गांव का पार्क सिर्फ झूले और घास का मैदान नहीं होता बल्कि यह बच्चों की सेहत, बुजुर्गों की सैर और पूरे गांव के सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा होता है। जब ऐसा पार्क महीनों तक बंद रहे, झूले खाली पड़े रहें और पेड़-पौधे सूखने लगें तो सवाल सिर्फ एक पार्क का नहीं बल्कि सार्वजनिक सुविधाओं के रख-रखाव और जवाबदेही का भी बन जाता है।
रिपोर्ट – श्यामकली, लेखन – सुचित्रा
उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के कबरई ब्लॉक के तिदुही गांव में एक पार्क है जो 1 साल से बंद पड़ा है। यहां की आबादी करीब 1100 है। पार्क बंद होने की वजह से बच्चों को पार्क के बजाय सड़कों और खाली मैदानों में खेलने को मजबूर होना पड़ रहा है।
पार्क में लगे पेड़ पौधे रहे सूख
गाँव में रहने वाले उदल का कहना है कि पार्क का उद्देश्य बच्चों और गांव के लोगों को सुरक्षित और स्वच्छ जगह उपलब्ध कराना था लेकिन अक्सर पार्क के गेट पर ताला लगा रहता है। उनके मुताबिक पार्क के अंदर लगी घास सूख चुकी है और कई पेड़-पौधे भी पानी के अभाव में मुरझा रहे हैं। उनका कहना है कि संबंधित अधिकारी इसी रास्ते से आते-जाते हैं और पार्क की स्थिति देखते भी हैं लेकिन इसके बावजूद रख-रखाव की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा।
पार्क होने के बावजूद बच्चे बाहर गंदगी में खेलने को मजबूर
गांव की रहने वाली सुधा बताती हैं कि जब पार्क खुलता था तो वह अपने छोटे नाती को शाम के समय वहां घुमाने और खेलने के लिए लेकर जाती थीं। पार्क में बच्चों के लिए झूले और फिसलपट्टी जैसी सुविधाएं मौजूद हैं जिन्हें सरकार ने लगवाया था। वह कहती हैं कि अब पार्क नियमित रूप से नहीं खुलता इसलिए बच्चे या तो घर के भीतर खेलते हैं या बाहर गलियों और मैदानों में। उन्होंने बताया कि कई बार पार्क की देख-रेख करने वाले कर्मचारी से पार्क खोलने की बात कही गई लेकिन स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया।
गाँव के भवानीदीन का कहना है कि छोटे बच्चे अक्सर मिट्टी और धूल में खेलते हैं जिससे उनके स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है। उनके अनुसार यदि पार्क नियमित रूप से खुला रहे तो बच्चे सुरक्षित और साफ वातावरण में खेल सकेंगे। उनका यह भी कहना है कि पार्क की घास की कटाई, पौधों को पानी देने और साफ-सफाई की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए लेकिन इस ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा।
पार्क के गार्ड ने आरोपों को किया ख़ारिज
पार्क की देखरेख करने वाले कर्मचारी संतु इन आरोपों से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि वह पिछले चार वर्षों से पार्क में काम कर रहे हैं और उन्हें पांच हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय मिलता है। पार्क प्रतिदिन सुबह छह बजे से नौ बजे तक खुलता है और वह इसी दौरान पौधों को पानी देते हैं। शाम के समय भी बच्चे खेलने आते हैं। पार्क के पास पानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। पहले लगाया गया हैंडपंप खराब है और समरसेबल से भी पर्याप्त पानी नहीं निकलता जिसके कारण पूरे पार्क और सभी पौधों को नियमित पानी देना संभव नहीं हो पाता। केवल किसी विशेष परिस्थिति जैसे शादी या अन्य जरूरी काम के कारण किसी दिन पार्क नहीं खुल पाता। बाकी दिनों में पार्क खुलता है और ग्रामीणों के आरोप सही नहीं हैं।
प्रधान समस्या से अनजान
इस मामले में ग्राम प्रधान पार्वती राय ने कहा कि पार्क उनके कार्यकाल में बना था लेकिन इसकी विस्तृत जानकारी उनके पति के पास है क्योंकि पंचायत का अधिकांश कार्य वही देखते हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि आवश्यक कार्यों में उनके हस्ताक्षर होते हैं लेकिन पार्क के संचालन और रख-रखाव की जानकारी उन्हें विस्तार से नहीं है।
बाद में प्रधान प्रतिनिधि ने बताया कि लगभग तीन-चार वर्ष पहले पार्क के पास बोरिंग भी कराई गई थी ताकि पौधों को पर्याप्त पानी मिल सके। उनका कहना है कि पार्क खोलने के लिए कर्मचारी नियुक्त है और उनके अनुसार पार्क नियमित रूप से खुलता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी मानते हैं कि बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए खुले मैदान और पार्क बेहद जरूरी हैं। नियमित खेलकूद से बच्चों की शारीरिक ताकत बढ़ती है, मोटापा कम होता है, सामाजिक व्यवहार विकसित होता है और मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर रहता है। ऐसे में यदि गांव में पार्क जैसी सार्वजनिक सुविधा उपलब्ध है तो उसका नियमित संचालन और रख-रखाव केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि ग्रामीणों के बेहतर स्वास्थ्य और विकास से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय भी है।
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