मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के गढ़ा और कौड़ा गांव कभी बेहद पिछड़े इलाकों में गिने जाते थे। धीरेन्द्र शास्त्री (बागेश्वर बाबा) का जन्म छतरपुर जिले के गढ़ा गांव में हुआ था। इन गांवों को शायद ही जिले से बाहर कोई जानता था। लेकिन आज यही गांव बागेश्वर धाम सरकार और पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के कारण न केवल देश, बल्कि विदेशों तक अपनी पहचान बना चुका है। हाल ही में कौड़ा गांव में गोलीकांड के चलते भी ये क्षेत्र सुर्ख़ियों में रहा।
रिपोर्ट – गीता, अलीमा लेखन – सुचित्रा
पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री, जिन्हें बागेश्वर धाम सरकार या महाराज के नाम से भी जाना जाता है, मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित बागेश्वर धाम के प्रमुख स्थल है। वे यहां नियमित रूप से धार्मिक कथा और प्रवचन करते हैं। उनकी कथाएं सुनने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु बागेश्वर धाम पहुंचते हैं। बागेश्वर धाम में हर साल लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। रोजाना भी यहां सैकड़ों वाहन, हजारों श्रद्धालु और लाखों रुपये का धार्मिक कारोबार देखने को मिलता है। इससे इलाके की तस्वीर काफी बदली है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिला है।
बागेश्वर धाम की चमक कुछ ही हिस्से में
खबर लहरिया की टीम ने मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के राजनगर ब्लॉक के बहुचर्चित गढ़ा गांव में दो दिन तक ग्राउंड रिपोर्टिंग की। इस दौरान टीम ने गांव की चमकती तस्वीर और जमीनी हकीकत, दोनों की पड़ताल की। इस कवरेज में गांव की दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आईं। एक ओर बागेश्वर धाम के आसपास का इलाका विकास और चहल-पहल से भरा नजर आया, तो दूसरी ओर गांव के अंदरूनी हिस्सों और पास के कोड़ा गांव में आज भी कीचड़, जलभराव और बुनियादी सुविधाओं की कमी साफ दिखाई दी।
गढ़ा गांव के चमकते विकास की पहली तस्वीर
पहली तस्वीर गढ़ा गांव के उस इलाके की है, जहां बागेश्वर धाम, मंदिर और पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के कारण सबसे अधिक चहल-पहल रहती है। इस क्षेत्र में बड़े-बड़े होटल, धर्मशालाएं, रेस्टोरेंट, प्रसाद की दुकानें और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान तेजी से विकसित हुए हैं। इसके चलते यहां की जमीनों की कीमतों में भी काफी बढ़ोतरी हुई है।
हालांकि, रोजगार और व्यापार के सबसे अधिक अवसर स्थानीय लोगों की तुलना में बाहरी लोगों को मिले हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और नेपाल सहित कई राज्यों और देशों से आए लोगों ने यहां होटल, दुकानें और अन्य व्यवसाय शुरू किए हैं, जिससे उनका व्यापार तेजी से बढ़ा है। आज यह इलाका एक प्रमुख धार्मिक नगरी के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुका है।
गढ़ा गांव के अंदर की सच्ची तस्वीर
जब हमने गढ़ा गांव की कुछ गलियों का दौरा किया, तो वहां की तस्वीर धार्मिक नगरी की चमक-दमक से काफी अलग नजर आई। कई जगह सड़कों पर पानी भरा हुआ था। कहीं नालियां कच्ची थीं, कहीं पक्की, जबकि कई स्थानों पर नालियां बनी ही नहीं थीं। जहां नालियां थीं भी, उनमें कई जगह गंदगी भरी हुई थी। गांव के कई परिवार आज भी कच्चे घरों में रहने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों से बातचीत के दौरान यह भी महसूस हुआ कि वे अपनी समस्याओं को खुलकर बताने या उनके समाधान के लिए आवाज उठाने को जरूरी नहीं समझते। गांव के अंदर आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव साफ दिखाई देता है। सबसे खराब स्थिति सड़कों की नजर आई, जिन पर बरसात के मौसम में पानी भर जाने से लोगों को आने-जाने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
आस्था के नाम पर लाखों की कमाई से हुआ इनका वर्चस्व
गढ़ा गांव के रहने वाले (70) साल के एक बुजुर्ग बताते हैं कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री दो भाई और एक बहन है। एक समय था जब उनके घर में खाने के लिए नहीं होता था, गांव से मांग कर खाते थे। पिता दारू पीते थे और छोटा सा एक कमरे का घर था, लेकिन अब आस्था कि कमाई से इन्हीं का वर्चस्व और विकास दिखाई देता है।
रिपोर्टिंग के दौरान हमने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की जन्मभूमि वाला वह पुराना घर भी देखा, जहां उनका बचपन बीता। इस घर में एक छोटा-सा कमरा, पीछे एक आंगन और सामने टीन की छत वाला बरामदा है। फिलहाल इस पुराने घर में कोई नहीं रहता।
अब श्रद्धालु धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की जन्मभूमि के रूप में प्रसिद्ध घर के भी दर्शन करते हैं, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। वहीं आज सड़क किनारे उनका नया और भव्य मकान बना हुआ है। वहीं उनकी मां रहती हैं। दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु उनकी मां के भी दर्शन करने पहुंचते हैं। वे घर के गेट के अंदर से खिड़की पर खड़े होकर श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देती हैं।
पहले समय में धीरेन्द्र शास्त्री की आर्थिक स्थिति
गढ़ा गांव के लोग बताते हैं कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की आर्थिक स्थिति पहले बहुत खराब थी उनके पास जो आज शान और शौरत है वो पहले नहीं थी। आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं और उन्होंने बड़ी सफलता हासिल की है।
ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि जो व्यक्ति कभी गरीबी से निकलकर इस मुकाम तक पहुंचा, क्या उसे अपने गांव के लोगों की समस्याओं और गांव के विकास के बारे में भी सोचना चाहिए या फिर उसका ध्यान केवल अपने व्यक्तिगत विकास तक ही सीमित रहना चाहिए?
