दुनिया का निर्माण करने वाला मजदूर है। शहरों में बनने वाली उंची-उंची इमारतें, सड़कें और बड़े-बड़े निर्माण कार्य जिन ईंटों से खड़े होते हैं उन ईंटों के पीछे लाखों मजदूर परिवारों की मेहनत, पसीना और कठिन ज़िंदगी छिपी होती है। हर साल रोजगार की तलाश में हज़ारों परिवार अपने गांव और घर छोड़कर दूसरे राज्यों के ईंट भट्टों तक पहुँचते हैं –
बेहतर कमाई की उम्मीद लेकर निकले ये परिवार अक्सर ऐसी परिस्थितियों में पहुंच जाते हैं जहां उन्हें लंबे समय तक कठिन श्रम, असुरक्षित माहौल और आर्थिक निर्भरता के बीच जीवन बिताना पड़ता है। अधिकांश मजदूर ओड़िशा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से आते हैं। इनमें बड़ी संख्या आदिवासी, दलित और गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की होती है।
ईंट भट्टों में दिनचर्या
मज़दूरों की दिनचर्या सुबह सूरज निकलने से पहले ही हो जाती है। रात दो बजे से तीन बजे के बीच जग जाते हैं। अंधेरी रात से लेकर तपती दोपहरी तक इनके हाथ लागतर मिट्टी को ईंट बदलता रहता है। दिन भर कड़ी मेहनत करने के बाद मुश्किल से छः सौ रुपए की मजदूरी मिल पाती है।
खबर लहरिया टीम ने यूपी में ईंट-भट्टों में काम करते मदूरों को काफ़ी करीब से देखा। ये कई बार देखा गया कि आखिर एक मजदूर को पेट भरने के लिए न जाने कितनी ही मुश्किलों से गुज़रना पड़ता है। अपने घरों से भट्टों की तरफ पलायन करने की तैयारी लोग एक हफ्ते पहले से ही शुरू कर देते हैं। आठ महीने के लिए गेहूं, आटा, दाल व कपड़े सब पैक कर वह लोग परिवार सहित मज़दूरी के लिए निकल जाते हैं। परिवार में जितने लोग होते हैं, उसके अनुसार लोग मिल-जुलकर कम से कम हज़ार से 15 हज़ार रूपये तक कमा लेते हैं। ईंट भट्ठों पर पहुंचने के बाद मजदूरों को तुरंत रहने की सुविधा नहीं मिलती। शुरुआत के करीब 10 से 15 दिन तक पूरा परिवार खुले आसमान के नीचे रहता है। इस दौरान वे उस जमीन को तैयार करते हैं, जहां ईंट बनाने का काम होना होता है। जमीन तैयार होने के बाद मजदूर लकड़ियों से झोपड़ी बनाते हैं, जिसे बाद में मालिक द्वारा दी गई टीन की चादरों से ढका जाता है। काम शुरू होने पर मजदूर हजारों ईंटें तैयार करते हैं और इन्हीं ईंटों के बीच बनी अस्थायी झोपड़ियों में परिवार सहित करीब आठ महीने तक रहते हैं। इसी दौरान उन्हें हर 15 दिन में खर्च के लिए कुछ पैसे दिए जाते हैं, जिनसे वे राशन और दूसरी जरूरी चीजें खरीदते हैं।
भट्ठों का सीजन खत्म होने पर मजदूरों का हिसाब किया जाता है। खर्च काटने के बाद जो रकम बचती है, उसे लेकर वे अपने गांव लौटते हैं। बरसात के चार महीनों में भट्ठे बंद रहते हैं और परिवार उसी कमाई के सहारे गुजारा करता है। बारिश खत्म होते ही रोजगार की तलाश उन्हें फिर से भट्ठों की ओर ले जाती है।
मजदूर कहते हैं “पेट देखें या बच्चों की पढ़ाई। अगर बच्चों की पढ़ाई के लिए गांव घर में रुकते हैं, तो यहां कोई धंधा भी तो नहीं है जिससे वह कमा-खा सके। इसी वजह से मजबूरी में वह निकल जाते हैं। चाहते तो हैं कि उनके बच्चे भी शिक्षित हों, आगे बढ़ें, वह भी एक अच्छी जिंदगी जीये, लेकिन कैसे जीयें जब कोई रोज़गार ही नहीं है। अगर उनके जिलों में कोई फैक्ट्री वगैरह हो जाए, रोज़गार मिलने लगे, हर दिन काम मिले तो उनको ज़रुरत ही ना पड़े। भले ही वहां दो पैसे कम मिले लेकिन वह अपने घर में रहे। अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई कराये और सुकून से कमाये-खाएं।”
