खबर लहरिया Blog Ground Report: गैस की बढ़ती दामों के कारण लोग बना रहे कोयले और मिट्टी से ईंधन, कोयला बना रसोई का सहारा  

Ground Report: गैस की बढ़ती दामों के कारण लोग बना रहे कोयले और मिट्टी से ईंधन, कोयला बना रसोई का सहारा  

वाराणसी के चौकाघाट क्षेत्र जो नगर निगम के अंतर्गत आता है वहां कुछ परिवार गैस के बजाय मिट्टी और कोयले के चूरे से बनाए गए ईंधन का इस्तेमाल करके खाना बनाते हैं। यहाँ करीब ऐसे दस परिवार झोपड़ियों में रहकर इसी तरह खाने की व्यवस्था करते हैं।  

रिपोर्ट – सुशीला, लेखन – रचना 

कोयले और मिट्टी से बनी गोलियाँ (ईंधन) (फोटो साभार: सुशीला)                             

गैस की क़िल्लत की समस्या इस समय देश में अभी भी बनी हुई है भले ही अब ये मुद्दा मीडिया की सुर्ख़ियों में कम दिखाई देता हो लेकिन धरातल पर आज भी कई लोग गैस की क़िल्लत का सामना कर रहे हैं। अगर गैस मिल भी जाए तो लोगों के मज़दूरी के जितना ही गैस का दाम बढ़ गया है जिसके कारण इस समय भी गैस की कमी उतनी ही है जैसे आज से ठीक दो महीने पहले थी। ऐसे में परिवार अपने घर का चूल्हा जलाने और दो समय का खाना तैयार करने के लिए अलग-अलग माध्यमों का सहारा ले रहे हैं। अपनी जरुरत और सुविधा के अनुसार लोग खुद ही भोजन पकाने  की व्यवस्था कर रहे हैं। 

वाराणसी के चौकाघाट क्षेत्र जो नगर निगम के अंतर्गत आता है वहां कुछ परिवार गैस के बजाय मिट्टी और कोयले के चूरे से बनाए गए ईंधन का इस्तेमाल करके खाना बनाते हैं। यहाँ करीब ऐसे दस परिवार झोपड़ियों में रहकर इसी तरह खाने की व्यवस्था करते हैं। 

यह जानने के लिए कि ये परिवार कोयले का चूरा कहां से लाते हैं, उसमें ईंधन कैसे तैयार करते हैं और उसपर खाना बनाना उनके लिए कितना आसान या मुश्किल है उनके बीच पहुंच कर उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को समझने की कोशिश की।                              

कोयले से ईंधन तैयार करने की प्रक्रिया 

चौकाघाट की रहने वाली शीला उस कोयले को छोटे-छोटे लड्डू का आकर दे रही हैं और वह बताती हैं कि पहले उनके घर में लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनता था। बाद में गैस कनेक्शन मिलने के बाद उन्होंने गैस का इस्तेमाल शुरू कर दिया था। लेकिन कुछ समय से गैस मिलने में दिक्कत होने लगी इसलिए उन्हें फिर से कोयले और लकड़ी के चूल्हे का सहारा लेना पड़ रहा है। 

शीला बताती हैं कि बाजार में करीब 300 रुपए में चूल्हा मिल जाता है। कोयला का चूरा 25 रुपए पसेरी के हिसाब से कोयले की दुकान से मिल जाता है और मिट्टी आसपास से ही ले आती हैं। इसको तैयार करने के लिए पहले कोयले के चूरे और मिट्टी का कुछ हिस्सा चावल से निकले पानी के साथ मिला कर एक मसाला जैसा तैयार किया जाता है जिसके बाद उसे छोटे-छोटे लड्डू या गोलियों का आकार दिया जाता। इसके बाद इन गोलियों को धूप में सुखाया जाता है जिसमें सही तरीके से सूखने के लिए मौसम के अनुसार दो से तीन दिन का समय लगता है। सूखने के बाद उसे चूल्हे में डाल कर कागज या पत्तों के सहारे से आग लगाया जाता है जिसमें करीब आधे घंटे में अच्छी आग तैयार हो जाती है। शुरुआत में धुआं ज़्यादा निकलता है इसलिए चूल्हे को घर से बाहर ही रखा जाता है। जब धुआं कम हो जाता है और आग ठीक से जलने लगती है तब उसे घर के भीतर ले जाया जाता है। एक बार चूल्हा जल जाने पर उसे में दाल, चावल, रोटी और सब्जी सब कुछ बनाया जा सकता है। 

