महोबा जिले कुलपहाड़ तहसील से खबर आयी है कि वहां के शौचालयों में लंबे समय से साफ – सफाई की सुविधा नहीं है। लोग उसी गंदगी में मजबूरी में इस्तेमाल कर रहे हैं। स्थिति देखने से लगता है मानों शौचालय वर्षों से साफ नहीं हुई हो। इतना ही नहीं शौचालय में दरवाज़ा और पानी की भी सुविधा नहीं है।
रिपोर्टिंग – श्यामकली, लेखन – रचना
अगर किसी सरकारी दफ्तर में आने से पहले लोगों को यह सोचना पड़े कि वहां पानी पिएं या नहीं, टॉयलेट जाएं या खुद को रोकें तो यह सिर्फ़ अव्यवस्था नहीं बल्कि सिस्टम की असफलता है। उत्तर प्रदेश के महोबा ज़िले की कुलपहाड़ तहसील में शौचालयों की बदहाली न सिर्फ़ प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है बल्कि यह भी दिखाती है कि आम लोगों खासतौर पर महिलाओं को रोज़मर्रा में कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। गंदगी, बदबू और पानी की कमी से भरे शौचालय बीमारियों को न्योता दे रहे हैं लेकिन जिम्मेदार अधिकारी इस ओर ध्यान देते नज़र नहीं आते।
महोबा जिले कुलपहाड़ तहसील से खबर आयी है कि वहां के शौचालयों में लंबे समय से साफ – सफाई की सुविधा नहीं है। लोग उसी गंदगी में मजबूरी में इस्तेमाल कर रहे हैं। स्थिति देखने से लगता है मानों शौचालय वर्षों से साफ नहीं हुई हो। इतना ही नहीं शौचालय में दरवाज़ा और पानी की भी सुविधा नहीं है।
गंदगी, बदबू और पानी की कमी से जूझते ये टॉयलेट न सिर्फ़ इंसानी गरिमा को सिर्फ ठेस पहुंचाते हैं ये संक्रमण और बीमारियों का भी गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं। सवाल यह है कि जहां रोज़ सैकड़ों लोग न्याय और प्रशासनिक काम के लिए आते हैं वहां बुनियादी सुविधा तक उपलब्ध न हो तो आम जनता को कितनी मजबूरी और अपमान झेलना पड़ता होगा?
272 गांवों की तहसील, लेकिन बुनियादी सुविधा खस्ती
कुलपहाड़ तहसील के अंतर्गत 272 गांव आते हैं। यहां रोज़ाना सैकड़ों लोग अपने काम से पहुंचते हैं। तहसील परिसर में करीब 150 वकील बैठते हैं। इसके अलावा एसडीएम, तहसीलदार, खाद्य विभाग के अधिकारी, पुलिस क्षेत्राधिकारी, नायब तहसीलदार, कानूनगो और लेखपाल जैसे कई अधिकारी यहीं काम करते हैं।
इतने बड़े प्रशासनिक ढांचे के बावजूद तहसील में बने सार्वजनिक शौचालय गंदगी से भरे पड़े हैं। सवाल यह है कि जब अधिकारी रोज़ यहीं बैठते हैं तो क्या उनकी नज़र कभी इन शौचालयों पर नहीं जाती? अगर जाती तो हालात इतने बदतर क्यों होते?
महिला कर्मचारी की मजबूरी
तहसील में काम करने वाली एक महिला कर्मचारी बताती हैं कि “हम रोज़ तहसील में रहते हैं। 272 गांवों के लोग यहां आते हैं कभी कोर्ट का काम, कभी रजिस्ट्री, कभी ज़मीन का मामला। बहुत भीड़ रहती है। पीछे का हिस्सा खुला रहता है लोगों का आना-जाना लगा रहता है। ऐसे में हम महिलाएं कहां जाएं? टॉयलेट चाहे कितने भी गंदे हों नाक दबाकर वहीं जाना पड़ता है। हम कर्मचारी हैं इसलिए अधिकारियों से खुलकर कुछ कह भी नहीं सकते। डर लगता है कि शिकायत करेंगे तो उल्टा हमारे ऊपर ही सवाल उठेंगे।”
बाहर से आने वाली महिलाओं की परेशानी
महोबा ज़िले के बेलाताल कस्बे की रहने वाली कैलाश रानी बताती हैं “मैं पिछले तीन साल से तहसील के चक्कर लगा रही हूं। घर से निकलते वक्त सोचकर निकलती हूं कि यहां टॉयलेट की हालत खराब है आज वहां नहीं जाऊँगी। तहसील में बहुत लोग रहते हैं पुरुष भी होते हैं। महिलाओं के लिए बैठने की कोई सुरक्षित जगह नहीं है। कई बार खुले में भी बैठना पड़ता है। यहां की गंदगी देखकर हम तहसील में पानी तक नहीं पीते क्योंकि पानी पिया तो टॉयलेट जाना पड़ेगा।”
पुरुषों के लिए आसान, महिलाओं के लिए मुश्किल
गांव के कुछ ग्रामीण महिलाओं से बात करने पर गांव सुगिरा के रहने वाले रवी कहते हैं लड़कों को तो किसी तरह जगह मिल जाती है लेकिन महिलाओं और लड़कियों के लिए हालत बहुत खराब है। चाहे महिला शौचालय हों या पुरुषों के कहीं साफ-सफाई नहीं है। सरकार स्वच्छ भारत अभियान चला रही है लेकिन जहां इतने अधिकारी बैठते हैं वहीं उसका असर नहीं दिखता।
प्रशासन का पक्ष
इस मामले पर खबर लहरिया की रिपोर्टर ने कुलपहाड़ के एसडीएम डॉ. प्रदीप कुमार से बात की। शौचालयों और परिसर में जगह-जगह थूक पर सवाल करने पर उन्होंने कहा “थूकने के लिए पब्लिक को खुद समझना चाहिए कि कहां थूकना है और कहां नहीं। हर किसी को रोक पाना संभव नहीं है।” जब शौचालयों की साफ-सफाई को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने बताया कि महिलाओं के लिए नया शौचालय बनवाया जा रहा है। हालांकि यह साफ़ नहीं किया गया कि यह कब तक बनकर तैयार होगा।
तहसील में सफाई के लिए दो पद स्वीकृत हैं लेकिन दोनों खाली पड़े हैं। एक सफाईकर्मी 2020 में रिटायर हो गया उसके बाद किसी की स्थायी नियुक्ति नहीं हुई। फिलहाल नगर पंचायत से सफाई कर्मचारी बुलाकर काम चलाया जाता है। कई बार पानी न होने की वजह से भी सफाई नहीं हो पाती। अधिकारियों का कहना है कि बजट की कमी के कारण स्थायी सफाईकर्मी नहीं रखे जा सकते।
तब भी सवाल उठता है कि तहसील जैसी अहम सरकारी जगह पर अगर शौचालय साफ नहीं हैं तो यह सिर्फ़ असुविधा नहीं बल्कि सेहत का भी बड़ा खतरा है। गंदगी से संक्रमण और बीमारियों का खतरा बढ़ता है जिसका असर सबसे ज़्यादा महिलाओं पर पड़ता है।
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