मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में नरवाई जलाने पर प्रशासन ने सख्त रोक लगा दी है। कार्यालय कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट छतरपुर ने 18 मार्च 2026 को सूचना जारी कर जानकारी दी गई। इस आदेश में अब खेतों में फसल के अवशेष जलाने पर सख्त कार्रवाई होगी और और जुर्माना भी देना होगा। लेकिन इस फैसले के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है किसानों के पास इसके आलावा अन्य विकल्प क्या है?
पराली जलाने पर पर्यावरण को दूषित करने का आरोप किसानों पर लगता रहा है, इस तरह की खबर और आरोप आप ने भी कई दफा सुने होंगे। पर्यावरण को दूषित करने वालों में फैक्ट्री से निकलने वाली जहरीली गैस को नज़रअंदाज कर सारा दोष किसानों द्वारा जलाई जा रही पराली और नरवाई को मान लिया जाता है। ऐसे में मध्य प्रदेश में नरवाई जलाने को लेकर नियम पर किसानों के बीच चिंता और डर दोनों बढ़ गए हैं।
क्या है नरवाई और क्यों जलाते हैं किसान?
आपको बता दें पराली खासतौर पर धान (चावल) की फसल कटने के बाद बचा हुआ डंठल होता है। नरवाई से मतलब है जो किसी भी फसल (गेहूं, धान, सरसों आदि) के कटने के बाद बचे डंठल या अवशेष के लिए इस्तेमाल होता है। लेकिन किसानों के पास इन्हें जलाने के आलावा कोई और चारा नहीं है।
रिपोर्ट – अलीमा, लेखन – सुचित्रा
इस समय गेहूं काटने के बाद खेतों में पड़ी नरवाई को अधिकतर किसान जला देते हैं। किसानों के लिए यही नरवाई जलाना एक बड़ी चुनौती बन जाता है। अगली फसल की जल्दी तैयारी, समय की कमी और संसाधनों के अभाव में किसान इसे जलाना ही आसान रास्ता समझते हैं। लेकिन सरकार का मानना है कि यह आसान तरीका पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो रहा है। इससे हवा प्रदूषित होती है, मिट्टी की उर्वरता घटती है और खेत की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है।
प्रशासन की सख्ती और जुर्माने का प्रावधान
छतरपुर प्रशासन ने नरवाई जलाने पर पूरी तरह रोक लगाते हुए कड़े निर्देश जारी किए हैं।
- 2 एकड़ से कम जमीन पर – 2,500 रुपए जुर्माना
- 2 से 5 एकड़ तक – 5,000 रुपए जुर्माना
- 5 एकड़ से अधिक – 15,000 रुपए तक जुर्माना
साथ ही, नियम तोड़ने पर धारा 163 (यह एक रोक लगाने वाली धारा है, जिसे प्रशासन शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए लगाता है।) के तहत कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
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नरवाई का उपयोग और सलाह
कृषि विभाग भी किसानों को नरवाई न जलाने की सलाह दे रहा है। उप संचालक कृषि अधिकारी अनिल कुमार मिश्रा के अनुसार, नरवाई जलाने से मिट्टी के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं और खेत की गुणवत्ता प्रभावित होती है। उन्होंने बताया कि सरकार फसल अवशेष प्रबंधन के लिए सब्सिडी देती है। किसान ई-कृषि पोर्टल के जरिए आवेदन कर मशीनों पर अनुदान ले सकते हैं, जिससे बिना जलाए खेत साफ किया जा सकता है।
कार्यालय कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट छतरपुर द्वारा जारी किए गए निर्देश में कहा गया है कि नरवाई जलाने से अच्छा है इसका इस्तेमाल जानवरों के खाने के लिए भूसे के रूप में किया जाए। आदेश में कहा गया है भूसा और पुआल की मांग सिर्फ अपने जिले में ही नहीं, बल्कि दूसरे जिलों और राज्यों में भी होती है। इकट्ठा किया गया भूसा लगभग 8 से 10 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचा जा सकता है।
वहीँ इस बात से सहमत किसान पुष्पा यादव भी यही मानती है। वह कहती हैं अगर इसे नहीं जलाया जाए तो इससे पशुओं के लिए भूसा मिल सकता है और मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहती है। कई किसान ऐसे भी है जिन्हें सरकार द्वारा दिए जा रहे लाभ के बारे में कोई जानकारी नहीं है इस वजह से भी उन्हें नरवाई जलानी पड़ती है। कुछ किसानों ने बताया यदि हमें पता होता कि सब्सिडी मिलती है तो हम नरवाई नहीं जलाते।
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किसानों की मजबूरी: “न जलाएं तो करें क्या?”