कोयले का चूरा (फोटो साभार: सुशीला)

शीला के अनुसार अगर घर में पांच लोग हैं तो एक पसेरी कोयला और मिट्टी से तैयार किया गया ईंधन करीब एक सप्ताह तक चल जाता है। “घर में गैस सिलेंडर तो है लेकिन गैस की दिक्कत बढ़ने के कारण उसका इस्तेमाल नहीं करते हैं। अब गैस केवल बहुत जरुरी काम के लिए ही इस्तेमाल करते हैं। अभी बाकी समय खाना चूल्हे पर ही बनता है।” 

कोयले का गोलियाँ बन रही महिलाएं (फोटो साभार: सुशीला)                                        

गैस की कीमत बढ़ने की सबसे ज़्यादा असर गरीबों पर 

दूसरी ओर मीना नाम की महिला भी गोलियाँ बनाती हुई नजर आईं। उनसे  बात करने पर कहती हैं “गैस सिलेंडर के बढ़ते दाम का असर सबसे ज़्यादा हम गरीब परिवारों पर पड़ा है। पहले सिलेंडर 400 रुपए के आसपास मिल जाता था लेकिन अब इसका पैरा इतना बढ़ गया है कि हर महीने गैस भरवाना हमारे बस की बात नहीं है।” 

गोलियाँ सूखने के बाद उठाया जा रहा है (फोटो साभार: सुशीला)                       

वे कहती हैं घर में कोई बीमार पड़ जाए, बच्चों की फीस जमा करनी हो या दवाई का खर्च चाहिए तो गैस भरवाने के लिए पैसे नहीं बचते। ऐसे में वे कोयले और मिट्टी से बनी गोलियों का इस्तेमाल करके उसके ईंधन से खाना बनाती हैं। कहती हैं परिवार के कई लोग पढ़े लिखे हैं लेकिन स्थाई नौकरी किसी के पास नहीं है। कोई ठेला लगाता है तो कोई छोटी मोती मजदूरी करता है। रोज की इतनी से कमाई में घर का चलना मुश्किल हो जाता है। इसलिए जहां से थोड़ी से बचत हो सकती है वहां लोग मजबूरी में ऐसे विकल्प अपनाते हैं। 

इस काम से स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है धूप में गोलियाँ बनानी पड़ती हैं और धुएँ की परेशानी भी होती है लेकिन इतनी महँगी गैस और काम आय के बीच उनके पास और कोई विकल्प भी नहीं है। 

जलने के बाद कोयला कुछ ऐसा दिखता है (फोटो साभार: सुशीला)                          

वहीं संतोष का कहना है कि उन्हें अपने स्वास्थ्य की चिंता लगी रहती है लेकिन मजबूरी के कारण कोयले का इस्तेमाल करना पड़ता है। कहते हैं गैस की बढ़ती क़ीमतों और महंगाई ने गरीब लोगों की कमर तोड़ दी है। दरअसल संतोष एक छोटी चाय की दुकान चलाते हैं और दुकान पर चाय बनाने के लिए भी इसी कोयले का इस्तेमाल करते हैं। वे बताते हैं कि कोयले से निकलने वाला धुआं सिर्फ उन्हें नहीं आसपास में रहने वाले लोगों के लिए भी परेशानी का कारण बनता है।

संतोष आग जलाते हुए और निकलता धुआं (फोटो साभार: सुशीला)                                

इसके बावजूद कमाई इतनी नहीं है कि हर समय गैस का उपयोग किया जा सके इसलिए मजबूरी में उन्हें इसी तरीके से अपना काम और घर घर दोनों चलाने पड़ रहे हैं। 

कोयले और मिट्टी से बने इस ईंधन से धुआं और प्रदूषण जरूरू होता है लेकिन आर्थिक तंगी के कारण लोग इसे अपनाने को मजबूर हैं। दो समय का खाना जुटाने और कुछ पैसे बचाने के लिए वे घंटों मेहनत करके ये ईंधन करते हैं। उनके लिए इन परिस्थितियों में जीवन चलाने का एक मात्र सहारा बन चुका है। 

 

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