खबर लहरिया Blog छत्तीसगढ़: भूख, प्यास, अनशन और इंतजार, नियुक्ति के लिए डीएड शिक्षकों की लंबी लड़ाई

छत्तीसगढ़: भूख, प्यास, अनशन और इंतजार, नियुक्ति के लिए डीएड शिक्षकों की लंबी लड़ाई

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के नया रायपुर तूता क्षेत्र में नौकरी की मांग को लेकर डीएड अभ्यर्थी नियुक्ति की मांग को लेकर अभ्यर्थी पिछले 130 दिनों से अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं। 

सर मुंडवा कर विरोध प्रदर्शन (फोटो साभार: मुरली, डीएड अभ्यर्थी)

देश में शिक्षा का स्तर लगातार गिरता नज़र आ रहा है जिसका एक प्रमुख कारण शिक्षकों की भारी कमी है। उन्हीं शिक्षकों को अपने मेहनत से मिले पद को और अपने नौकरी को बचाने के लिए कई बार सड़कों पर संघर्ष करना पड़ रहा है। पिछले कुछ सालों में भारत के अलग-अलग राज्यों में शिक्षक अपनी मांगों को लेकर लगातार आंदोलन करते नज़र आ रहे हैं। लखनऊ, मध्यप्रदेश, झारखण्ड, बिहार जैसे राज्यों में शिक्षक महीनों से लगातार आंदोलन कर रहे हैं। इसके बावजूद सरकार न कोई फ़ैसला और न ही कोई पहल करते दिखाई दे रही है। शायद इसे ही बेरोज़गारी भी कहते हैं। वर्तमान में छत्तीसगढ़ के शिक्षक भी इसके चपेट में आ गए हैं। 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के नया रायपुर तूता क्षेत्र में नौकरी की मांग को लेकर डीएड अभ्यर्थियों का आंदोलन लगातार चल रहा रहा है। अपनी नियुक्ति की मांग को लेकर अभ्यर्थी पिछले 130 दिनों से अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं। छत्तीसगढ़ के लगभग 1316 डिग्री डीएड अभ्यर्थियों को सेवाओं को समाप्त कर उन्हें बेरोज़गार कर दिया गया है। अब छत्तीसगढ़ में डीएड अभ्यर्थियों का आंदोलन अब लंबा और गंभीर रूप ले चुका है। लगातार धरना और भीषण गर्मी के बीच उनकी सेहत पर इसका बुरा असर पड़ रहा है। कई अभ्यर्थी डिहाइड्रेशन, कमजोरी और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। कुछ की हालत इतनी खराब हो गई कि उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। आंदोलन कर रहे अभ्यर्थियों का कहना है कि यह सिर्फ नौकरी पाने की लड़ाई नहीं रह गई है अब यह न्याय, अधिकार और सम्मान की लड़ाई बन चुकी है। 

वर्तमान में चल रहे शिक्षकों के आंदोलन का कारण

डीएड अभ्यर्थियों का कहना है कि उनका आंदोलन लंबे समय से चली आ रही नियुक्ति प्रक्रिया में देरी और कथित गड़बड़ियों का नतीजा है। अभ्यर्थियों के मुताबिक इस मामले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने 2 अप्रैल 2024 और 26 सितंबर 2025 को स्पष्ट आदेश दिए थे। इसके बाद भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने भी 28 अगस्त 2024 को इस मामले में निर्देश जारी करते हुए कहा था कि 2621 बर्खास्त बीएड सहायक शिक्षकों की जगह 2621 डीएड अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी जाए। अभ्यर्थियों का कहना है कि अदालतों के स्पष्ट आदेश के बावजूद आज भी 1326 योग्य अभ्यर्थी नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं।

प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों ने शिक्षा विभाग पर भर्ती प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही बरतने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि 2621 पदों के लिए कॉमन मेरिट लिस्ट से स्कूल आवंटन तो कर दिया गया लेकिन उससे पहले दस्तावेजों का सही तरीके से सत्यापन नहीं किया गया। इसी वजह से केवल 1299 पात्र अभ्यर्थियों को ही नियुक्ति मिल सकी जबकि करीब 1326 योग्य डीएड अभ्यर्थी अब भी बाहर हैं। अभ्यर्थियों का आरोप है कि सूची में ऐसे लोगों के नाम भी शामिल हो गए जिनके पास डीएड या टीईटी प्रमाणपत्र नहीं था या जो तय आयु सीमा से बाहर थे। उनका कहना है कि इसी प्रशासनिक गलती की वजह से पात्र अभ्यर्थियों को अब तक नौकरी नहीं मिल सकी और यही मौजूदा आंदोलन की सबसे बड़ी वजह है।

