देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग (हाथ से मेला ढोने या नालों का हाथों से सफाई करना) पर क़ानूनी प्रतिबंध होने के बावजूद सफाई कर्मचारियों की मौतें अभी भी लगातार जारी ही है। बीते कुछ दिनों में देश के कई राज्यों से सीवर में सफाई के दौरान मज़दूरों के मौत की खबरें आईं।
दरअसल मूकनायक के खबर अनुसार दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच (दासाम) ने द्वारा दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस मुद्दे को प्रमुख रूप से उठाया गया। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक डेटा बताया गया जिसमें मार्च से मई 2026 के बीच केवल तीन महीने में देशभर में कम से कम 36 सफाई कर्मचारियों की मौत हुई है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि ये घटनाएँ बिहार,छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र और तेलंगाना सहित कई राज्यों में सामने आई है। मृतकों में बड़ी संख्या वाल्मीकि समुदाय, अन्य वंचित वर्गों और प्रवासी मज़दूरों की थी। आरोप है कि नगर निकाय और सरकारी एजेंसियाँ जवाबदेही से बचने के लिए सफाई कर्मचारियों को अक्सर ठेके के माध्यम से काम पर रखती है।
इन घटनाओं में ‘रेस्क्यू-चेन फेटैलिटी’ का बेहद भयावह पैटर्न सामने आया है। कई मामलों में जब कोई कर्मचारी बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के जहरीली गैस से भरे सीवर या सेप्टिक टैंक में उतरता है और बेहोश हो जाता है तो उसे बचाने के लिए नीचे जाने वाले दूसरे कर्मचारी भी हादसे का शिकार हो जाते हैं। इससे साफ होता है कि सफाई कार्यों में सुरक्षा नियमों और जरुरी उपकरणों की भारी कमी अभी भी बनी हुई है।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी नियम लागू नहीं
दासम के मुताबिक सीवर और सेप्टिंक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली मौत आज भी नहीं रुक रहीं हैं। जबकि ऐसे गंभीर कामों को रोकने के लिए 2013 में क़ानून बनाया गया था। संगठन द्वारा आरोप लगाया गया है कि सुरक्षा नियमों को ठीक से लागू नहीं किया जा रहा है और ज़िम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्यवाही भी कमजोर है। इसी वजह से कई जगहों पर सफाई कर्मचारी अब भी जान जोखिम में डाल कर सीवर और सेप्टिक टैंकों में उतरने को मजबूर हैं।
संगठन के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय कई बार स्पष्ट कर चुका है कि बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के किसी भी व्यक्ति को सीवर या सेप्टिक टैंक में नहीं भेजा जाना चाहिए। साथ ही ऐसे हादसों में जान गवाने वाले प्रत्येक सफाई कर्मचारी के परिवार को तीस लाख रुपए मुआवजा देने का भी निर्देश दिया गया है।
संगठन ने संसद में केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए आँकड़ों का हवाला देते हुए कहा है कि वर्ष 2017 से 2026 की शुरुआत तक देश के 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान 622 सफाई कर्मचारियों की मौत हुई। वहीं केवल 2021 से 2025 के बीच ही ऐसे हादसों में 317 कर्मचारियों की मौत हुई है। संगठन के अनुसार अप्रैल 2026 तक नमस्ते योजना के तहत 89,248 सीवर और सेप्टिक टैंक कर्मचारियों की पहचान और प्रोफ़ाइलिंग की जा चुकी थी। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं हुआ। संगठन का दावा है कि सरकार ने खुद स्वीकार है कि प्रभावित परिवारों को अब तक निर्धारित मुआवजा नहीं मिल पाया है।
बीते महीने के कुछ घटनाएँ
हाल के महीनो में बिहार के वैशाली जिले में एक ही परिवार के चार लोगों की सेप्टिक टैंक में दम घुटने से मौत हो गई।
Bihar: सेप्टिक टैंक की जहरीले गैस से चार मज़दूर की मौत, एक ही परिवार के सदस्य
वहीं छत्तीसगढ़ के रायपुर में एक अस्पताल के तीन कर्मचारि इसी तरह के हादसे से उनकी मौत हो गई।
Chhattisgarh: सीवरेज टैंक की सफाई करने उतरे 3 मज़दूरों की दम घुटने से मौत
मार्च के ही महीने में मध्य प्रदेश के इंदौर में चोइथराम मंडी गेट के पास हुआ सफाई के दौरान ज़हरीली गैस के कारण तीन मजदूरों की मौत हो गई।
MP: सीवर टैंक में सफाई के लिए उतरे दो मजदूरों की जहरीली गैस से हुई मौत
ये घटनाएँ बताती हैं कि सफाई कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर अब भी गंभीर लापरवाही बरती जा रही है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं की प्रतिक्रिया
द मूकनायक के रिपोर्ट अनुसार सफाई कर्मचारियों के मौत पर चिंता जताते हुए म्युनिसिपल वर्कर्स लाल झंडा यूनियन (सीटू) के अध्यक्ष धर्मेंद्र भाटी ने कहा कि सरकार भले ही सफाई कार्यों के मशीनीकरण की बात करते हों लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अलग दिखाई देती है। उनके अनुसार पहले हर महीने सीवर और सेप्टिक टैंक के जुड़े हादसों में 10 से 13 लोगों की मौत होती थी लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 15 से 20 तक पहुंच गई है। उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली जल बोर्ड में स्थाई कर्मचारियों की संख्या लगातार कम हो रही है जबकि ठेका कर्मचारियों को न तो पर्याप्त वेतन मिलता है और न ही नियमित स्वास्थ्य जांच की सुविधा। ऐसे में कई कर्मचारी मामूली मज़दूरी के लिए अपनी जान जोखिम में डालने के लिए मजबूर हैं।
वहीं अखिल भारतीय निगम मजदूर अधिकार यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव पालिवाल ने इस मुद्दे को सामाजिक न्याय से जुड़ा गंभीर सवाल बताया। उनका कहना था कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी दलित समुदाय के लोगों को असुरक्षित और अमानवीय परिस्थितियों में काम करना पड़ रहा है। उन्होंने सरकार से मांग की कि मौजूदा क़ानून का सख़्ती से पालन कराया जाए और हादसों से प्रभावित परिवारों को जल्द सहायता और पुनर्वास उपलब्ध कराया जाए।
संगठन की मांग
सफाई कर्मचारियों की हो रही लगातार मौत को देखते हुए सामाजिक कार्यकर्ताओं ने केंद्र और राज्य सरकार से कई अहम मांगे रखी –
– सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई में पूरी तरह मशीनों का इस्तेमाल अनिवार्य किया जाए ताकि कर्मचारियों को ख़तरनाक परिस्थितियों में न उतरना पड़े।
– दुर्घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों के खिलाफ सख्त आपराधिक कार्यवाही की जाए।
– मृतक सफाई कर्मचारियों के परिवारों को उचित मुआवजा दिया जाए और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी उपलब्ध कराई जाए।
– मैनुअल स्कैवेंजिंग रोकने से जुड़े क़ानूनों और सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए।
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