ग्रामीण विकास केवल सड़कों, भवनों और बिजली तक सीमित नहीं है। किसी गांव की असली तरक्की का अंदाजा उसके पानी के स्रोतों, सार्वजनिक सुविधाओं और लोगों के इस्तेमाल में आने वाली चीजों की हालत से लगाया जाता है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गर्मी और जल संकट के दौर में तालाब केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन, पशुपालन, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र हैं। लेकिन यूपी के चित्रकूट के सुरौधा गांव में स्थित तालाबों का सुन्दरीकरण 15 साल से नहीं हुआ है।
रिपोर्ट – सुनीता, लेखन – सुचित्रा
सुरौधा गांव में कुल चार प्रमुख तालाब हैं – औगनी तालाब, पिनहा तालाब, देवा तालाब और भोरा तालाब। ग्रामीणों का कहना है कि इन चारों तालाबों में से किसी का भी अमृत सरोवर योजना के तहत सौंदर्यीकरण नहीं हुआ है। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अमृत सरोवर जैसी योजनाओं के माध्यम से तालाबों के संरक्षण और सौंदर्यीकरण पर विशेष जोर दिया जा रहा है, लेकिन इस गांव के लोग आज भी इस सुविधा की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
तालाब देखने में सुन्दर लेकिन बैठने से डर
सुरौधा गांव के औगनी तालाब और अन्य तालाबों में पानी भरा हुआ है जोकि देखने में बेहद खूबसूरत नज़र आता है लेकिन वहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। ग्रामीणों का कहना है कि तालाबों का सौंदर्यीकरण नहीं होने के कारण न तो सुरक्षित घाट हैं और न ही बैठने या पानी तक पहुंचने की व्यवस्था है। सीढ़ियां सही तरह से बनाई गई नहीं है और टूटी हुई हैं। जिनकी दरारों में सांप, बिच्छू और कई जहरीली जीव मौजूद रहने की सम्भावना रहती है जिसकी वजह से लोगों को वहां बैठने में डर लगा रहता है।
गांव की ऊषा बताती हैं कि तालाब पर जो घाट बना हुआ है वह कई वर्षों पुराना है और पूरी तरह जर्जर हो चुका है। सीढ़ियां टूट चुकी हैं, जिससे तालाब में उतरना मुश्किल हो गया है। गर्मी के दिनों में नहाने और कपड़े धोने के लिए ग्रामीणों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। उनका कहना है कि यदि नए घाट और सीढ़ियां बन जाएं तो महिलाओं और अन्य ग्रामीणों को बड़ी राहत मिलेगी।
जानवरों को लेकर भी बढ़ी परेशानी
गांव के जगमोहन कहते हैं कि तेज गर्मी के मौसम में पशुओं को पानी पिलाने और नहलाने में भारी कठिनाई होती है। तालाब के किनारों पर उचित ढलान और घाट न होने के कारण भैंसें और अन्य जानवर कीचड़ में फंस जाते हैं। कई बार उन्हें बाहर निकालना भी मुश्किल हो जाता है। गांव में पानी की समस्या भी बनी रहती है और कई बार दो-दो, तीन-तीन दिन तक जलापूर्ति नहीं होती। ऐसे में तालाब ही ग्रामीणों के लिए सहारा बनते हैं।
युवाओं के लिए भी नहीं कोई सुविधा
मोनू का कहना है कि यदि तालाब का अमृत सरोवर योजना के तहत सौंदर्यीकरण हो जाता तो गांव के युवाओं को भी एक बेहतर सार्वजनिक जगह मिल जाती। 45 डिग्री तापमान में यहां आने का मन करता है कि टहला जाए लेकिन बैठने की कोई व्यवस्था न होने पर लोग वापस लौट जाते हैं या तो मिट्टी पर बैठने को मजबूर हैं और नहाने के लिए सीधे तालाब में उतर जाते हैं।
