एक दिन का सम्मान या दिखावा? एक साधारण दलित परिवार में जन्मे बाबा साहब ने न सिर्फ भारत को संविधान दिया उन्होंने दलितों, आदिवासियों और समाज के वंचित तबकों को बराबरी का हक दिलाने के लिए पूरी जिंदगी संघर्ष किया। लेकिन उसी देश में उनकी मूर्तियां तोड़ी जाती हैं और दलितों पर अत्याचार की खबरें भी आती हैं।
14 अप्रैल को पूरा देश डॉ. भीमराव अंबेडकर को याद करता है। इस दिन जगह-जगह कार्यक्रम होते हैं उनकी मूर्तियों पर माल्यार्पण किया जाता है। भाषण दिए जाते हैं और उन्हें याद करते हुए उनके योगदान को सराहा जाता है। एक साधारण दलित परिवार में जन्मे बाबा साहब ने न सिर्फ भारत को संविधान दिया उन्होंने दलितों, आदिवासियों और समाज के वंचित तबकों को बराबरी का हक दिलाने के लिए पूरी जिंदगी संघर्ष किया। उनके विचार और नीतियां आज भी सामाजिक न्याय और समानता की सबसे बड़ी नींव मानी जाती हैं। लेकिन उसी देश में उनकी मूर्तियां तोड़ी जाती हैं और दलितों पर अत्याचार की खबरें भी आती हैं। सवाल सीधा है क्या हम अंबेडकर को याद कर रहे हैं, या सिर्फ एक दिन निभा रहे हैं? क्या आज भी उनके बनाए संविधान और उनके दिखाए रास्ते को सच में अपनाया जा रहा है या यह सब सिर्फ एक दिन तक सीमित होकर रह गया है?
क्योंकि एक तरफ सरकार की ओर से यह निर्देश दिए जाते हैं कि जहां-जहां बाबा साहब की मूर्तियां हैं वहां शेड लगाए जाएं उनकी देखरेख की जाए वहीं दूसरी तरफ समय-समय पर उन्हीं मूर्तियों को तोड़े जाने की खबरें भी सामने आती रही हैं। ऐसा लगता है कि कुछ लोग बाबा साहब की छवि को नुकसान पहुंचाकर ही खुद को संतुष्ट करते हैं। इतना ही नहीं बीते सालों में दलित समुदाय के खिलाफ हिंसा और भेदभाव के कई मामले भी सामने आए हैं।
ऐसे में सवाल और गहरा हो जाता है जब ज़मीनी स्तर पर बराबरी और सम्मान अब भी अधूरा है तो क्या सिर्फ जयंती मनाना ही बाबा साहब को सच्ची श्रद्धांजलि कहा जा सकता है? या फिर उनके विचारों और संविधान की भावना को आज फिर से समझने और लागू करने की जरूरत है?
दरअसल जयंती के मौके पर सरकार की तरफ से भी कई तैयारियों के दावे किए गए। बीते 6 अप्रैल 2026 को भारतीय जनता पार्टी के स्थापना दिवस के अवसर पर गोरखपुर में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ये एलान किया कि प्रदेश भर में जहां कहीं भी बाबा साहेब अंबेडकर की मूर्ति (1.38:00) है वहां शेड (छत्र) लगाया जाए और उनके मूर्ति के आसपास सुंदरीकरण किया जाए। 403 विधानसभा क्षेत्रों में 10 महापुरुषों के स्मारक का सुंदरीकरण होगा।
लेकिन इन दावों के बीच हकीकत कुछ और कहानी भी बयां करती है। बीते समय में कई जगहों पर बाबा साहब की मूर्तियों को तोड़े जाने या नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सामने आई हैं। खबर लहरिया द्वारा ऐसी कई ग्राउंड रिपोर्टिंग की गई जिसमें बाबा साहेब अंबेडकर की मूर्ति तोड़ी गई। मूर्ति तोड़ना सिर्फ पत्थर तोड़ना नहीं है बल्कि ये उस विचार पर चोट है जो बराबरी की बात करता है। अब इसे कुछ उदाहरण सहित देखते हैं –
बीते 7 मार्च 2026 को यूपी के जिला वाराणसी में चोलापुर थाना क्षेत्र की चंदापुर चौकी अंतर्गत उदयपुर गांव में अराजक तत्वों ने डॉ. भीमराव अंबेडकर की मूर्ति का चेहरा क्षतिग्रस्त कर दिया।
