चित्रकूट के कर्वी ब्लॉक की ग्राम पंचायत अकबरपुर के संजय सिंह का पुरवा इलाके में लगभग 15 आदिवासी परिवार रहते हैं। बताया जाता है कि करीब 80 साल पहले संजय सिंह ने इन आदिवासी परिवारों को यहां बसाया था और भरोसा दिया गया था कि यह ज़मीन उनकी ही है। उसी भरोसे पर इन परिवारों ने अपनी पूरी ज़िंदगी यहीं गुज़ार दी।
रिपोर्टिंग – नाज़नी रिज़वी, लेखन – रचना
चित्रकूट की पहाड़ियों के बीच बसे आदिवासी परिवारों की कहानी किसी एक गांव या एक बस्ती की नहीं है उस व्यवस्था की है जो पीढ़ियों तक मेहनत करवाती है और फिर अधिकार देने से इंकार कर देती है। जिन हाथों ने पत्थर तोड़कर सड़कों, इमारतों और शहरों की नींव रखी आज वही हाथ खाली हैं। न काम है, न ज़मीन, न घर का अधिकार। चार – पाँच पीढ़ियों से जिस ज़मीन को ये लोग अपना घर मानते आए आज वही ज़मीन इनके सिर से छिनने वाली है।
दशकों पहले इन आदिवासियों को बसाया गया भरोसा दिया गया कि यह जगह उनकी है। उसी भरोसे पर उन्होंने कहीं और ज़मीन नहीं खरीदी न कोई दूसरा ठिकाना तलाशा। उन्होंने पत्थर तोड़े, मालिक बदले, समय बदला लेकिन वे यहीं टिके रहे। आज जब वही ज़मीन हाईवे और एक्सप्रेसवे के क़रीब आ गई है उसकी क़ीमत करोड़ों में पहुंच गई है तो सदियों से बसे आदिवासी अवैध कहे जाने लगे हैं।
चित्रकूट की पहाड़ियों और पत्थरों के बीच एक ऐसा आदिवासी समाज बसता है जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी मेहनत, मज़दूरी और भरोसे के सहारे गुज़ार दी। सदियों से ये लोग पहाड़ों से पत्थर तोड़ते रहे क्रेशरों में काम किया और उसी मेहनत से अपने बच्चों का पेट पाला। इनके लिए न ज़मीन सिर्फ़ ज़मीन थी न झोंपड़ी सिर्फ़ एक ढांचा यही इनका घर पहचान और भविष्य था। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि चार पाँच पीढ़ियों से जिस ज़मीन पर ये लोग बसे हैं, वही ज़मीन इनके लिए सबसे बड़ा खतरा बन गई है। न इनके पास ज़मीन के काग़ज़ हैं न रहने का पक्का अधिकार। विकास के नाम पर क़ीमत बढ़ने के नाम पर, इन्हें अब अवैध कहा जा रहा है। सवाल यह है कि जिन लोगों को दशकों तक बसने दिया गया जिनकी मेहनत से इलाके का विकास हुआ आज वही लोग बेघर क्यों हो रहे हैं?