रिंकू बताते हैं कि करीब दस वर्ष पहले बने घाट अब पूरी तरह टूट चुके हैं। 20 साल पहले इसी तालाब पर लोग आकर बैठते थे, लोग नहाते, कपड़े धोते और आपसी मेलजोल करते थे।
ग्रामीणों की अपेक्षा और मांग
राजा बताते हैं कि पिछले वर्ष 2025 में तालाब की खुदाई कराई गई और ऊपर इंटरलॉकिंग खड़ंजा भी बनवाया गया, जिससे कुछ सुधार जरूर हुआ है। लेकिन अभी भी बैठने, विश्राम करने और अन्य सुविधाओं की कमी बनी हुई है। उनका मानना है कि यदि तालाब के किनारे बैठने की व्यवस्था, पेड़ पौधे लगाए जाए और अन्य सुविधाएं विकसित की जाएं तो यह स्थान ग्रामीणों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है।
गांव के युवाओं का कहना है कि आसपास के कई गांवों में तालाबों का सौंदर्यीकरण हुआ है, जहां बैठने की व्यवस्था, व्यायाम उपकरण (जिम करने के लिए मशीनें) और सुंदर वातावरण विकसित किया गया है। वहां लोग समय बिताते हैं और सामाजिक गतिविधियां होती हैं, जबकि सुरौधा के तालाब अभी भी उपेक्षा का शिकार हैं।
1 साल पहले कराया था तालाब की खुदाई का काम – प्रधान
ग्राम प्रधान मैना देवी के प्रतिनिधि (उनके बेटे) हनुमान बताते हैं कि गांव में कुल चार तालाब हैं, लेकिन किसी भी तालाब को अमृत सरोवर योजना में शामिल नहीं किया गया। उन्होंने बताया कि विधायक निधि से औगनी तालाब की खुदाई और इंटरलॉकिंग खड़ंजा निर्माण के लिए लगभग दस लाख रुपये का बजट स्वीकृत कराया गया था, जिसके तहत कार्य भी कराया गया। उन्होंने दावा किया कि अमृत सरोवर योजना में शामिल कराने के लिए लगातार प्रयास किए गए, लेकिन प्रस्ताव स्वीकृत नहीं हो सका।
उनके अनुसार गांव की आबादी लगभग ढाई हजार है और औगनी तालाब करीब चार बीघा क्षेत्र में फैला हुआ है। वहीं गांव का पियनहा तालाब लगभग 16 बीघा क्षेत्रफल का है, लेकिन उसका भी चयन नहीं हो सका।
प्रशासन क्या कहता है?
ग्राम सचिव बृजेश मिश्रा का कहना है कि ग्राम पंचायत की बैठकों में प्रस्ताव कार्ययोजना में शामिल किए जाते हैं। बजट स्वीकृत होने के बाद ही किसी तालाब का चयन अमृत सरोवर या अन्य योजनाओं के लिए किया जाता है। उन्होंने बताया कि भविष्य की बैठकों में इस विषय पर चर्चा की जाएगी।
वहीं मऊ ब्लॉक के मनरेगा अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी भुआल सिंह ने बताया कि ब्लॉक की 56 ग्राम पंचायतों में से 44 गांवों के तालाबों का अमृत सरोवर योजना के तहत सौंदर्यीकरण कराया जा चुका है। तालाब के क्षेत्रफल के आधार पर बजट स्वीकृत किया जाता है। उन्होंने आश्वासन दिया कि जिन गांवों के तालाब अभी तक योजना से वंचित हैं, उन्हें आगामी चरणों में शामिल करने का प्रयास किया जाएगा।
सुरौधा गांव के तालाबों की स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि जब आसपास के कई गांवों में अमृत सरोवर योजना के तहत विकास कार्य हो चुके हैं, तब सुरौधा अब तक क्यों पीछे है? तालाबों की खुदाई और कुछ निर्माण कार्य होने के बावजूद ग्रामीणों को सुरक्षित घाट, बैठने की व्यवस्था और अन्य आवश्यक सुविधाएं नहीं मिल सकी हैं।