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9 फरवरी 2026 को जिला अम्बेडकर नगर के ब्लॉक रामनगर, कोतवाली आलापुर अंतर्गत मिर्जापुर और बिमावल रोड स्थित रामनगर क्षेत्र में भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा को लगातार दूसरे दिन अज्ञात लोगों द्वारा क्षतिग्रस्त किया गया। स्थानीय निवासी मीना देवी (बिलावलपुर) ने जानकारी दी कि पिछले 35 वर्षों से इस प्रतिमा को बार-बार नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
26 जनवरी 2024 को जिला अम्बेडकर नगर में बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर जी की मूर्ति को ध्वस्त कर दिया गया।
ये सभी अंबेडकर की मूर्ति तोड़े जाने की खबर केवल उत्तर प्रदेश की है जिसे खबर लहरिया ने कवर किया है। ये वही मामला है जो ज्यादा चर्चा में आया और रिपोर्ट हो सका। ऐसा नहीं है कि ऐसी घटनाएं सिर्फ यहीं तक सीमित हैं अन्य मीडिया रिपोर्ट्स में भी अलग-अलग जगहों से ऐसी खबरें सामने आती रही हैं। जैसे कि जागरण के खबर अनुसार 25 मार्च 2026 मेरठ में असामाजिक तत्वों ने अनावरण से पहले ही डॉ. भीमराव आंबेडकर की मूर्ति तोड़ दी। इसके विरोध में महिलाओं ने हंगामा किया और धरने पर बैठ गईं।
29 जनवरी, 2026 को उत्तर प्रदेश लखनऊ के अज्ञात व्यक्तियों द्वारा बीआर अंबेडकर की मूर्ति को कथित तौर पर क्षतिग्रस्त कर दिया गया था।
अब यह बात सिर्फ मूर्तियों तक ही सीमित नहीं है। ज़मीनी स्तर पर दलित समुदाय के खिलाफ हिंसा और भेदभाव के मामले भी लगातार सामने आते रहे हैं।
2 अक्टूबर 2025 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली में एक दलित युवक हरिओम की ड्रोन चोर के नाम पर बेल्ट-डंडे से पीट-पीटकर कर हत्या दी गई।
21 अक्टूबर 2025 को उत्तर प्रदेश के बांदा और लखनऊ से दलित छात्र के साथ मारपीट और बुजुर्ग से मंदिर परिसर में कथित तौर पर पेशाब चटवाने का मामला सामने आया। वहीं यूपी के बस्ती में भी युवक को पेड़ से बांधकर इसलिए पीटा क्योंकि वह तथाकथित उच्च जाति कहे जाने वाले द्वारा दी गई गाली की शिकायत को लेकर उनके घर पहुंचा।
23 जून 2025, उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के दानरपुर गांव में दो कथावाचक के साथ गांव वालों के द्वारा मारपीट की गई जिसका कारण था कि कथावाचक दलित थे।
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6 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में देश के मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई पर जूता फेंकने की कोशिश की घटना भी सामने आई थी।
अगर देश के इतने बड़े पद पर बैठे व्यक्ति के साथ इस तरह का व्यवहार हो सकता है तो आम दलित नागरिकों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
इन तमाम घटनाओं को एक साथ रखकर देखें तो एक बड़ा विरोधाभास साफ नजर आता है। एक तरफ बाबा साहब को याद करने के लिए बड़े-बड़े मंच सजते हैं, उनके नाम पर घोषणाएं होती हैं, योजनाएं बनाई जाती हैं। वहीं दूसरी तरफ उनके बताए गए बराबरी, सम्मान और न्याय के मूल्यों को जमीन पर लागू करने में अब भी कमी नजर आती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सिर्फ जयंती मनाना ही बाबा साहब को सच्ची श्रद्धांजलि है? या फिर जरूरत इस बात की है कि उनके विचारों को रोजमर्रा की जिंदगी में उतारा जाए। समाज में बराबरी की सोच लाई जाए, भेदभाव खत्म किया जाए और संविधान की असली भावना को समझा और लागू किया जाए।
संविधान क्या कहता है और बाबा साहब की सोच क्या थी?
