मध्य प्रदेश के सतना के मझगवां ब्लॉक के सुरंगी गांव में चार महीने की बच्ची प्रियांशी की कथित तौर पर कुपोषण से मौत हो गई। जन्म के चार महीने बाद भी दोनों बच्चों का वजन 3 किलो के आसपास ही था जबकि इस उम्र में 4 से 5 किलो होना चाहिए।
मध्य प्रदेश के सतना में एक दिल दहला देने वाली घटना ने एक बार फिर सरकारी दावों की हकीकत सामने ला दी है। मझगवां ब्लॉक में कुपोषण की समस्या काफी समय से बनी हुई है। हालात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 7 महीनों में 3 बच्चों की जान जा चुकी है। यानी यह मामला सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं है यह समस्या पूरे इलाके में परेशानी बनी हुई है। जब भी ऐसी घटना होती है कुछ दिन तक हलचल रहती है जांच होती है नोटिस दिए जाते हैं और फिर धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ जाता है। उसके बाद सब कुछ पहले जैसा ही चलता रहता है।
मध्य प्रदेश के सतना के मझगवां ब्लॉक के सुरंगी गांव में चार महीने की बच्ची प्रियांशी की कथित तौर पर कुपोषण से मौत हो गई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 22 अप्रैल 2026 को सतना जिले के सुरंगी गांव में चार महीने की बच्ची प्रियांशी की मौत ने एक बार फिर पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए। प्रियांशी और उसका जुड़वां भाई नैतिक जन्म से ही कमजोर थे। दोनों का जन्म 21 दिसंबर 2025 को हुआ था और शुरू से ही उनका वजन सामान्य से काफी कम था। ऐसे बच्चों को खास निगरानी और पोषण की जरूरत होती है लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ। हालत ये रही कि चार महीने बाद भी दोनों बच्चों का वजन 3 किलो के आसपास ही था जबकि इस उम्र में 4 से 5 किलो होना चाहिए।
परिवार के मुताबिक बच्चे पिछले 15 दिनों से बीमार थे लेकिन उन्हें पहले गांव के झोलाछाप डॉक्टर के पास ले जाया गया। जब हालत ज्यादा बिगड़ गई तब 21 अप्रैल को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया जहां से जिला अस्पताल रेफर किया गया। इलाज के दौरान 22 अप्रैल को प्रियांशी की मौत हो गई जबकि नैतिक को रीवा रेफर करना पड़ा। डॉक्टरों ने दोनों बच्चों को गंभीर कुपोषण (SAM) की श्रेणी में रखा था।
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बता दें इस मामले की जांच में आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं की लापरवाही सामने आई है। बताया गया है कि बच्चों की मां को जन्म के बाद सही सलाह नहीं दी गई यहां तक कि स्तनपान को लेकर भी जरूरी जानकारी नहीं दी गई। बच्चों को गाय और बकरी का दूध दिया जाता रहा जिससे उनकी हालत और खराब होती चली गई। जांच के बाद आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सुपरवाइजर को नोटिस दिया गया है वहीं एएनएम पर भी कार्रवाई शुरू हुई है। इसके अलावा झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ भी कार्रवाई की बात कही गई है। लेकिन सवाल यही है क्या हर बार सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई कर देने से हालात बदल जाएंगे?