जब इस नियम पर किसानों से बात की गई, तो उनकी सबसे बड़ी चिंता यही थी कि फसल के डंठल को जलाए नहीं तो क्या करें? किसानों का कहना है कि एक फसल काटने के तुरंत बाद दूसरी फसल बोनी होती है। ऐसे में खेत साफ करने के लिए उनके पास न समय होता है, न संसाधन।
महंगी मशीनें जैसे हैप्पी सीडर या रोटावेटर हर किसान की पहुंच में नहीं हैं। सरकारी योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन उनका लाभ हर किसान तक नहीं पहुंच पाता।
एक किसान ने कहा, “अगर हम नरवाई नहीं जलाएं तो खेत कैसे तैयार करें? मशीनें खरीदना हमारे बस की बात नहीं है।”
नरवाई जलाने पर कार्रवाई, किसान परेशान
किसान चन्दन कुशवाहा (बदला हुआ नाम) का कहना है कि खेतों में फसल कटने के बाद बड़ी मात्रा में अवशेष रह जाते हैं, जिससे अगली फसल बोना मुश्किल हो जाता है। अधिकारी तो मना कर देते हैं, लेकिन अगर किसान समय पर नई फसल नहीं लगाएगा, तो उसका नुकसान कौन भरेगा?
चन्दन कहते हैं कि उन्होंने 18 अप्रैल को नरवाई जलाई थी, तो उनके खिलाफ कार्रवाई भी हुई। उनके खिलाफ पड़ोसी सूचना दी और कृषि विभाग के अधिकारी उन्हें पकड़ कर ले गए और एफआईर दर्ज कर दी। वैसे तो प्रशासन हैप्पी सीडर और रोटावेटर जैसी मशीनों की बात करता है, लेकिन उन्हें इनकी सही जानकारी नहीं है और ये मशीनें बहुत महंगी होती हैं—एक लाख रुपये से ज्यादा की—जो छोटे और गरीब किसान नहीं खरीद सकते। उनका कहना है कि अगर सरकार कोई ठोस समाधान दे, तो वे नरवाई जलाना बंद कर सकते हैं।
नरवाई जलाने की वजह समय की कमी भी
दूसरे किसान राममिलन कुशवाहा (उम्र 45 वर्ष) का कहना है कि नरवाई जलाना उनकी मजबूरी है। हाल ही की बात है 23 अप्रैल को उन पर नरवाई जलाने पर 2500 रुपए का जुर्माना लगाया गया। उन्होंने अभी तक जुर्माना नहीं भरा है लेकिन उनके अंदर डर अभी भी है।
उनका कहना है कि रोटावेटर चलाने के बाद भी खेत में कुछ अवशेष रह जाते हैं, जिनमें दीमक लग जाती है। अगर उसी खेत में अगली फसल बोई जाए, तो फसल खराब होने का खतरा रहता है।
जब तक सरकार कोई ठोस समाधान नहीं देगी, तब तक किसान नरवाई जलाने को मजबूर रहेंगे चाहे उस पर कार्रवाई हो या जेल क्यों न जाना पड़े। उनका कहना है कि खेती का काम पूरी तरह से मौसम पर निर्भर करता है ऐसे में हर काम समय पर होना जरुरी है इसलिए दूसरी फसल लगाने के लिए नरवाई जलानी पड़ती है। खेती ही उनके परिवार की आजीविका है और अगर वे समय पर अगली फसल नहीं लगा पाएंगे, तो बच्चों का पालन-पोषण कैसे होगा।
राम मीनल के अनुसार, नरवाई जलाने से खेत जल्दी साफ हो जाता है और वे तुरंत दूसरी फसल की तैयारी कर पाते हैं। वहीं, मशीनों के भरोसे रहने पर उन्हें दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जिससे काफी समय बर्बाद होता है और फसल का पूरा चक्र प्रभावित हो जाता है।
किसानों की यह समस्या सिर्फ नियम तोड़ने की नहीं, बल्कि मजबूरी और व्यवस्था की कमी को भी दिखाती है। एक तरफ प्रशासन नरवाई जलाने पर रोक लगा रहा है, जो पर्यावरण के लिए जरूरी भी है। लेकिन दूसरी तरफ ज़मीन पर हकीकत यह है कि छोटे और मध्यम किसान के पास न तो समय है, न संसाधन और न ही सस्ती तकनीक की आसान पहुंच।
अगर किसान पर जुर्माना और कार्रवाई ही होगी, लेकिन उसे कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं मिलेगा, तो समस्या खत्म नहीं होगी बस दबेगी और फिर सामने आएगी। हैप्पी सीडर और रोटावेटर जैसी मशीनों की बात करना आसान है, लेकिन जब ये लाखों की कीमत की हों और गांव तक उपलब्ध ही न हों, तो किसान के लिए यह समाधान नहीं, सिर्फ सलाह बनकर रह जाती है।
किसान जानबूझकर पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहते। उनके पास न तो इतने पैसे हैं और न ही उतनी कमाई इस वजह से जो उन्हें आसान लगता है वही करते हैं। जब तक किसानों को आसान और सस्ता विकल्प नहीं मिलेगा, तब तक नरवाई जलाना बंद कराना मुश्किल रहेगा।
नरवाई जलाने पर रोक लगाकर किसानों की समस्या को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जरूरत इस बात की है कि सख्ती के साथ-साथ उन्हें आसान और काम आने वाले तरीके भी दिए जाएं, ताकि मजबूरी में उन्हें गलत काम न करना पड़े।
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