ये याद रखना जरुरी है कि भारत का संविधान डॉ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में बनी ड्राफ्टिंग कमेटी ने तैयार किया था। यह संविधान 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 से पूरे देश में लागू हुआ।
बाबा साहब ने संविधान को इस सोच के साथ बनाया था कि देश का हर नागरिक चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, वर्ग या लिंग से हो उसे बराबरी का हक मिले। खासकर उन लोगों के लिए जो सदियों से भेदभाव और छुआछूत का शिकार रहे हैं जैसे दलित और आदिवासी समुदाय उनके अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए संविधान में कई खास प्रावधान किए गए।
संविधान में साफ तौर पर लिखा गया है कि –
- अनुच्छेद 14: सभी नागरिक कानून के सामने बराबर हैं।
- अनुच्छेद 15: धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा।
- अनुच्छेद 17: छुआछूत को पूरी तरह खत्म किया गया है और इसे अपराध माना गया है।
- अनुच्छेद 46: राज्य को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह दलितों और आदिवासियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों का खास ध्यान रखे।
यानी संविधान सिर्फ एक किताब नहीं है बल्कि यह एक ऐसा वादा है जो हर नागरिक को बराबरी, सम्मान और न्याय देने की बात करता है लेकिन अब सवाल यही उठता है कि क्या ये अधिकार सच में हर किसी तक पहुंच पा रहे हैं? जो लोग बाबा साहब की मूर्तियां बनवाकर उनके विचारों और संघर्ष को सम्मान देना चाहते हैं उन्हीं मूर्तियों को कई जगह तोड़ दिया जाता है या नुकसान पहुंचाया जाता है। इस तरह की घटनाएं सिर्फ एक प्रतिमा का नहीं है उनके विचारों और उस सम्मान का भी अपमान हैं जिसे लोग दिल से देना चाहते हैं।कागज पर बराबरी साफ लिखी है लेकिन जमीन पर अभी भी अधूरी दिखती है।
इसी के साथ एक और अहम सवाल खड़ा होता है एक तरफ मूर्तियां तोड़े जाने की खबरें लगातार सामने आती हैं और दूसरी तरफ उन्हीं मूर्तियों पर छत्र लगाने और सुंदरीकरण की योजनाएं बनाई जाती हैं। यही बात और भी सवाल खड़े करती है क्योंकि ये दावे उसी सरकार की तरफ से किए जा रहे हैं जिस राज्य से दलितों के साथ हिंसा और अंबेडकर की मूर्तियां तोड़े जाने की सबसे ज्यादा खबरें सामने आई हैं। ऐसे में क्या यह सिर्फ दिखावे तक सीमित है? या जमीन पर भी उतनी ही सख्ती से काम हो रहा है?
क्या यह विरोधाभास नहीं है? क्या मूर्ति तोड़ने वालों के खिलाफ कोई सख्त कानून, ठोस कार्रवाई या सजा सुनिश्चित की जा रही है? या फिर हर बार मामला कुछ दिन चर्चा में रहकर ठंडा पड़ जाता है?
यह भी सोचने वाली बात है कि क्या संविधान और बाबा साहब के विचारों को सिर्फ 14 अप्रैल तक ही सीमित कर देते हैं? क्या बाकी दिनों में भी उसी तरह बराबरी, सम्मान और न्याय का पालन होता है जैसा संविधान कहता है? और सवाल यहीं खत्म नहीं होते क्या दलितों के खिलाफ हो रही हिंसा पर उतनी ही गंभीरता से कार्रवाई होती है?
क्या प्रशासन हर घटना में बराबरी से खड़ा नजर आता है? क्या समाज में आज भी जाति के आधार पर भेदभाव खत्म हो पाया है? इन तमाम सवालों के बीच यही समझ आता है कि समस्या कानून या योजनाओं के साथ-साथ सोच और व्यवस्था दोनों की है।
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