चित्रकूट के मानिकपुर में चार दिन से रास्ता बंद है। नदी का पानी बढ़ा तो सड़क और गांवों के बीच का संपर्क जैसे थम गया। कोई मजदूरी पर नहीं जा पा रहा, कोई बाजार से जरूरी सामान नहीं ला पा रहा और कई परिवार खेतों में खड़ी फसल को अपनी आंखों के सामने बर्बाद होते देख रहे हैं। यह किसी एक दिन की परेशानी नहीं, बल्कि हर साल बारिश में लौट आने वाली समस्या है।
रिपोर्ट – नाज़नी, लेखन – सुचित्रा
लगातार बारिश से मानिकपुर क्षेत्र में हनुवा नदी का जलस्तर बढ़ने से सरैया-गढ़चपा-कौबरा मार्ग पर आना जाना मुश्किल हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि नदी पर ऊंचे और सुरक्षित पुल की मांग लंबे समय से की जा रही है, लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं हुआ।
‘मैं खबर करने जाता हूं, इस समय मेरा गांव ही खबर बना हुआ है’
गढ़चपा निवासी पत्रकार छोटेलाल बताते हैं कि पिछले चार दिनों से उनका आवागमन पूरी तरह प्रभावित है। पानी इतना बढ़ गया है कि वे बाइक लेकर गांव से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।
वह कहते हैं, “मैं पत्रकार हूं, खबर करने के लिए गांव से बाहर जाता हूं। लेकिन इस समय मेरा गांव ही खबर बना हुआ है।”
छोटेलाल के मुताबिक बारिश के दौरान हर साल यही स्थिति बनती है। नदी का पानी बढ़ते ही रास्ता बंद हो जाता है। मजदूरी और छोटे-मोटे काम करने वाले लोगों की रोजी-रोटी पर इसका सीधा असर पड़ता है।
उनका कहना है कि रोज कमाकर खाने वाले परिवारों के लिए यह परेशानी और बड़ी है। जिनके पास महीनेभर या एक सप्ताह का राशन रखने की व्यवस्था नहीं है, उनके लिए रास्ता बंद होना सिर्फ आवागमन की समस्या नहीं, बल्कि रोज की जिंदगी पर संकट है।
पांच बीघा फसल बर्बाद, हज़ारों रुपए का नुकसान
कौबरा निवासी मोनू जो कि 21 साल के हैं। उन्होंने बताया कि बचपन से ही बारिश के दिनों में इस रास्ते और नदी की यही स्थिति देखी है। इस बार नदी का पानी खेतों में भरने से उनकी करीब पांच बीघा जोंधी (ज्वार) की फसल बर्बाद हो गई।
मोनू के मुताबिक फसल तैयार हो जाती तो करीब 40 हजार रुपये की आमदनी होती। लेकिन अब तो खेती में लगाया गया पैसा और सिंचाई का खर्च भी पानी में चला गया।
वह कहते हैं, “जो नदी के उस पार हैं, वो उस पार रह गए और जो इस पार हैं, वो इस पार ही हैं।”
इस समय जो गांवों की स्थिति है उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भले ही नदी के दोनों ओर बसे लोगों के बीच दूरी कुछ ही किलोमीटर की हो, लेकिन पानी बढ़ने के बाद यह दूरी कई गुना बढ़ गई है।
चार दिन से गांवों में थमा जनजीवन
गढ़चपा निवासी राजेंद्र बताते हैं कि 18 अगस्त 2026 की शाम करीब चार बजे बारिश रुकी थी। कुछ देर के लिए पानी कम हुआ तो बेहद जरूरी काम वाले कुछ लोग पैदल पानी पार करके निकल पाए। लेकिन रात से फिर बारिश शुरू हो गई और रपटे (नदी या नाले पर बनाया गया छोटा सा रास्ता) पर पानी दोबारा बढ़ गया।
