मध्य प्रदेश में एक ओर भीषण गर्मी लोगों का हाल बेहाल कर रही है, वहीं दूसरी ओर छतरपुर जिला अस्पताल में भर्ती मरीजों को राहत देने वाले पंखे ही जवाब दे चुके हैं। हालात ऐसी है कि मरीजों और उनके परिजनों को अस्पताल में इलाज के साथ-साथ गर्मी से लड़ने की भी जंग लड़नी पड़ रही है। कई वार्डों में एक महीने से पंखे खराब पड़े हैं, जिसके चलते मरीज अपने घरों से टेबल फैन और कूलर लाने को मजबूर हैं।
रिपोर्ट – अलीमा, लेखन – सुचित्रा
मध्य प्रदेश के इस सरकारी जिला अस्पताल में अक्सर कोई न कोई समस्या देखने को मिलती है। खबर लहरिया ने नियमित रूप से इस अस्पताल में चल रही दिक्कतों, सुविधाओं की कमी को दिखाया है। इसके बावजूद इस अस्पताल में कोई खास सुधार नहीं हो पाए हैं। अब यहां के मरीजों के लिए एक नई परेशानी खड़ी हो गई है वो है बंद पंखा।
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गर्मी में मरीजों का हाल बेहाल
अस्पताल में वार्ड में लगा पंखा करीब एक महीना यानी मई से खराब है। अस्पताल में भर्ती मरीजों का कहना है कि भीषण गर्मी और उमस के बीच वार्डों में बैठना तक मुश्किल हो गया है। सबसे ज्यादा परेशानी बुजुर्गों, बच्चों और गंभीर रूप से बीमार मरीजों को हो रही है।
अस्पताल में बेड की कमी
अस्पताल में न तो पर्याप्त बेड उपलब्ध हैं और न ही सभी वार्डों में पंखों की व्यवस्था सुचारु है। अस्पताल के एक वार्ड में 30 बेड हैं और सभी बेड पर दो दो मरीज़ भर्ती हैं। ऐसे में एक बेड पर दो मरीज़ ठीक से सो भी नहीं पाते और दिक्कत बढ़ जाती है।
“बेटा हाथ से हवा करता है, तब थोड़ी नींद आ पाती है”
ताज बीबी छतरपुर से हैं और जिला अस्पताल में 25 मई से भर्ती हैं। उनकी उम्र 46 साल हैं उन्होंने बताया कि उन्हें ब्लड प्रेशर और लूज मोशन की शिकायत के बाद भर्ती किया गया था।
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उन्होंने कहा, “यहां इतनी गर्मी है कि आराम करना मुश्किल हो गया है। एक बेड पर दो-दो मरीज हैं, ऊपर से पंखा भी खराब है। मैं दूर गांव से आई हूं, इसलिए घर से पंखा भी नहीं ला सकी। मेरा बेटा रईस खान मेरे सिरहाने बैठकर हाथ से हवा करता है, तब जाकर थोड़ी नींद आती है।”
ताज बीबी ने आरोप लगाया कि जब उन्होंने डॉक्टर से पंखा खराब होने की शिकायत की तो उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
अस्पताल में 18 मई से भर्ती 28 वर्षीय सुनीता अहिरवार भी व्यवस्था से नाराज नजर आईं। सुनीता रामपुर गांव से हैं। उन्होंने बताया कि लू लगने के कारण उन्हें उल्टी-दस्त की शिकायत हुई थी, जिसके बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया।
सुनीता का कहना है, “वार्ड में इतनी भीड़ है कि एक कमरे में 40 से 50 लोग भर्ती हैं। पंखे चलते नहीं हैं और कई खराब पड़े हैं। एक बेड पर दो लोगों को लिटाया जा रहा है। मेरे पति घर से छोटा कूलर लेकर आए, तभी कुछ राहत मिल रही है। यहां भर्ती होना है तो अपने साथ पंखा या कूलर लेकर आना पड़ेगा।”
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समाजसेवी ने उठाए सवाल
समाजसेवी रिंकू सिंह 26 मई को जिला अस्पताल में अपने रिश्तेदार से मिलने आए थे। उन्होंने अस्पताल की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह अपने एक रिश्तेदार को देखने अस्पताल गए थे, जहां उन्होंने कई लोगों को घर से पंखे और कूलर लाते देखा।
उन्होंने कहा, “क्या जिला प्रशासन मरीजों को पंखे तक उपलब्ध नहीं करा सकता? इलाज के लिए आने वाले लोगों को अपनी जेब से पैसा खर्च कर कूलर-पंखे लाने पड़ रहे हैं। गर्मी में बीमार व्यक्ति की हालत और बिगड़ सकती है। अस्पताल जैसी जगह पर ऐसी स्थिति बेहद चिंताजनक है।”
रिंकू सिंह ने बताया कि उन्होंने इस संबंध में सिविल सर्जन से शिकायत भी की थी, जिन्होंने सुधार का आश्वासन दिया था।
अस्पताल प्रशासन बोला— दो दिन में ठीक होंगे सभी पंखे
मामले पर जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. शरद चौरसिया ने कहा कि चौथे वार्ड में पंखे खराब होने की जानकारी उन्हें नहीं थी।
उन्होंने बताया, “आपके माध्यम से यह मामला मेरे संज्ञान में आया है। आज ही मैकेनिक को बुलाकर पंखों की मरम्मत करवाई जाएगी और दो दिन के भीतर सभी खराब पंखे ठीक कर दिए जाएंगे।”
उन्होंने यह भी कहा कि कुछ मरीज ज्यादा हवा के लिए अपने घरों से कूलर या टेबल फैन लेकर आते हैं।
बेड की कमी भी बनी बड़ी समस्या
बेड की कमी को लेकर डॉ. चौरसिया ने बताया कि वर्तमान में अस्पताल में मरीजों की संख्या काफी बढ़ गई है, जिसके कारण कई बार एक बेड पर दो मरीजों को रखना पड़ता है। उन्होंने बताया कि एक दिन में कम से कम 15 से 20 मरीज आते हैं।
उन्होंने कहा, “गंभीर मरीजों को प्राथमिकता के आधार पर अलग बेड उपलब्ध कराया जाता है। बेड बढ़ाने के लिए उच्च अधिकारियों को पत्र भेजा गया है। नई बिल्डिंग बनने के बाद अस्पताल की क्षमता बढ़ेगी और प्रत्येक मरीज को अलग बेड उपलब्ध कराया जा सकेगा।”
भीषण गर्मी के इस दौर में जिला अस्पताल की स्थिति कई सवाल खड़े कर रही है। जब मरीजों को राहत देने वाले पंखे ही बंद पड़े हों और उन्हें अपने घरों से कूलर-पंखे लाने पड़ें, तो सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की तैयारियों पर सवाल उठना लाजिमी है। अब देखना होगा कि प्रशासन के आश्वासन जमीन पर कितनी जल्दी दिखाई देते हैं और मरीजों को कब तक गर्मी से राहत मिल पाती है।
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