पत्थर, पसीना और भरोसे की कहानी
चित्रकूट के कर्वी ब्लॉक की ग्राम पंचायत अकबरपुर के संजय सिंह का पुरवा इलाके में लगभग 15 आदिवासी परिवार रहते हैं। बताया जाता है कि करीब 80 साल पहले संजय सिंह ने इन आदिवासी परिवारों को यहां बसाया था और भरोसा दिया गया था कि यह ज़मीन उनकी ही है। उसी भरोसे पर इन परिवारों ने अपनी पूरी ज़िंदगी यहीं गुज़ार दी।
सुबह अंधेरे में क्रेशर पहुंचना, दिनभर पत्थर तोड़ना और जो थोड़े पैसे मिलते उन्हीं से आटा-सब्ज़ी का इंतज़ाम करना यही इनकी ज़िंदगी थी। जिस क्रेशर मालिक के यहां काम करते थे उसी के सहारे रहने की जगह भी मिलती थी। लेकिन समय बदला। पत्थर का काम लगभग खत्म हो गया मालिक बदल गए और इंसानियत पीछे छूटती चली गई।
कच्चे घर, टूटी उम्मीदें
आज भी ये आदिवासी परिवार पन्नी, टिन और मिट्टी से बने कच्चे झोंपड़ों में रहने को मजबूर हैं। न पक्की सड़क है, न नाली, न साफ़ पानी। बारिश में छत टपकती है, गर्मी में पन्नी तपती है। बिजली किसी तरह खींची गई तार से आती है वो भी हमेशा कटने के डर के साथ। सरकारी रिकॉर्ड में यह बस्ती कहीं दर्ज ही नहीं है इसलिए किसी योजना का लाभ भी इन्हें नहीं मिल पाता।
प्रधानमंत्री आवास योजना, काग़ज़ों की कॉलोनी
साल 2023 में इन 15 परिवारों के नाम प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कॉलोनी स्वीकृत हुई थी। पहली किस्त का पैसा भी आया, लेकिन ज़मीन विवाद के चलते आज तक एक भी घर नहीं बन पाया। सिया रानी कहती हैं कि “तीन साल पहले जब हमारे खाते में पैसा आया तो लगा अब बच्चों का भविष्य सुधरेगा लेकिन आज तक कुछ नहीं बना। कॉलोनी सिर्फ़ काग़ज़ों में है ज़मीन पर हमारी ज़िंदगी आज भी वहीं अटकी है।”
“हम जानवरों जैसी ज़िंदगी जीते रहे”
उस बस्ती की रानी बतलाती हैं कि पूरी ज़िंदगी झोंपड़ों में काट दी। बारिश में पानी टपकता है, बारह महीने धूल उड़ती है। सिलन रहती है। हम कैसे जी रहे हैं ये हम ही जानते हैं। कहा गया था ये ज़मीन हमारी है हमने भरोसा किया। आज वही भरोसा टूट गया।
दूसरी तरफ से 70 वर्षीय तुलसा बताती हैं कि “मेरे सास-ससुर यहां आए थे मैंने अपने बच्चे यहीं पाले और अब उनके भी बच्चे हो गए। चार पीढ़ियां यहीं गुज़र गईं। अगर ये जगह हमारी नहीं थी तो हमें कभी हटाया क्यों नहीं गया? इस उम्र में मैं कहां जाऊंगी?” और फिर सविता कहती हैं कि “हमने ज़िंदगी बंधुआ मज़दूर बनकर गुज़ार दी। आज न काम है न घर और अब रहने की जगह भी छीनी जा रही है।”
ज़मीन की क़ीमत बढ़ी, आदिवासी अवैध हो गए
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक यह इलाका दूर-दराज़ था तब तक किसी को आपत्ति नहीं थी। लेकिन अब यह ज़मीन हाईवे के पास है बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के करीब है और इसकी क़ीमत करोड़ों में पहुंच गई है। तभी से आदिवासियों को अवैध बताया जाने लगा। कहा जा रहा है कि यहां कोई विकास कार्य नहीं हो सकता न कोई सरकारी योजना लागू की जा सकती है।
कानून, अधिकार और ज़मीनी सच्चाई
आदिवासियों और दलितों के लिए देश में भूमि अधिकार और वनाधिकार जैसे क़ानून मौजूद हैं लेकिन चित्रकूट के ये परिवार उन क़ानूनों से आज भी दूर हैं। पूरी ज़िंदगी बंधुआ मज़दूरी में गुज़ार देने के बाद भी इनके पास न ज़मीन का अधिकार है न पक्की छत। न बच्चे पढ़ पाए न भविष्य बन सका। आज हालात ऐसे हैं कि हर परिवार हर दिन इस डर में जी रहा है कि किसी भी वक्त उन्हें यहां से निकाल दिया जाएगा। जिनके सिर पर आज भी मजबूत छत नहीं है उनके सामने अब उसी अस्थायी छत के छिन जाने का खतरा मंडरा रहा है। सवाल यह है कि अगर इन्हें यहां से हटाया गया तो ये अपने बच्चों को लेकर आखिर जाएंगे कहां?
