रिपोर्टर गीता “आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य समाज के सभी समुदायों को पंचायत चुनाव के नेतृत्व का अधिकार देना होता है लेकिन बिक्रमपूर में ऐसा देखने को मिला कि आरक्षित वर्ग के प्रत्याशी केवल नाम के लिए अनौपचारिक रूप से चुनाव लड़ते हैं जबकि पंचायत में होने वाले कामों का निर्णय और संचालन जो प्रभावशाली लोग उनको मोहरा बना कर खड़ा कराते हैं उनके निर्देशों पर होता है।”

देखा जाए तो जिन समुदायों के पास लंबे समय से जमीन, पैसा, सामाजिक प्रभाव और राजनीतिक पहुंच जैसे संसाधन रहे हैं उनके लिए सत्ता में अपनी जगह बनाए रखना अपेक्षाकृत आसान रहा है और चुनाव भी इसी व्यवस्था का एक हिस्सा है। पंचायत में आरक्षण रखने का मतलब यह भी है कि गांव की सरकार में हर तरह के लोगों की भागीदारी हो। जो लोग पहले कभी पंचायत के फैसलों में आगे नहीं आ पाते थे उन्हें भी चुनाव लड़ने और जिम्मेदारी संभालने का मौका मिले। इसी वजह से एससी, एसटी, पिछड़े वर्ग और महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जाती हैं ताकि वे भी सरपंच बनें अपनी बात रखें और अपने गांव के फैसले खुद लेने में हिस्सा लें। लेकिन बिक्रमपुर में रिपोर्टिंग के दौरान कुछ और ही देखने को मिला जहां जमीन पर तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। 

“पंचायत कोई भी चलाए गांव में विकास दिखना चाहिए” 

गांव में अपने घर के दरवाजे पर चारपाई पर बैठे 32 साल के एक युवक ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा “हमारे यहां सदियों से यही परंपरा चली आ रही है। मन से हम इसे सही मानें या न मानें लेकिन यहां के माहौल को देखते हुए इसे मानना पड़ता है।” आगे कहते हैं कि कई बार उनके मन में यह सवाल भी उठता है कि अगर वह खुद चुनाव लड़ें और जीत जाएं तो भी क्या होगा। गांव में लोग जागरूक तो हैं लेकिन उन प्रभावशाली लोगों का डर भी है। “जब हम जीतकर भी अपनी बात नहीं रख पाएंगे और अपने हिसाब से काम नहीं कर पाएंगे तो फिर चुनाव लड़ने का क्या फायदा?” पंचायत चुनाव में जीतकर कोई प्रतिनिधि भले ही आधिकारिक तौर पर पंचायत की जिम्मेदारी संभाल ले पर कई मामलों में वह स्वतंत्र होकर फैसला नहीं ले पाता। गांव में जिन लोगों का लंबे समय से प्रभाव रहा है उनके सामने अपनी बात रखना या उनके फैसले को चुनौती देना हर किसी के लिए आसान नहीं है।

हालांकि उनका ये भी कहना रहा कि उनके लिए सबसे जरूरी बात यह है कि पंचायत कोई भी चलाए लेकिन गांव में विकास का काम दिखना चाहिए और उसका फायदा सभी लोगों तक पहुंचना चाहिए।

इस गांव में बंदूक की नोक पर होता है चुनाव, आरोप 

वर्तमान सरपंच सरी बाई कुशवाहा के घर के बाहर कुछ युवाओं से पंचायत चुनाव और गांव की राजनीति को लेकर बातचीत हुई। बात आगे बढ़ी तो उन्होंने गांव की चुनावी राजनीति की एक ऐसी तस्वीर बताई। गांव के कुछ युवाओं का कहना था कि गांव की राजनीति मुख्य रूप से दो गुटों में बंटी हुई है। दोनों गुटों का नेतृत्व ठाकुर समुदाय के प्रभावशाली लोगों के पास है। एक तरफ महूम सिंह उर्फ हल्के राजा का नाम लिया गया तो दूसरी तरफ लोकपाल सिंह का। इन दोनों के बीच ही सरपंची को लेकर मुख्य मुकाबला रहता है। तभी एक और युवक कहता है कि उनके यहां पंचायत का चुनाव भी बंदूक की नोक पर होता है। 

