खबर लहरिया Blog UP Chitrakoot: आवास का वादा हुआ झूठा, लोग आज भी कच्चे मकान में रहने को हैं मजबूर 

UP Chitrakoot: आवास का वादा हुआ झूठा, लोग आज भी कच्चे मकान में रहने को हैं मजबूर 

देवधा गांव में कई परिवार आज भी कच्चे और जर्जर मकान में रहने को मजबूर हैं। सुकुरी, आरती, ममता सीमादेवी और सूर्यकुमार जैसे ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने सरकारी आवास के लिए आवेदन किए लेकिन अब तक उन्हें पक्का घर नसीब नहीं हुआ है।

रिपोर्टिंग – सुनीता, लेखन – रचना 

houses made of raw and foil

कच्चे और पन्नी से बने घर (फोटो साभार: सुनीता)                                        

प्रधानमंत्री आवास योजना साल 2015 में शुरू की गई थी जिसका उद्देश्य था कि हर जरूरतमंद गरीब परिवार को पक्का मकान मिले। पहले यह लक्ष्य साल 2022 तक पूरा होना था। फिर इसे बढ़ा कर 2024 कर दिया गया। इस योजना में शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों को शामिल किया गया लेकिन जमीनी हकीकत आज भी कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। 

जिला चित्रकूट के रामनगर ब्लॉक के देवधा गांव में कई परिवार आज भी कच्चे और जर्जर मकान में रहने को मजबूर हैं। सुकुरी, आरती, ममता सीमादेवी और सूर्यकुमार जैसे ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने सरकारी आवास के लिए आवेदन किए लेकिन अब तक उन्हें पक्का घर नसीब नहीं हुआ है। उन्होंने बताया कि अभी के दौर में कच्चा घर बनाना भी आसान नहीं है। मिट्टी ढोने, दिवार खड़ी करने और छप्पर डालने में महीनो लग जाते हैं फिर भी बरसात में घर टपकने लगता है। कई परिवारों के लिए ये सिर्फ मकान की समस्या नहीं है ये उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी की लड़ाई बन चुकी है।      

मिट्टी के कच्चा घर में लोग रहने को मजबूर (फोटो साभार: सुनीता)                                

तीन पीढ़ियों से कच्चे मकानों में जीवन 

वहां रहने वाले से बातचित करने पर चमेलिया बताते हैं कि उनका परिवार पिछले तीन पीढ़ियों से कच्चे और जर्जर मकान में रहने को मजबूर हैं क्योंकि उन्हें अब तक उन्हें सरकारी आवास का लाभ नहीं मिल पाया है। गांव में चार कच्चे घरों में करीब 16 परिवार किसी तरह गुजर बसर कर रहे हैं। उनका कहना है कि रहने की जगह की भारी कमी के कारण रोज़मर्रा की ज़िंदगी और भी मुश्किल हो गई है। न ठीक से खाना बनाने की जगह है और न ही पैर लंबा कर सोने की। कोई रिश्तेदार आते हैं तो ठहरते नहीं है। परिवार के लोग खेती-किसानी और बटाई पर काम करके गुज़ारा करते हैं। जबकि बच्चे रोजगार के लिए बाहर प्रदेशों में मेहनत कर रहे हैं। चमेलिया का दर्द यह है कि जब उन्हें खूद अब तक आवास नहीं मिल पाया है तो उनके बच्चों को घर कैसे मिलेगा। उनकी आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि वे अपने खर्चे पर पक्का मकान बनवाने में भी असमर्थ हैं।                                               

टूटे हुए मकान (फोटो साभार: सुनीता)

ये भी देखें – प्रधानमंत्री आवास योजना में अब भी हैं कई लोग वंचित, जानिए पूरी खबर

कच्चे घर का खर्च और लगातार मरम्मत की मजबूरी 

सुकुरी का कहना है कि एक कच्चा कमरा ही बनाने में हज़ारों रुपए खर्च हो जाते हैं। मिट्टी, बल्ली, बांस और खपरैल ख़रीदने में बहुत पैसा लगता है। ऊपर से महीने भर लीपाई-पुताई अलग से करनी पड़ती है। हर हफ़्ते दीवारों पर गोबर और मिट्टी का लेप लगाना पड़ता है ताकि बारिश में घर गिर न जाए। अगर हमें समय पर कालोनी या आवास सरकार के तरफ से मिल जाती तो कच्चा घर बनाने उसे बार-बार सुधारने में इतनी मेहनत नहीं नहीं करनी पड़ती। वे कहती हैं “कई बार अधिकारी और कर्मचारी हमारी घरों की फोटो खिंच कर ले गए लेकिन आज तक कुछ भी नहीं हुआ। आवेदन कराने के नाम पर ऑनलाइन फ़ॉर्म, किराया और आने जाने में हमने हज़ारों रुपए खर्च कर दिए मगर इसका कोई नतीजा नहीं निकला। अब हम मानसिक रूप से ये मां चुके हैं कि हमें सरकारी आवास शायद कभी नहीं मिलेगा।”                                   

कच्चे मकान बनाने की प्रक्रिया अधूरी टूटे हुए मकान (फोटो साभार: सुनीता)

आरती‌ के पति दिनेश‌ का कहना है कि दसों बार आनलाइन प्रक्रिया करवा‌ चुके हैं सिर्फ पैसा ही खर्च होता है।” हमारी शादी को बीस साल हो गया है और इन बीस सालों में इसी कच्चे घर में पांच‌ परिवार रहती हैं। जब‌ जेठ‌ बैसाख‌ में आधी‌ तूफान‌ आता है घर के ऊपर छाए हुए पूरा टीन और पन्नी उड़ जाता है। हम लोग टीन के नीचे सोये रहते हैं तो खतरा भी रहता है कहीं टीन उपर न गिर जाये हम लोग घायल हो जाये या दूसरे के घर उड़ जाए तो उनको नुक़सान पहुँचेगा।” वे कहते हैं यदि आवास मिली होती तो टीन सीन क्यों छाय‌? उसकी जरुरत ही नहीं पड़ती। 