वह आगे कहते हैं “अब लोगों का निकलना मुश्किल है। सब अपने-अपने घरों में रहने को मजबूर हैं। सब्जी और दूसरी जरूरी चीजों के लिए भी बाहर जाना पड़ता है, लेकिन रास्ता बंद होने से परेशानी बढ़ गई है।”
पिछले साल रातभर फंसे रहे थे शिक्षक
इस रास्ते की समस्या सिर्फ ग्रामीणों के लिए ही नहीं है। पतरिया के जूनियर हाईस्कूल के शिक्षक मानचंद शुक्ला बताते हैं कि वह रोज इसी रास्ते से आते-जाते हैं। उनके मुताबिक सरैया संकुल के गढ़चपा, कौबरा, पतरिया, ककरौली और प्राथमिक विद्यालय पोखरी पुरवा के कई शिक्षक इसी मार्ग से स्कूल पहुंचते हैं।
मानचंद शुक्ला बताते हैं कि पिछले साल लगभग 8 शिक्षक किसी तरह पानी पार करके स्कूल पहुंच गए थे, लेकिन वापसी के समय पानी अचानक इतना बढ़ गया कि वह सिर के ऊपर पहुंच गया। इसके बाद सभी शिक्षक वहीं फंस गए। सभी लोगों को रातभर बिना खाए-पिए वहीं रुकना पड़ा।
हर साल मांग, हर साल आश्वासन
ग्रामीणों का कहना है कि हनुवा नदी पर सुरक्षित पुल की मांग कोई नई नहीं है। बरसात आते ही नदी का जलस्तर बढ़ता है और रास्ता बंद हो जाता है। यह मार्ग कई गांवों को बाजारों और अन्य जरूरी स्थानों से जोड़ता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि वे हर साल पुल की मांग करते हैं और बदले में सिर्फ आश्वासन मिलता है। फिर भी जमीन पर स्थायी समाधान दिखाई नहीं देता। बारिश खत्म होने के बाद समस्या भी जैसे पीछे छूट जाती है और अगले साल फिर वही कहानी सामने आ जाती है।
“राहत की व्यवस्था की जा रही” – प्रशासन
मानिकपुर एसडीएम विपिन कुमार द्विवेदी ने बताया कि हनुवा में रपटा बनाने की कोई योजना फिलहाल उनके संज्ञान में नहीं है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में कई स्थानों पर रपटे नीचे हैं और लगातार बारिश के कारण जलभराव की स्थिति बनी हुई है। जहां ऐसी दिक्कतें आई हैं, वहां स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यवस्था की गई है। जरूरत के मुताबिक खाद्य सामग्री पहुंचाई जा रही है और आपदा टीमों को भी अलग-अलग स्थानों पर लगाया गया है।
अधिशासी अभियंता अखिलेश कुमार ने बताया कि हनुवा के रपटे को वित्तीय वर्ष 2026-27 की कार्ययोजना में लघु सेतु के रूप में प्रस्तावित किया गया है।
आपको बता दें कि लघु सेतु का मतलब छोटे पुल से है। सामान्य तौर पर करीब सात मीटर तक की लंबाई वाले पुल को लघु सेतु की श्रेणी में रखा जाता है, जबकि इससे बड़े पुल सेतु निगम के अंतर्गत आते हैं। उन्होंने कहा कि बजट स्वीकृत होते ही निर्माण कार्य शुरू कराया जाएगा। फिलहाल बारिश के कारण रपटे पर पानी भरा हुआ है।
इस तरह की जमीनी सच्चाई सामने आती है तो कई सवाल उठे हैं जैसे जब समस्या हर साल सामने आती है और ग्रामीण वर्षों से इसकी मांग कर रहे हैं, तो स्थायी समाधान के लिए लोगों को इंतजार क्यों करना पड़ रहा है। इस बार विभाग ने 2026-27 की कार्ययोजना में लघु सेतु प्रस्तावित होने की बात कही है। लेकिन लोगों की मुश्किलें तभी खत्म होगी जब यह पुल बनकर तैयार हो जाएगा।
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