कांग्रेस द्वारा दिया गया आँकड़ा
इस पूरे मामले को लेकर कांग्रेस ने राज्य सरकार पर सवाल उठाए हैं। पार्टी का कहना है कि प्रदेश के 55 में से 45 जिले ‘रेड जोन’ में हैं, जहां 10 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं और 1.36 लाख बच्चे गंभीर स्थिति में हैं। कुपोषण का प्रतिशत भी राष्ट्रीय औसत से ज्यादा बताया जा रहा है। आरोप है कि जहां बच्चों को पोषण और देखभाल की जरूरत है वहीं अधिकारी बैठकों और कागजी कामों में उलझे रहते हैं। उन्होंने आँकड़ा एक्स पर पोस्ट कर लिखा है।
मध्य प्रदेश के सतना में कुपोषण से एक बच्ची की मौत हो गई, जबकि उसके जुड़वां भाई की हालत बेहद नाजुक है।
ये उस एमपी की हालत है, जहां अधिकारी एक घंटे की बैठक में 24,000 रुपए के काजू-बादाम-किशमिश खा गए, लेकिन बच्चों को ढंग का खाना तक नसीब नहीं है।
आंकड़े बताते हैं 👇
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— Congress (@INCIndia) April 23, 2026
कुपोषण से सात महीने में तीन मौत
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट इस पूरे मामले को और साफ तरीके से सामने रखती है। रिपोर्ट के मुताबिक मझगवां ब्लॉक के सुरांगी गांव में चार महीने के जुड़वा बच्चे नैतिक और सुप्रीयांशी (घर वाले प्रीयांशी कहते थे) की तबीयत बिगड़ने पर 21 अप्रैल को जिला अस्पताल के पीडियाट्रिक आईसीयू में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान 22 अप्रैल को सुप्रांशी की मौत हो गई, जबकि नैतिक को आगे इलाज के लिए रीवा भेजा गया। जांच में सामने आया कि बच्चों को जन्म के बाद मां का दूध नहीं मिला और उन्हें गाय-बकरी का दूध दिया जाता रहा। आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने समय पर सही सलाह नहीं दी जिससे हालत लगातार बिगड़ती गई।
दूसरा कैमहा गांव में करीब 11 महीने की बच्ची भारती की 5 – 6 अप्रैल की रात मौत हो गई। बच्ची को बुखार था और परिवार उसका इलाज गांव के एक स्थानीय डॉक्टर से करा रहा था। बाद में जब टीम जांच के लिए पहुंची तो उन्होंने कुपोषण से मौत से इनकार किया और कारण बताया कि दूध श्वास नली में फंस गया था लेकिन बिना पोस्टमार्टम के यह बात कहे जाने पर सवाल खड़े हो गए। खास बात ये भी रही कि पहले पिता ने कुपोषण जैसी बीमारी की बात कही थी लेकिन बाद में उनका बयान बदल गया।
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तीसरा मरवा गांव में हुसैन रजा नाम के बच्चे का जन्म जुलाई 2025 में हुआ था और उस समय उसका वजन सामान्य था लेकिन कुछ ही महीनों में उसका वजन घटकर 2.5 किलो रह गया। परिवार इलाज के लिए अलग-अलग अस्पतालों के चक्कर लगाता रहा लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ। आखिरकार 20 अक्टूबर 2025 को उसकी मौत हो गई। जांच में सामने आया कि निगरानी और फॉलोअप में लापरवाही हुई थी जिसके चलते समय पर सही देखभाल नहीं मिल सकी।
सरकार की तरफ से महिलाओं और बच्चों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं जैसे आईसीडीएस (एकीकृत बाल विकास सेवा), पोषण अभियान, जननी सुरक्षा योजना और प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना। इन योजनाओं का मकसद है कि गर्भवती महिलाओं को सही पोषण मिले बच्चों का वजन और स्वास्थ्य नियमित जांच में रहे और जरूरत पड़ने पर तुरंत मदद मिले। NRC (पोषण पुनर्वास केंद्र) ऐसे बच्चों के लिए होता है जो गंभीर कुपोषण से जूझ रहे होते हैं, जहां उन्हें भर्ती कर इलाज, पोषण और देखभाल दी जाती है।
आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी होती है कि वे ऐसे कमजोर बच्चों की पहचान करें, मां को सही सलाह दें और जरूरत पड़ने पर उन्हें समय पर NRC या अस्पताल तक पहुंचाएं।सतना की ये घटनाएं साफ दिखाती हैं कि कुपोषण सिर्फ आंकड़ों का मुद्दा नहीं जमीन पर बड़ी समस्या बन चुका है। महिला एवं बाल विकास विभाग और स्वास्थ्य विभाग दोनों की इसमें अहम भूमिका होती है। आंगनबाड़ी के जरिए बच्चों को पोषण और मां को सही सलाह और समय-समय पर निगरानी दी जानी चाहिए जबकि स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी होती है कि बीमार बच्चों को समय पर सही इलाज मिले लेकिन इन मामलों में दोनों ही स्तर पर कहीं न कहीं कमी नजर दिख रही है।
सतना जैसी घटनाएं यह दिखाती हैं कि ये योजनाएं कागज़ों में ठीक दिखती हैं जमीन पर उनका असर कमजोर नजर आता है। सही समय पर सलाह न मिलना निगरानी की कमी और इलाज में देरी ये सारी बातें मिलकर हालात को और गंभीर बना देती हैं।
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