कॉलोनी पास, लेकिन ज़मीन पर सन्नाटा
जब प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कॉलोनी पास हुई थी तो वह किन आधारों पर और किसके लिए की गई यह आज भी साफ़ नहीं है। जिन लोगों के नाम कॉलोनी स्वीकृत हुई उनके मामलों की सही ज़मीनी जांच क्यों नहीं हुई? क्या यह लापरवाही लेखपाल, प्रधान या राजस्व विभाग की है? कॉलोनी पास कराकर लोगों को पक्के घर की उम्मीद तो दे दी गई, लेकिन ज़मीन खाली कराने का डर भी साथ दे दिया गया। अकबरपुर की प्रधान गुड़िया सिंह बताती हैं कि संजय सिंह के ढफाई में 25 कॉलोनियां आई थीं जहां दशकों से आदिवासी मज़दूर परिवार रह रहे हैं। यह ज़मीन ग्राम समाज और आबादी की बताई जाती है, लेकिन राजस्व कर्मचारी अलग-अलग बहाने बनाकर आज तक जांच करने नहीं आए। हालत इतनी दयनीय है कि लोग फटी पुरानी साड़ियों से दीवारें बना रहे हैं, छप्पर-छानी में किसी तरह गुज़ारा कर रहे हैं। प्रधान का कहना है कि अगर इन परिवारों को पट्टा दे दिया जाए और थोड़ी-थोड़ी ज़मीन भी उनके नाम हो जाए तो ये सम्मान के साथ अपनी ज़िंदगी आगे बढ़ा सकते हैं।
राजस्व विभाग का पक्ष और अटकी ज़िंदगियाँ
वहीं अकबरपुर के लेखपाल लालबहादुर का कहना है कि जिस ज़मीन पर आदिवासी रह रहे हैं वह काश्तकारों और ग्राम समाज दोनों की बताई जा रही है। कॉलोनी पास होने के बाद काश्तकारों ने मुकदमा दायर कर दिया इसलिए ज़मीन की नाप-जोख ज़रूरी है। उनके अनुसार यह तय किया जाना है कि कौन-सा रकबा किसका है और आदिवासी किस हिस्से में रह रहे हैं। लेखपाल का यह भी कहना है कि फिलहाल जनगणना का काम चल रहा है उसी में कर्मचारी लगे हुए हैं। जांच पूरी होने तक उस इलाके में किसी भी योजना या विकास कार्य पर रोक लगी हुई है जिसका सबसे बड़ा असर उन्हीं आदिवासी परिवारों पर पड़ रहा है जिनकी ज़िंदगी पहले ही अधर में लटकी हुई है।
जांच किसने नहीं की? ज़िम्मेदारी किसकी?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर कॉलोनी पास हुई थी तो किस आधार पर? बिना ज़मीन की सही जांच के नाम कैसे डाले गए? लेखपाल, प्रधान और राजस्व विभाग की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। अकबरपुर सचिन मुदित प्रताप सिंह का कहना है कि मैंने कोई जांच नहीं की। ये राजस्व विभाग का काम है। मुझे मामले की जानकारी नहीं है। इसी के साथ अकबरपुर की प्रधान गुड़िया सिंह कहती हैं कि “यहां आदिवासी दशकों से रह रहे हैं। बहुत दयनीय हालत है। अगर इन्हें पट्टा दे दिया जाए तो ये सम्मान से रह सकेंगे।” वहीं लेखपाल लालबहादुर का कहना है कि ज़मीन ग्राम समाज और काश्तकार दोनों की है, मुकदमा चल रहा है और फिलहाल किसी भी विकास कार्य पर रोक है।
जिन लोगों ने अपनी पूरी ज़िंदगी पत्थर तोड़ते-तोड़ते खपा दी जिनके पास आज न काम है, न घर, न काग़ज़ अगर ये लोग यहां नहीं रह सकते तो फिर जाएँ कहाँ?