ईंट भट्ठों में मजदूरों की भर्ती आमतौर पर ठेकेदारों के माध्यम से की जाती है। ठेकेदार गांवों में जाकर मजदूरों को अच्छी मजदूरी और अग्रिम रकम का भरोसा देते हैं जिसके बाद परिवार उनके साथ काम के लिए निकल पड़ते हैं। लेकिन भट्ठों तक पहुंचने के बाद उन्हें अक्सर कम मजदूरी, लंबे काम के घंटे और रहने के लिए अस्थायी झोपड़ियां मिलती हैं। एक बार काम शुरू होने के बाद मजदूरों को पूरे सीजन, यानी करीब आठ से नौ महीने तक उसी भट्ठे पर रहकर काम करना पड़ता है। यदि कोई मजदूर बीच में घर लौटना चाहता है तो कई बार उसकी मजदूरी काट ली जाती है या तय रकम का पूरा भुगतान नहीं किया जाता। यही वजह है कि रोजगार की उम्मीद से शुरू हुआ सफर धीरे-धीरे कर्ज और मजबूरी के चक्र में बदल जाता है।
बुंदेलखंड : ईंट-भट्टे में काम करने वाले मज़दूरों की मुश्किलें और परिस्थितियों की झलक
भट्टों पर महिलाएं रोक कर रखती हैं शौच
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ईंट उत्पादक देश है। हर साल 10 से 23 लाख लोग देशभर के लगभग 1.44 लाख ईंट भट्ठों में काम करने के लिए पलायन करते हैं। यह उद्योग करीब 21 लाख लोगों को रोजगार देता है। भट्ठे आमतौर पर सितंबर-अक्टूबर में शुरू होते हैं और मई तक चलते हैं। इस दौरान मजदूर अपने परिवारों के साथ वहीं रहते हैं। भीषण गर्मी, धूल, धुएं और जलते भट्ठों के बीच पुरुष, महिलाएं और कई बार बच्चे भी काम में लगे रहते हैं। जलने और चोट लगने की घटनाएं आम हैं, जबकि रहने की व्यवस्था अक्सर इतनी सीमित होती है कि परिवारों को बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिल पातीं।
इस ईंट भट्टे में सबसे ज़्यादा मुश्किलें झेलती हैं महिलाएं। काम की तलाश में निकल जाते हैं और जो महिला घर में घूँघट डाल के रहेती हो उसे खुले में शौच करने का नौबत लग जाता है। खबर लहरिया टीम द्वारा महिलाओं से बात करने पर सामने आता है कि कार्यस्थल में एक भी शौचालय नहीं है और इस कारण उन्हें खुले में शौच करना पड़ रहा है।छत्तीसगढ़ से गए एक मजदूर महिला बताती हैं कि उन्हें काम करते तीन महीने हो गए हैं महिलाओं को शौचालय के लिए सही जगह नहीं मिल पाती है। शौचालय के लिए सुबह के अंधेरे में इधर से उधर घूमना पड़ता है। “हम लोग दूसरे शहर से आए हैं इस कारण यहां का मालिक हमारा सुनता नहीं है। अगर कोई परेशानी बताओ तो कहते हैं काम करना है तो करो वरना वापस चले जाओ। अगर काम के बीच में एमरजेंसी आए और जाना पड़े तो काम छूट जाता है और फिर उसका हाज़िरी काट दिया जाता है। महिलाएं शौच रोक कर रखती हैं।सबसे ज़्यादा परेशानी महिलाओं को महवारी के समय होती है। मजबूरी में जो टिन का झोपड़ी देते हैं उसी में महवारी का कपड़ा बदलते हैं। हमें हमारी बेटियों के लिए डर लगता है उन्हें जब भी जरुरत पड़े कोई न कोई महिला उसके साथ शौच के लिए चला जाता है।” ये है महिलाओं की स्थिति और घर-घर शौचालय का चेहरा।
बता दें खबर लहरिया की रिपोर्ट के अनुसार, 28 वर्षीय महिला के साथ तब बलात्कार की घटना हुई, जब वह सुबह 5 बजे अकेले शौच के लिए गई थी।
बाँदा: शौच के लिए जा रही 28 वर्षीय महिला के साथ हुआ दुष्कर्म
बच्चों की पढ़ाई और भविष्य पर असर
पलायन का सबसे बड़ा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ता है। जब पूरा परिवार काम के लिए दूसरे राज्य चला जाता है तो बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है। कई बच्चे स्कूल से दूर होकर भट्ठों के आसपास ही बड़े होते हैं और धीरे-धीरे मजदूरी में शामिल होने लगते हैं। भट्ठों के आसपास रहने वाले बड़ी संख्या में बच्चों का भविष्य भी इसी काम से जुड़ जाता है। लगातार एक जगह से दूसरी जगह जाने के कारण ये परिवार सरकारी योजनाओं, स्वास्थ्य सेवाओं, राशन और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से भी अक्सर वंचित रह जाते हैं।