ये भी देखें – आवास योजना की आस में बेघर परिवार, बारिश में गिरा कच्चा घर

गरीबी, बंदरो का आतंक और डर के साये में जीवन 

ममता कहती हैं कि वे इतने गरीब हैं कि रोज़ का खाना जुटाना मुश्किल होता है, ऐसे में पक्का घर बनाना उनके बस की बात नहीं। गांव में बंदरों का आतंक भी बड़ी समस्या है। खपरैल की छतें बंदर तोड़ देते हैं जिससे बरसात में पूरा घर पानी से भर जाता है। इस समय एक खपरैल का कीमत पांच रूपये हो गया है। हर साल घर के छत पर खपरैल डलवाना पड़ता है। तब भी पूरा घर चूता है पूरा घर गिला पानी से भर जाता है खाने बनाने सोने‌ के लिए जगह नहीं रहता। वे कहती हैं “कलोनी हमारे सास को नहीं मिला सास खतम‌ भी हो गयी अब हमें भी कलोनी नहीं मिला।”  

सीमा देवी बताती हैं कि झोपड़ी में ही खाना बनता है वहीं अनाज रखा जाता है और वहीं बच्चे रहते हैं। लकड़ी और कंडे रखने से भी खतरा बना रहता है कि कहीं आग न लग जाए या कोई घायल न हो जाए। तीन साल पहले गांव में एक कच्चा मकान गिरने से बच्चे दब गए थे जिसकी याद आज भी लोगों को डराती है। वे बताते हैं बारिश के मौसम में ज़रा सा पानी गिरने पर घर भर जाता है खाने पीने का सामान सब कुछ खराब हो जाता है।                                       

आवास के लिए आवेदन और निरासा 

ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार ऑनलाइन आवेदन कराए, प्रधान और सचिव को कागज भी दिए, फोटो भी खिंचवाई लेकिन सिर्फ आश्वासन ही मिला। सूर्यकुमार का कहना है कि पांच साल से यही सुन रहे हैं कि “जब आएगा तब मिलेगा।” अब लोग थक चुके हैं और उन्हें लगता है कि सरकार के नारे कागजों तक ही सीमित रह गए हैं। कुछ लोगों का तो यहां तक कहना है कि जब लाभ ही नहीं मिला तो वोट देने का क्या मतलब।                                     

एक ही मकान में पांच परिवार (फोटो साभार: सुनीता)

ग्राम प्रधान और बीडीओ ने इस पर क्या कहा 

ग्राम प्रधान मीना देवी का कहना है कि गांव की आबादी बढ़ चुकी है और अब भी करीब 300 परिवार आवास से वंचित हैं। सभी का सर्वे और जियो-टैगिंग कराई जा चुकी है। उनका कहना है कि हमारे गांव की आबादी वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 4,000 थी जबकि वर्तमान में यह बढ़कर करीब 6,000 हो चुकी है। अब तक प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 35 परिवारों को आवास दिया गया है। इसके अलावा दिव्यांग, विधवा और वृद्ध लाभार्थियों को मिलाकर करीब 60 आवास और दिए गए हैं। इसके बावजूद लगभग 300 परिवार अभी भी आवास से वंचित हैं। इन सभी परिवारों की जियो-टैगिंग कर दी गई है और उनका सर्वे पूरा हो चुका है। प्रशासन का कहना है कि जैसे ही नई सूची या स्वीकृति आएगी पात्र परिवारों को चरणबद्ध तरीके से आवास उपलब्ध करा दिया जाएगा।” 

ये भी देखें – “मुख्‍यमंत्री लाड़ली बहना आवास योजना’’ के लाभ से वंचित महिलाएं 

वहीं रामनगर के बीडीओ राजेश तिवारी ने बताया कि उनके ब्लॉक के अंतर्गत कुल 38 ग्राम पंचायतें आती हैं। सभी ग्राम पंचायतों में घर-घर जाकर सर्वे कराया गया है और सचिवों द्वारा लाभार्थियों का फोटो सत्यापन भी पूरा कर लिया गया है। उन्होंने कहा कि जैसे ही नई स्वीकृति मिलेगी पात्र परिवारों को चरणबद्ध तरीके से आवास दिए जाएंगे।

उन्होंने यह भी बताया कि इस ग्राम पंचायत में पहले ही काफी संख्या में आवास दिए जा चुके हैं और जो परिवार छूट गए हैं उन्हें भी योजना के तहत शामिल किया जाएगा। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पिछले पांच वर्षों में 5,127 आवास स्वीकृत हुए हैं जिनमें से 5,078 बनकर तैयार हो चुके हैं, जबकि कुछ अभी अधूरे हैं। वहीं मुख्यमंत्री आवास योजना के अंतर्गत 1,331 आवास स्वीकृत किए गए थे जिनमें से 1,044 आवास पूरे हो चुके हैं।

लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि देवधा गांव के कई परिवार आज भी मिट्टी की दीवारों और टपकती छतों के नीचे जिंदगी काट रहे हैं। उनके लिए पक्का घर सिर्फ एक योजना नहीं सुरक्षा, सम्मान और भविष्य की उम्मीद है।

 

यदि आप हमको सपोर्ट करना चाहते हैतो हमारी ग्रामीण नारीवादी स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थन करें और हमारे प्रोडक्ट KL हटके का सब्सक्रिप्शन लें’

If you want to support  our rural fearless feminist Journalism, subscribe to our  premium product KL Hatke  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *