खबर लहरिया Blog Mahoba, Ground Report: पत्थर खदान में मजदूर की मौत, सुरक्षा व्यवस्था और मुआवज़े पर उठे गंभीर सवाल

Mahoba, Ground Report: पत्थर खदान में मजदूर की मौत, सुरक्षा व्यवस्था और मुआवज़े पर उठे गंभीर सवाल

                                          

उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के कबरई कस्बे में 31 मार्च 2026 को पत्थर खदान में काम कर रहे 30 वर्षीय मजदूर रामदास की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। मृतक रामदास कबरई के पहाड़ में ड्रिलिंग (पहाड़ को होल करना या छेद करना) का काम कर रहे थे इसी दौरान वे पहाड़ से नीचे गिर गए और उनकी मौत हो गई। 

रिपोर्ट – श्यामकली, लेखन – रचना 

पहाड़ की तस्वीर (फोटो साभार: खबर लहरिया)

यह घटना एक बार फिर खदानों में काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा व्यवस्था और उनके अधिकारों को लेकर बड़े सवाल खड़े करती है। बता दें कि यह महोबा की पहली घटना नहीं है इससे पहले भी कई बार इस तरह के हादसे हो चुके हैं लेकिन हालात आज भी जस के तस बने हुए हैं।

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घटना को लेकर अलग-अलग दावे, परिवार ने लगाए गंभीर आरोप

परिवार के मुताबिक रामदास रोज की तरह सुबह करीब 8 बजे काम पर गया था लेकिन दोपहर में अचानक उसकी मौत की खबर आ गई। परिजनों का कहना है कि उन्हें इस घटना की जानकारी तुरंत नहीं दी गई बल्कि करीब दो घंटे बाद बताया गया। जब वे मौके पर पहुंचे तो उन्हें शव तक देखने नहीं दिया गया। उनका आरोप है कि ठेकेदार शव को अपने साथ ले गया और परिवार को उससे दूर रखा गया।
वहीं दूसरी तरफ से यह दावा किया जा रहा है कि यह एक हादसा था जिसमें रामदास करीब 20 फीट ऊंचाई से गिर गया था। बताया गया कि वह पहाड़ पर ड्रिलिंग यानी पत्थरों में छेद करने का काम कर रहा था और उसी दौरान संतुलन बिगड़ने से गिर पड़ा।

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परिवार का सहारा था रामदास

मृतक की मां सुशीला ने बताया कि रामदास 16-17 साल की उम्र से ही पत्थर खदान में काम कर रहा था। उन्होंने कहा कि परिवार को समय पर सूचना नहीं दी गई और जब तक वे पहुंचे तब तक ठेकेदार शव को अपने कब्जे में ले चुका था।
रामदास के पिता ने भी बताया कि वह घर का सबसे बड़ा बेटा था और परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी। परिवार पहले से ही मुश्किल हालात में जी रहा है। एक बेटा दिव्यांग है, एक दिल्ली में जेल में बंद है और एक बेटा रिक्शा चलाकर किसी तरह घर चला रहा है। ऐसे में रामदास की मौत ने पूरे परिवार को संकट में डाल दिया है।

मुआवज़े को लेकर खींचतान

मृतक के मामा रामजी रावण से बात करने पर उन्होने बताया कि परिवार ने पहाड़ मालिक से 20 लाख रुपये मुआवज़े की मांग रखी थी लेकिन ठेकेदार और पहाड़ मालिक इस रकम को देने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि फिलहाल पंचनामा भरवाने की बात हो रही है और पोस्टमार्टम के बाद आगे की कार्रवाई तय होगी। परिवार इसके लिए मुक़दमा दर्ज यानी पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करवाना चाहते थे और इसकी कोशिश भी की गई उन्हें मजबूरन समझौता करवाना पड़ा। 

इसी के साथ पूर्व सभासद रविचंद्र ने बताया कि उसी रात में परिवार वालों के साथ समझौते को लेकर बातचीत की गई थी जिसमें कुछ मुआवज़ा देने की बात सामने आई थी लेकिन सुबह होते ही ठेकेदार ने अपना रुख बदल लिया और साफ कह दिया कि “मुकदमा करना है तो कर लो पैसे नहीं मिलेंगे।” ऐसे हालात में गरीब परिवार के सामने कानूनी लड़ाई लड़ना बेहद मुश्किल हो जाता है।

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जिम्मेदारी से बचते मालिक

दरअसल इस घटना में पहाड़ मालिक से संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी। उनके जगह उनके भाई कल्याण सिंह ने कहा कि उन्हें इस घटना की कोई जानकारी नहीं है और वे मजदूरों या खदान से जुड़ी कोई जानकारी नहीं दे सकते।

वहीं दूसरी तरफ खदान के मुनिम विकास से बात करने पर उनका कहना है कि इस तरह की घटनाएं “आम बात” हैं। उनसे मज़दूर के सुरक्षा से संबंधित सवाल करने पर उन्होंने बताया कि मजदूरों की सुरक्षा के लिए रस्सी दी जाती है जिसे कमर में बांधकर काम करना होता है लेकिन रामदास ने पानी पीने या किसी अन्य कारण से रस्सी हटा दी थी। हालांकि यह बयान खुद ही कई सवाल खड़े करता है कि अगर सुरक्षा के पूरे इंतजाम हैं तो बार-बार मजदूरों की जान क्यों जा रही है?

समझौते में सिमट जाता है न्याय

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस इलाके में इस तरह की घटनाओं के बाद बहुत कम परिवार केस दर्ज कर पाते हैं। ज्यादातर मामलों में पहाड़ मालिक और ठेकेदार पैसे के दम पर समझौता कर लेते हैं। मजदूरों के पास इतने संसाधन नहीं होते कि वे लंबी कानूनी लड़ाई लड़ सकें इसलिए मजबूरी में उन्हें समझौते का रास्ता अपनाना पड़ता है।

बता दें इस मामले में भी आखिरकार परिवार ने समझौता कर ही लिया और इससे संबंधित कोई भी जानकारी देने या बताने से मना कर दिया जिससे एक बार फिर यह सवाल खड़ा होता है कि क्या गरीब मजदूरों को कभी पूरा न्याय मिल पाएगा?

यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं उस सिस्टम की हकीकत दिखाती है जहां मजदूरों की सुरक्षा के दावे किए जाते हैं लेकिन जमीन पर हालात कुछ और ही होते हैं। बार-बार हो रही ऐसी घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या मजदूरों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं है? और कब तक गरीबी के कारण न्याय समझौते में बदलता रहेगा?

 

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