ये भी बताया कि पंचायत की सीट किस वर्ग के लिए आरक्षित है इससे इन दोनों गुटों की राजनीति पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। सीट जिस वर्ग के लिए आरक्षित होती है उसी हिसाब से दोनों पक्ष अपने-अपने उम्मीदवार को मैदान में उतारते हैं। उम्मीदवार कौन होगा इसे तय करने से लेकर चुनाव में पैसा लगाने और लोगों को अपने पक्ष में करने तक उन प्रभावशाली लोगों की ही भूमिका रहती है। एक युवक ने बातचीत में कहा कि चुनाव लड़ने का खर्च भी आम उम्मीदवार के लिए आसान नहीं होता। ऐसे में जिन लोगों के पास पैसा और राजनीतिक ताकत है वे अपने पसंद के उम्मीदवार को खड़ा करते हैं और उसका चुनावी खर्च भी उठाते हैं। चुनाव के बाद अगर उनका उम्मीदवार जीत जाता है तो पंचायत में उसी गुट का चलन बना रहता है। यानी सरपंच की कुर्सी पर कोई दूसरा व्यक्ति बैठ सकता है लेकिन फैसलों पर असर उसी गुट का रहता है जिसने उसे चुनाव में खड़ा किया और जिताने में मदद की। 

आजादी के बाद से पंचायत चुनावों में उम्मीदवार चुनने से लेकर चुनाव की रणनीति बनाने और पंचायत के कामकाज तक में कुछ प्रभावशाली लोगों की भूमिका बनी हुई है। इसी वजह से पंचायत में सभी लोगों की बराबर भागीदारी को लेकर सवाल खड़े होते हैं। हालांकि कई लोग इस बारे में खुलकर बात करने से भी बचते हैं।जब बातचीत के दौरान गांव के लोगों से पूछा गया कि गांव की सरपंच तो महिला हैं तो उन्होंने वर्तमान सरपंच सरी बाई कुशवाहा का नाम लिया। आरोप लगाया कि सरी बाई सिर्फ नाम के लिए सरपंच हैं और पंचायत के ज्यादातर फैसलों में उनकी स्वतंत्र भूमिका नहीं है। उनका दावा है कि पंचायत के कामकाज में लोकपाल सिंह की भूमिका ज्यादा रहती है। उनका ये भी आरोप है कि सरी बाई चुनाव जीतकर सरपंच जरूर बनी हैं लेकिन पंचायत के बड़े फैसलों से लेकर कामकाज तक में उन्हें अपनी मर्जी से निर्णय लेने की पूरी आजादी नहीं है। 

इन आरोपों के बाद सच और स्थिति जानने के लिए और यह समझने के लिए कि पंचायत का कामकाज वास्तव में किस तरह चल रहा है सरपंच सरी बाई कुशवाहा और लोकपाल सिंह से उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई। उनका पक्ष मिलने के बाद यह साफ हो सकेगा कि ग्रामीणों द्वारा लगाए जा रहे इन आरोपों में कितनी सच्चाई है और पंचायत के फैसले वास्तव में किस तरह लिए जाते हैं।

बस नाम मात्र सरपंच 

बिक्रमपुर ग्राम पंचायत की वर्तमान सरपंच सरी बाई कुशवाहा हैं। उनसे बातचीत के दौरान ऐसा लगा कि पंचायत में होने वाले सभी कामों और लिए जाने वाले फैसलों की उन्हें पूरी जानकारी नहीं है। ग्रामीण पहले ही आरोप लगा चुके हैं कि पंचायत के कामकाज में सरी बाई की भूमिका बहुत सीमित है। सरी बाई से जब पंचायत के कामकाज और उनके फैसलों के बारे में पूछा गया तो वह पंचायत में चल रहे दूसरे कामों के बारे में ज्यादा विस्तार से नहीं बता पाईं। उनके लिए सरपंच बनने के बाद सबसे बड़ा बदलाव उनके अपने मोहल्ले में बनी सड़क है। उनके मोहल्ले में पहले सड़क नहीं थी। जब उन्हें सरपंच का चुनाव लड़ाया गया था तब उनसे यह भी कहा गया था कि मोहल्ले की सड़क बनवाई जाएगी।