प्रदर्शन में शामिल अभ्यर्थी रुखमनी यादव ने अपने बयान में कहा है कि उन्हें प्रशासन की ओर से झूठा आश्वासन दिया जा रहा है। उन्होंने ने कहा “जनवरी में डीपीआई के अधिकारी हमारे इस धरना स्थल पर आए थे और हमें कहा गया कि अनशन पर बैठे हो उसे रीफ़िल कर दो आपकी मांग पूरी हो रही है, तो सरकार इतना धीरे प्रक्रिया कैसे कर सकती है? हमको मरने के लिए इस दुता धरना स्थल पर छोड़ दिया जा रहा है। सरकार हमारी तकलीफ़ को देखें क्योंकि वो हमारी चुनी हुई सरकार है।” 

वहीं अभ्यर्थी मनोज कुमार अपने बयान में सवाल करते हुए कहते हैं कि “क्यों हमारे आवाज को दबाया जा रहा है? क्यों हमारे जायज़ मांग को अनदेखा किया जा रहा है? हम अपनी मांग के साथ प्रदर्शन कर रहे हैं उसमें भी सरकार को आपत्ति है, अगर इतना ही आपत्ति है सरकार को तो हमें नियुक्ति दे। क्या हमने भाजपा सरकार को इसी दिन के लिए चुना था ? मैं सरकार से यही कहना चाहता हुं कि सरकार हमें जल्द से जल्द नियुक्ति दे और अगर नहीं देंगे तो हम लोग नक्सली बनने के लिए तैयार है।” 

आंदोलन का शुरुआत और अलग अलग तरीके से किया प्रदर्शन 

डीएड अभ्यर्थियों का प्रदर्शन और आंदोलन 24 दिसंबर 2025 को शुरुआत किया गया जो से रायपुर के तूता धरना स्थल पर वर्तमान तक चल रहा है। इस प्रदर्शन में छत्तीसगढ़ के अलग -अलग राज्यों से अभ्यर्थी शामिल हैं। वर्तमान में धरना स्थल पर 100 अभ्यर्थी मौजूद हैं जिसमें से 35 पुरुष और 65 महिला मौजूद हैं। प्रदर्शनकारियों द्वारा कई अलग-अलग तरीके से अनोखा प्रदर्शन कर करते आ रहे हैं। 

नियुक्ति की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों ने सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए विरोध के कई शांतिपूर्ण, सांकेतिक और अनोखे तरीके अपनाए। शुरुआत अनिश्चितकालीन आमरण अनशन से हुई, जिसका मकसद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन सुनिश्चित कराना था। इसके बाद अभ्यर्थियों ने मौन धरना देकर अपनी चुप्पी के जरिए न्याय की पुकार उठाई और कैंडल मार्च निकालकर उम्मीद की लौ जलाए रखी। समाज को अपने संघर्ष से जोड़ने के लिए “एक कप चाय न्याय के नाम” जैसा अभियान चलाया गया। वहीं सड़क किनारे हाथ में कटोरा लेकर सांकेतिक भीख मांगकर उन्होंने बेरोजगारी और अपनी बेबसी को दिखाने की कोशिश की।

दंडवत प्रणाम कर विरोध प्रदर्शन (फोटो साभार: मुरली, डीएड अभ्यर्थी)

अपने संघर्ष को और मजबूती देने के लिए अभ्यर्थियों ने दंडवत प्रणाम यात्रा निकाली, घुटनों के बल चलकर अपनी पीड़ा और समर्पण को सामने रखा। धार्मिक और सांस्कृतिक माध्यमों का सहारा लेते हुए रामनवमी पर कलश यात्रा निकाली गई, 14 मंत्रियों के नाम से 108 दीप जलाए गए, हनुमान चालीसा का पाठ किया गया और नवकन्या पूजन के जरिए न्याय की अपील की गई। विरोध के कठोर रूप में जल सत्याग्रह और अंगारों पर चलकर भी उन्होंने अपना संकल्प दिखाया। इसके अलावा शिक्षा मंत्री के निवास पहुंचकर सीधा निवेदन किया गया मुख्यमंत्री को खून से पत्र लिखकर गुहार लगाई गई, सामूहिक मुंडन कराया गया और रैलियों के जरिए अपनी मांग को लगातार उठाया गया। लंबे समय तक चले इस संघर्ष के बाद भी जब समाधान नहीं निकला तो अभ्यर्थी आमरण अनशन पर बैठ गए जो अब उनके आंदोलन का सबसे गंभीर रूप बन चुका है।                    

