खबर लहरिया Blog मनोरंजन या संदेश, जब गाने बनते हैं सामाजिक सोच का आईना 

मनोरंजन या संदेश, जब गाने बनते हैं सामाजिक सोच का आईना 

भारतीय समाज में जाति और जेंडर से जुड़े मुद्दों की झलक फिल्मों और गीतों में लंबे समय से दिखाई देती रही है। कई बार गाने समाज में मौजूद भेदभाव और रूढ़ियों को सामने लाते हैं तो कई बार वे खुद भी इन्हें मजबूत करने का काम करते हैं। खासकर जेंडर के मामले में देखा जाए तो फिल्मों और गीतों में महिलाओं को अक्सर उनकी प्रतिभा या व्यक्तित्व के बजाय उनके रूप और आकर्षण के आधार पर पेश किया जाता है।       

फोटो साभार: हिंदी पथ     

संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं है यह समाज और संस्कृति को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है। सदियों से गीत और संगीत लोगों की भावनाओं, विचारों और अनुभवों को अभिव्यक्त करने का काम करते आए हैं। संगीत की खास बात यह है कि इसकी कोई निश्चित भाषा नहीं होती फिर भी यह हर व्यक्ति के दिल तक पहुंच जाता है। लोग अपनी भावनाओं को समझने, तनाव कम करने, खुद को व्यक्त करने और अपने विचार दूसरों तक पहुंचाने के लिए संगीत का सहारा लेते हैं।

गीतों के माध्यम से किसी भी संदेश को सरल और प्रभावी तरीके से लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। यही वजह है कि अलग-अलग समय में प्रेम, धर्म, शिक्षा, संघर्ष, युद्ध, प्रकृति और सामाजिक बदलाव जैसे विषयों पर अनेक गीत लिखे और गाए गए हैं। लेकिन आज यह सवाल उठता है कि क्या वर्तमान दौर के गीत समाज में बराबरी, न्याय और सामाजिक सुधार जैसे मुद्दों को उतनी जगह दे रहे हैं, जितनी पहले दी जाती थी? बीसवीं सदी में ऐसे कई गीत और फिल्मी गाने सुनने को मिलते थे जो शोषण, जातिगत भेदभाव, महिलाओं की आजादी, प्रकृति और समाज में बदलाव जैसे विषयों को सामने लाते थे। इन गीतों का उद्देश्य केवल लोगों का मनोरंजन करना नहीं था उन्हें सोचने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रेरित करना भी था। उस समय प्रगतिशील विचारों वाले गीत सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करते थे।

आज के समय में ऐसे गीत अपेक्षाकृत कम सुनाई देते हैं। पिछले कुछ दशकों के लोकप्रिय गीतों पर नजर डालें तो सामाजिक बराबरी और परिवर्तन की बात करने वाले गाने बहुत कम दिखाई पड़ते हैं। वहीं कई फिल्मी और लोकप्रिय गीत ऐसे हैं जिनमें जाति, जेंडर और महिलाओं के शरीर को लेकर बनी रूढ़ धारणाओं को दोहराया जाता है। कुछ गीत महिलाओं को सीमित नजरिए से पेश करते हैं या ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जो भेदभावपूर्ण सोच को मजबूत करते हैं।

ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या आज का संगीत समाज में सकारात्मक बदलाव की दिशा में अपनी भूमिका निभा रहा है या फिर उसका दायरा धीरे-धीरे केवल मनोरंजन तक सिमटता जा रहा है?