अब उनके मोहल्ले में सड़क बन चुकी है और सरी बाई इससे खुश हैं। बातचीत में उन्होंने बताया कि सरपंच के पद से उन्हें करीब 8 हजार रुपये महीने का मानदेय मिलता है और वह इससे संतुष्ट हैं और उनके लिए फिलहाल सरपंच बनने की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि जिस मोहल्ले में पहले सड़क नहीं थी वहां अब सड़क बन गई है।

लेकिन पंचायत के बाकी काम कैसे तय होते हैं कौन सा काम कब कराया जाना है पंचायत में फैसले किस तरह लिए जाते हैं और विकास के लिए पैसा कहां और कैसे खर्च होता है इन सवालों पर सरी बाई ज्यादा जानकारी नहीं दे पाईं। ऐसा लगा कि सरपंच होने के बावजूद पंचायत के पूरे कामकाज में उनकी सीधी भागीदारी बहुत ज्यादा नहीं है। यहीं से ग्रामीणों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों को समझने का सवाल भी सोचने को मजबूर करता है।

हालांकि ग्रामीणों के कई आरोप हैं और उन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। लेकिन सरी बाई से बातचीत में यह जरूर दिखाई देता है कि उनके लिए सरपंच बनने के बाद सबसे अहम उपलब्धि उनके मोहल्ले में बनी सड़क है। हां लेकिन एक चीज़ यहां सोचने समझने या सवाल के रूप में है कि क्या सरी बाई को सिर्फ एक सड़क बनवाने के वादे के साथ सरपंच की कुर्सी तक पहुंचाया गया? और अगर ऐसा है तो ये उस राजनीति की ओर इशारा करता है जहां किसी व्यक्ति की जरूरत को पूरा करने के बदले उसे सत्ता और चुनाव की प्रक्रिया में एक चेहरे के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। किसी को प्रतिनिधि बनाकर उसकी जरूरत पूरी कर देना और फिर पंचायत के असली फैसलों से उसे दूर रखना लोकतंत्र और आरक्षण के मकसद पर एक सवाल तो जरुर खड़ा होता है।

जिला पंचायत के सीईओ इस विषय में क्या कहते हैं 

जिन लोगों पर पंचायत के कामकाज में दखल देने के आरोप लगाए गए उनके घर जाकर भी उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई। घर पर परिवार की एक बुजुर्ग महिला मिलीं और उन्होंने इस मामले पर बात करने से इनकार कर दिया। संबंधित लोग उस समय घर पर मौजूद नहीं थे।  

छतरपुर जिले के मजिस्ट्रेट ऑफ़िस (फोटो साभार: खबर लहरिया)                            

उसके बाद इस पर छतरपुर जिले के सीईओ शिवाय अर्जरिया से भी बात करने की कोशिश की गई। उन्होंने इस मुद्दे पर विस्तार से बात करने से साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था “लोग अपनी मर्जी से चुनाव लड़ते हैं तो मैं क्या कर सकता हूं। मैं इस विषय पर बात नहीं करूंगा।” उन्होंने इस मुद्दे को आगे नहीं बढ़ाने की बात कहते हुए कहा कि इसे यहीं छोड़ दें और जैसा चल रहा है चलने दें।

रिपोर्टर “हालांकि प्रशासन की मिलीभगत का कोई स्वतंत्र प्रमाण सामने नहीं आया है पर उनकी बातों से कहीं ना कहीं ये लगा कि प्रशासन की मिली भगत से ये सब होता है कि चुनाव कोई लड़ता है और काम कोई और करता है क्योंकि जब प्रशासन ही कार्यवाही नहीं करती तो फिर जनता क्या करेगी। कहीं ना कहीं ये भी देखने को मिला कि ये लोग नहीं चाहते कि जो चुनाव लड़े वही काम करें इन लोगों के ऊपर कहीं ना कहीं दबाव है इसीलिए प्रशासन कुछ नहीं करता और मीडिया के सामने बात करने से डरते हैं।” 

 

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