भीख मांग कर प्रदर्शन (फोटो साभार: मुरली, डीएड अभ्यर्थी)

लगातार लंबे समय तक चले इस आंदोलन और आमरण अनशन का असर अब अभ्यर्थियों की सेहत पर साफ दिखाई देने लगा है। कई प्रदर्शनकारियों की तबीयत बिगड़ गई। किसी को हृदय संबंधी परेशानी हुई तो किसी के पेट में अल्सर जैसी गंभीर बीमारी सामने आई जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कर इलाज और ऑपरेशन तक करवाना पड़ा। 

बता दें शैलेन्द्र साहू जो आमरण अनशन में शामिल थे का पिछले कुछ दिनों से अस्पताल में अभी भी भर्ती हैं वहीं संजय कश्यप को हृदय संबंधी परेशानी होने के बाद इलाज के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा। इसके अलावा कई अन्य अभ्यर्थी भी शारीरिक कमजोरी, चक्कर आने और बेहोशी जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। गर्मी और लू ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि अगर जल्द कोई फैसला नहीं लिया गया तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

शैलेन्द्र साहू (फोटो साभार: मुरली, डीएड अभ्यर्थी)

आंदोलन के दौरान कार्यवाही 

डीएड अभ्यर्थियों का आरोप है कि उनके आंदोलन को दबाने के लिए प्रशासन द्वारा कई बार सख्त कदम भी उठाया गया। आंदोलन के दौरान तीन बार अभ्यर्थियों को जेल भेजा गया। पहली बार 125 अभ्यर्थियों को गिरफ्तार कर 4 दिन तक सेंट्रल जेल में रखा गया। दूसरी बार 6 अभ्यर्थियों पर मामला दर्ज किया गया 1 लाख रुपये का बॉन्ड भरवाया गया और एक महीने का प्रतिबंध लगाया गया। इसके बाद तीसरी बार 25 अभ्यर्थियों को गिरफ्तार कर 7 दिन तक सेंट्रल जेल में रखा गया। इन कार्रवाइयों के बावजूद अभ्यर्थियों का कहना है कि उनका हौसला नहीं टूटा और वे अब भी अपनी मांगों को लेकर डटे हुए हैं। 

प्रदर्शनकारी सुमन साहू बताती हैं कि आंदोलन के दौरान पुलिस के साथ उनकी झड़प हुई जिसके बाद उन्हें बिना कोई साफ जानकारी दिए थाने ले जाया गया। उनका कहना है कि इस बारे में उनके परिवार को भी कोई सूचना नहीं दी गई। थाने ले जाने के बाद उन्हें करीब चार दिन तक वहीं रखा गया और इस दौरान बाहर के किसी भी व्यक्ति से मिलने नहीं दिया गया। सुमन बताती हैं कि उसी समय कुछ महिलाओं को माहवारी भी शुरू हो गई थी लेकिन जरूरी सुविधा पाने के लिए भी काफी मिन्नत करनी पड़ी। वह कहती हैं कि समाज इन बातों को अलग नजर से देखता है। वे नम आंखो के साथ कहती हैं “हम अपने हक और रोजगार के लिए लड़ रहे हैं लेकिन समाज इसे गलत समझता है और हम पर उंगली उठाता है। आज छोटी-छोटी बच्चियां भी सुरक्षित नहीं हैं फिर भी मैं अपने अधिकार की लड़ाई लड़ने के लिए अपनी बेटी को दूसरे के भरोसे छोड़कर यहां आती हूं।”

जल समाधी विरोध प्रदर्शन (फोटो साभार: मुरली, डीएड अभ्यर्थी)

वहीं प्रदर्शनकारी संजय कश्यप का कहना है कि अभ्यर्थी लंबे समय से अपनी जायज मांगों को लेकर भूखे-प्यासे आंदोलन पर बैठे हैं लेकिन सरकार उनकी बात सुनने के बजाय सिर्फ घोषणाएं करती नजर आती है। उनका कहना है “हम यहां अपने हक के लिए बैठे हैं। हर प्रदर्शनकारी अपने घर की परेशानियां छोड़कर आया है। कोई आर्थिक तंगी से जूझ रहा है, कोई मानसिक दबाव में है तो कोई शारीरिक रूप से कमजोर हो चुका है। इसके बावजूद हम इसलिए डटे हुए हैं क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ नौकरी की नहीं, बल्कि अपने अधिकार की लड़ाई है।”

सरकार से क्या मांग है? 