ईंट भट्ठों पर काम करने वाले मजदूरों के बच्चों की शिक्षा आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। पश्चिम बंगाल राज्य विश्वविद्यालय (डब्ल्यूबीएसयू) के 2025 के एक अध्ययन के अनुसार, ईंट भट्ठा मजदूरों के परिवारों के 56 प्रतिशत बच्चे नियमित रूप से स्कूल नहीं जा पाते हैं। अध्ययन में यह भी पाया गया कि अधिकांश बच्चों को घर पर पढ़ाई के लिए अनुकूल माहौल नहीं मिलता। खासकर लड़कियां शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों स्तरों पर अधिक चुनौतियों का सामना करती हैं। रिपोर्ट में मध्याह्न भोजन, छात्रवृत्ति और ऑनलाइन शिक्षा जैसी सरकारी योजनाओं की जानकारी और उनके प्रभावी क्रियान्वयन की कमी को भी बच्चों के शिक्षा से दूर होने का एक बड़ा कारण बताया गया है।
जमीनी रिपोर्टिंग भी इस स्थिति की पुष्टि करती है। रोजगार के लिए जब मजदूर अपने परिवार के साथ दूसरे राज्यों के ईंट भट्ठों पर जाते हैं तो उनके बच्चे भी साथ चले जाते हैं। कई जगहों पर पूरा परिवार ईंट बनाने के काम में लगा रहता है, जबकि बच्चों की पढ़ाई के लिए कोई व्यवस्था नहीं होती। छत्तीसगढ़ से प्रयागराज के एक ईंट भट्ठे में काम करने पहुंची ललिता बताती हैं, “यहां बच्चों की पढ़ाई की कोई सुविधा नहीं है। भट्ठे का काम कुछ महीनों तक चलता है और इसी कमाई से पूरे साल का खर्च चलता है। इसलिए बच्चों को भी साथ लाना पड़ता है। जब पूरा परिवार साथ रहता है तो काम भी ज्यादा हो पाता है और कुछ ज्यादा कमाई हो जाती है।”
काम के दौरान जाति, लैंगिकता और असमानता
ईंट भट्ठों पर बनने वाली ईंटों से लोगों के घर तो तैयार होते हैं लेकिन इन भट्ठों में काम करने वाली महिलाएं आज भी भेदभाव और असमानता का सामना करती हैं। पुरुषों के बराबर मेहनत करने के बावजूद उनकी मेहनत को अक्सर कम आंका जाता है और कई मामलों में उन्हें समान मजदूरी भी नहीं मिलती। भट्ठों पर काम के दौरान उन्हें मालिकों और मुनीमों के भेदभावपूर्ण व्यवहार का सामना करना पड़ता है जबकि घर लौटने के बाद बच्चों की देखभाल, खाना बनाना और अन्य घरेलू जिम्मेदारियां भी उन्हीं के हिस्से आती हैं। ऐसे में महिलाओं का काम दोहरी जिम्मेदारी में बंट जाता है लेकिन उनके श्रम, स्वास्थ्य और अधिकारों को उतना महत्व नहीं दिया जाता जितना दिया जाना चाहिए।
खबर लहरिया के रिपोर्ट द्वारा कानपुर जिले के दिगमपुर भट्ठे में काम करने वाली महिला बताती हैं, “जहां पुरुषों को काम करने के बाद 350 से 400 रूपये मिलते हैं, वहीं उन्हें सिर्फ 250 रूपये दिए जाते हैं। दूसरी महिला बताती हैं, “हमारा काम ज़्यादा होता है। अंदर घुसकर लीपापोती करनी होती है। इतने में घर तो नहीं चलता पर कम से कम साग-सब्ज़ी हो जाती है।” वहीं भट्ठा मज़दूर सुरेश आय को लेकर कहते हैं, “एक आदमी के बदले दो स्त्रियां काम करती हैं।” इस बात से साफ है कि बेशक महिला, पुरुषों के साथ सुबह 8 बजे से शाम के 6 बजे तक काम कर रही हैं लेकिन इसके बाद भी वह उनकी और समाज की विचारधारा में कम काम करती हैं। महिलाओं की मेहनत और काम के घंटों को भी हमेशा अनदेखा किया जाता है जो हमेशा पुरुषों द्वारा किये गए काम के घंटों से अमूमन ज़्यादा होता है।
ईंट-भट्ठे में जाति, लैंगिक असमानता व पहुँच के अवसर सत्ता के साथ मिलकर कैसे करते हैं काम?
ईंट भट्टों के मजदूर और जलवायु परिवर्तन
इसी बीच जलवायु परिवर्तन का असर ईंट भट्ठों में काम करने वाले मजदूरों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। पिछले कुछ वर्षों में मौसम के बदलते मिजाज ने उनके काम और कमाई दोनों को प्रभावित किया है। पहले मौसम अपेक्षाकृत तय रहता था। सर्दियों में मजदूर ईंटों को आकार देकर धूप में सुखाते थे और फिर उन्हें भट्ठों में पकाया जाता था। यह काम गर्मियों तक चलता था ताकि बारिश शुरू होने से पहले ईंटों का उत्पादन पूरा हो सके।
लेकिन अब बेमौसम बारिश की घटनाएं बढ़ गई हैं। कई बार तैयार की गई कच्ची ईंटें अचानक हुई बारिश में भीगकर खराब हो जाती हैं। इससे मजदूरों की कई दिनों की मेहनत बर्बाद हो जाती है और उस दिन की मजदूरी भी नहीं मिल पाती। मौसम की इस अनिश्चितता का सीधा असर ईंट भट्ठों में काम करने वाले परिवारों की आय और आजीविका पर पड़ रहा है। खबर लहरिया द्वारा आप यह रिपोर्ट देख सकते हैं –
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ईंट भट्टों में स्वास्थ्य सुविधा भी बहाल
तपती भट्टियों के बीच दिन-रात मेहनत करने वाले ये मजदूर उस सच्चाई के गवाह हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर ईंट भट्ठों पर कुछ भी उपलब्ध नहीं है -न प्राथमिक उपचार, न डॉक्टर और न ही दवाइयाँ। सरकार बड़े-बड़े मंचों से स्वास्थ्य सेवाओं की सफलता की कहानियां क्यों सुनाती है। हर साल स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए भारी-भरकम बजट पेश किया जाता है। गांव-गांव में आशा कार्यकर्ता टीकाकरण करती हैं और दावा किया जाता है कि अब कोई भी महिला घर पर प्रसव नहीं करेगी।
खबर लहरिया के रेपोर्टर गीता ने रिपोर्टिंग के दौरान स्वास्थ्य व्यवस्था का हाल बताया। ईंट भट्टों में सुविधाओं के अभाव में बुरा हाल है जहां जमीन पर प्रसव हुआ। पुखरायां के विजय ईंट भट्ठे पर मैं एक चूल्हे के पास बैठी बिहार की रहने वाली एक महिला से बातचीत कर रही थी। तभी अचानक उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसी समय झुग्गी के अंदर से एक महिला की दर्दभरी चीख सुनाई दी। वह घबराकर बोली, “मेरी बहू को बच्चा होने वाला है बाद में बात करूंगी।”तभी मुझे एहसास हुआ कि यहाँ गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी भी इन्हीं झुग्गी-झोपड़ियों के भीतर हो रही है -जहाँ न साफ फर्श है, न स्वच्छ पानी, न साफ-सफाई की कोई व्यवस्था और न ही किसी स्वास्थ्यकर्मी की मौजूदगी। चारों ओर मिट्टी और धुएँ से भरा माहौल और उसी झुग्गी के अंदर जमीन पर प्रसव पीड़ा से तड़पती एक महिला।
UP/ Kanpur News: ईंट-भट्ठों पर स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, मजूदरों और महिलाओं की बड़ी चुनौतियाँ
देश को आजाद हुए इतने सालों से अधिक समय बीत चुका है लेकिन बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर आज भी ऐसे हालात में काम कर रहे हैं जहां उनके पास बेहतर विकल्प बहुत कम हैं। कई मजदूर पेशगी या एडवांस के बदले तय संख्या में ईंटें बनाने के दबाव में काम करते हैं जिससे उनकी स्थिति कई बार बंधुआ मजदूरी जैसी हो जाती है। जहां न रहने की सुविधा न ही स्वास्थ्य की और शिक्षा की बात तो बहुत दूर की बात है। देश की निर्माण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाले ये मजदूर आज भी सम्मानजनक मजदूरी, सुरक्षित कार्यस्थल और अपने बच्चों के बेहतर भविष्य की उम्मीद में संघर्ष कर रहे हैं। उनकी मेहनत से शहर खड़े होते हैं लेकिन उनकी समस्याएं अक्सर नीतियों और योजनाओं की प्राथमिकता में जगह नहीं बना पातीं।
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