भारतीय समाज में जाति और जेंडर से जुड़े मुद्दों की झलक फिल्मों और गीतों में लंबे समय से दिखाई देती रही है। कई बार गाने समाज में मौजूद भेदभाव और रूढ़ियों को सामने लाते हैं तो कई बार वे खुद भी इन्हें मजबूत करने का काम करते हैं। खासकर जेंडर के मामले में देखा जाए तो फिल्मों और गीतों में महिलाओं को अक्सर उनकी प्रतिभा या व्यक्तित्व के बजाय उनके रूप और आकर्षण के आधार पर पेश किया जाता है। वहीं ट्रांसजेंडर समुदाय को भी कई बार मजाक, हीनता या रूढ़ छवि के साथ दिखाया गया है।

इसके विपरीत पुरुष पात्रों को आमतौर पर ताकतवर, आत्मविश्वासी और प्रभावशाली रूप में दिखाया जाता है। गीतों की कहानी, कैमरे का फोकस और प्रस्तुति भी अधिकतर महिलाओं या ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के शरीर और हाव-भाव पर केंद्रित रहती है जबकि पुरुष अक्सर मुख्य और नियंत्रक भूमिका में दिखाई देते हैं।

कई लोकप्रिय गीतों पर यह आरोप भी लगता रहा है कि वे छेड़छाड़, यौन हिंसा या महिलाओं के प्रति असम्मानजनक व्यवहार को सामान्य बनाने का काम करते हैं। इसके अलावा कुछ गानों में महिलाओं के नामों का इस्तेमाल इस तरह किया गया कि वे नाम एक विशेष छवि से जुड़ गए। “मुन्नी बदनाम हुई”, “शीला की जवानी” और “पिंकी है पैसे वालों की” जैसे गीत इसके उदाहरण हैं। ऐसे गीतों के बाद इन नामों वाली कई महिलाओं और लड़कियों को स्कूल, कॉलेज, दफ्तर और सार्वजनिक स्थानों पर मजाक, टिप्पणियों और छेड़छाड़ जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।                         

आज भी कई ऐसे लोकप्रिय गाने हैं जिन्हें लोग बड़े शौक से सुनते हैं लेकिन उनके बोलों में लैंगिक भेदभाव और पितृसत्तात्मक सोच साफ दिखाई देती है। कई गीतों में महिलाओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे हर परिस्थिति में पुरुषों के अधीन रहें और उनकी हर बात को स्वीकार करें। उदाहरण के लिए फिल्म नसीब अपना अपना के गीत “भला है बुरा है जैसा भी है, मेरा पति मेरा देवता है” में पति को देवता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस तरह के बोल यह संदेश देते हैं कि पुरुष चाहे जैसा भी व्यवहार करे, महिला का कर्तव्य उसे सम्मान देना और उसकी बात मानना है। ऐसे गीत पितृसत्तात्मक सोच को मजबूत करने वाले माने जा सकते हैं।

इसी तरह फिल्म राज़ी के गीत दिलबरो की पंक्तियां “फसलें जो काटे जाएं उगती नहीं, बेटियां जो ब्याहे जाएं मुड़ती नहीं” भारतीय समाज की उस पारंपरिक सोच को दर्शाती हैं जिसमें शादी के बाद बेटी को हमेशा के लिए ससुराल का हिस्सा मान लिया जाता है। आलोचकों का मानना है कि इस तरह की सोच महिलाओं पर सामाजिक दबाव बढ़ाती है और कई बार उन्हें घरेलू हिंसा या अन्य समस्याओं के बावजूद अपने मायके लौटने से रोकती है।

कुछ गीतों पर महिलाओं के प्रति असम्मानजनक नजरिया बढ़ाने के आरोप भी लगते रहे हैं। उदाहरण के तौर पर भोजपुरी गीत “लहंगा उठा दे रिमोट से” के बोल महिलाओं को एक वस्तु की तरह देखने वाली मानसिकता को बढ़ावा देते हैं। इसी तरह फिल्म फटा पोस्टर निकला हीरो के गीत “गंदी बात” में यह दिखाया गया है कि जब एक लड़की किसी पुरुष की रुचि या प्रेम प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करती, तो पुरुष का व्यवहार बदल जाता है। कुछ लोग इसे महिलाओं की असहमति को सम्मान न देने वाली सोच के रूप में देखते हैं।

इन उदाहरणों से पता चलता है कि मनोरंजन के लिए बनाए गए गीत केवल संगीत तक सीमित नहीं रहते वे समाज की सोच को भी प्रभावित करते हैं। इसलिए गीतों के बोल और उनके संदेशों पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है, ताकि वे समानता, सम्मान और संवेदनशीलता को बढ़ावा दे सकें।                 

इसी तरह ट्रांस जेंडर समुदाय को गीतों में गलत और अपमानजनक छवि के रूप में प्रस्तुत करते हैं एक गीत जिसके बोल हैं “तयय्यब अली प्यार का दुश्मन हाए हाए” जिसमें उनके छवि को “हाए हाए” बोल के साथ रोड पर ताली बजाकर नाचते हुए दिखाकर समाज में सिर्फ़ उनके स्थान को या उनके पहचान को उत्सव या रोड ट्रेन बसों पर नाचकर पैसे मागने वाले तक सीमित है बताया जाता है।ठीक इसी तरह कुछ ऐसे गाने भी है जो जाति पर आधारित होती है या जाति विशेष गाने सुनने को मिलता है कुछ यूट्यूब गाना है  “दाबे से जो दबेना ऐसी ठाकुर जात है”, “बहु बन जा राजपूताने की”  “भारत का बच्चा बच्चा जय जय श्री राम बोलेगा”  “ राम नाम के नारों से बाबर की बाबरी टूट गई” आदि इस तरह के गाने भेदभाव तो पैदा करते ही हैं साथ ही हिंसात्मक माहौल बनाते हैं और दंगों का भी कारण बन जाता है। वर्तमान स्थिति में बेरोज़गारी,ग़रीबी, शिक्षा, किसान,महिला हिंसा के मुद्दों पर बहुत ही कम गाने सुनने को मिलता है।कुछ प्रगतिशील लोग, सिंगर या संगठन के तरफ से गाने बनाए जाते हैं पर उनका भी विरोध किया जाता है।इसी के साथ कुछ ऐसे गाने और रचनाकार हैं जो जातिविरोधी और यौनहिंसा जैसे समाज और देश के कड़वे सच को टक्कर देती है। फ़िल्म हाईवे के गीत “पटाका गुड्डी” जो महिलाओं के आज़ादी को समर्पित है। फ़िल्म दंगल के गीत “धाकड” दुनिया के सामने लड़कियों का लोहा मनवाने के लिए एक एंथम से काम नहीं है।फ़िल्म पिंक का एक गाना “पिंक एंथम” में वास्तविक महिलाओं को अपने अनोखे तरीक़े ज़िंदगी का जश्न मानते हुए दिखाया गया है।ऐसे कई गाने है जो जेंडर विरुद्ध गाने को टक्कर देता है।

गीतों ने हमेशा समाज की सोच और नजरिए को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जाति और जेंडर जैसे मुद्दों पर भी गानों का असर साफ दिखाई देता है। कई बार गीतों ने समाज में मौजूद भेदभाव और रूढ़ियों को मजबूत किया है तो कई बार उन्होंने इन सोचों को चुनौती देकर बदलाव की दिशा में भी काम किया है।

आज के दौर में गाने, फिल्में और रेडियो केवल मनोरंजन के साधन नहीं रह गए हैं। ये ऐसे माध्यम बन चुके हैं जो बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचते हैं और उनकी सोच, व्यवहार और दृष्टिकोण को प्रभावित करते हैं। इसलिए इन माध्यमों के जरिए दिया जाने वाला संदेश काफी मायने रखता है।

ऐसे में गीतकारों, लेखकों, फिल्मकारों और कला से जुड़े सभी लोगों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। जरूरी है कि वे ऐसी रचनाएं तैयार करें जो समाज में समानता, सम्मान और जागरूकता को बढ़ावा दें। मनोरंजन के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि गीतों और फिल्मों के माध्यम से किसी तरह की हिंसा, भेदभाव, रूढ़िवादी सोच या अपराध को सामान्य और स्वीकार्य बनाने वाला संदेश न जाए। कला का उद्देश्य समाज को बेहतर दिशा देना होना चाहिए न कि ऐसी मानसिकता को बढ़ावा देना जो लोगों के बीच असमानता और भेदभाव को मजबूत करे।

 

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