आंदोलन कर रहे डीएड अभ्यर्थियों की मांग है कि बचे हुए 1316 सहायक शिक्षक पदों पर जल्द से जल्द नियुक्ति की जाए, ताकि लंबे समय से इंतजार कर रहे योग्य अभ्यर्थियों को उनका हक मिल सके। इसके साथ ही उनका कहना है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पूरी तरह पालन कराया जाए और कई दिनों से अनशन पर बैठे अभ्यर्थियों की बिगड़ती सेहत को देखते हुए सरकार जल्द फैसला ले। 

आंदोलन तेज करने की चेतावनी और सरकार पर लगाए गंभीर आरोप

डीएड अभ्यर्थियों ने साफ कहा है कि अगर उनकी मांगों पर जल्द कोई ठोस फैसला नहीं लिया गया तो वे अपने आंदोलन को और तेज करने के लिए मजबूर होंगे। उनका कहना है कि अब तक उन्होंने लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने की हर संभव कोशिश की है लेकिन अगर इसके बाद भी सरकार चुप रहती है तो आंदोलन का स्वरूप और बड़ा हो सकता है। अभ्यर्थियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर इस दौरान कोई गंभीर स्थिति बनती है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।

अभ्यर्थियों ने सरकार पर यह आरोप भी लगाया है कि आंदोलन को कमजोर करने और ध्यान भटकाने के लिए बार-बार नई भर्ती की घोषणाएं की गईं लेकिन इन घोषणाओं को जमीन पर उतारने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। उनका दावा है कि 115 दिनों के आंदोलन के दौरान 10 से ज्यादा बार नई भर्ती की बातें सामने आईं लेकिन अब तक किसी भर्ती का आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी नहीं हुआ। अभ्यर्थियों का कहना है कि मौजूदा सरकार बनने के बाद से नई भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं की गई है जबकि इस समय जो भर्तियां चल रही हैं वे भी साल 2023 में जारी पुराने नोटिफिकेशन के आधार पर आगे बढ़ रही हैं। ऐसे में आंदोलनकारियों का सवाल है कि जब घोषणाएं हो सकती हैं तो नियुक्तियां क्यों नहीं?       

भगत सिंह को याद कर प्रदर्शन (फोटो साभार: मुरली, डीएड अभ्यर्थी)                 

छत्तीसगढ़ में शिक्षकों की इस कदर कमी है कि राज्य के 7500 स्कूलों में से 300 स्कूल बिना शिक्षक के चल रहे हैं और 5500 स्कूलों में केवल एक शिक्षक हैं। प्रदेश में  लगभग 16000 पदें ख़ाली हैं उसके बावजूद शिक्षकों को अपने नौकरी के लिए सड़क पर जूझना पड़ रहा है। इन शिक्षकों की नौकरी सिर्फ़ उनकी दयनीय स्थिति या ज़िंदगी से ही नहीं जुड़ी है बल्कि भविष्य में आने वाले नए पढ़ियों और एक शिक्षित समाज से भी जुड़ा है। 

अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एक नई रिपोर्ट सामने आई है जिसका नाम ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026’ है। इस रिपोर्ट के मुताबिक 25 साल से कम उम्र के करीब 40 से 42 प्रतिशत ग्रेजुएट युवा बेरोजगार हैं। इतना ही नहीं कुल बेरोजगार युवाओं में लगभग 67 प्रतिशत ग्रेजुएट हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कुशल काम की कमी के कारण शुरुआती सैलरी भी घट रही है।

Report: पढ़े लिखे ग्रेजुएट युवा बेरोजगार, रिपोर्ट में सामने आई रोजगार संकट की सच्चाई 

सवाल सिर्फ छत्तीसगढ़ के डीएड अभ्यर्थियों का नहीं यह मुद्दा देशभर में बड़ी संख्या में बेरोजगार बैठे शिक्षकों से जुड़ा हुआ है। आखिर ऐसी क्या वजह है कि पढ़ाई पूरी करने और जरूरी योग्यता रखने के बावजूद हजारों शिक्षक नौकरी के इंतजार में बैठे हैं? इसके पीछे व्यवस्था की कमी, भर्ती प्रक्रिया में देरी और नीतियों में उलझन जैसे कई सवाल खड़े होते हैं। देश भर में भी यही देखने को मिल रहा है जहां शिक्षक और विद्यार्थी दोनों अपने मांगो को लेकर सड़क पर लड़ते और आंदोलन करते दिखते हैं। 

 

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