दहशत में जिंदगी गुजारते गांववासी
खबर लहरिया की टीम ने गांव के कई लोगों से अलग-अलग बैठकर बातचीत की। हालांकि, अधिकांश लोगों ने कैमरे पर अपनी बात रखने से इनकार कर दिया। ऑफ कैमरा बातचीत में कुछ लोगों ने दावा किया कि वे केवल इसलिए गांव में रह रहे हैं क्योंकि उनके पास कहीं और जाने का विकल्प नहीं है।
ग्रामीणों का आरोप है कि यदि कोई व्यक्ति धीरेंद्र शास्त्री या उनके चहीते लोगों के खिलाफ आवाज उठाता है या विरोध करता है, तो उसे प्रताड़ित किया जाता है। कुछ लोगों ने यह भी दावा किया कि उनके साथ मारपीट, गाली-गलौज और घर में घुसकर धमकाने जैसी घटनाएं होती हैं। वहीं कुछ लोगों ने अपनी जमीनों पर उनके द्वारा कब्जाने का आरोप लगाए।
गांव वालों का कहना है कि उन्हें विकास से ज्यादा अपनी सुरक्षा और जीवन की चिंता है। उनका यह भी दावा है कि भले ही गांव के विकास की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत और सरपंच की होती है, लेकिन गांव में प्रभाव और निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति धीरेन्द्र शास्त्री और उनके परिवार के पास मानी जाती है।
मुख्य सड़क किनारे बने घर के बाहर बैठी एक महिला ने ऑफ कैमरा बातचीत में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि धाम में बड़े-बड़े नेता, मंत्री और अधिकारी आते हैं, लेकिन शायद ही कोई गांव की गलियों में जाकर वहां की वास्तविक स्थिति देखने की कोशिश करता है। गांव के लोग किसी तरह अपना जीवन जी रहे हैं लेकिन खुलकर अपनी बात रखने का अधिकार उन्हें महसूस नहीं होता। उनके अनुसार, गांव में वही बातें सामने आ पाती हैं, जिनकी अनुमति होती है। उनका दावा है कि चाहे व्यक्तिगत समस्याएं हों या गांव के विकास से जुड़े मुद्दे, लोग खुलकर अपनी राय रखने से डरते हैं।
गोलीकांड के बाद से डर का माहौल
गढ़ा गांव में एक घटना सामने आई जिसमें इसी साल जुलाई 2026 बाबा बागेश्वर धाम में जमीन को लेकर उनके भाई का विवाद हो गया था। यहाँ की एक महिला ने बताया कि उस समय उनके भाई और पिता घर पर नहीं थे। इसी दौरान उन्होंने दावा किया कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के भाई शालिग्राम करीब 50 लोगों के साथ उनके घर पहुंचे, जहां गाली-गलौज, मारपीट और घर की महिलाओं के साथ भी अभद्र व्यवहार किया गया। महिला का कहना है कि इस घटना के बावजूद उन्हें न्याय नहीं मिला। इस घटना को भी खबर लहरिया की टीम ने घटनास्थल पर जाकर रिपोर्टिंग की थी। आप नीचे दिए गए लिंक में इसे देख सकते हो।
धीरेन्द्र शास्त्री के नाम से मिली गांव को नई पहचान
गांव में एक चबूतरे के पास पेड़ की छांव में बैठे 62 वर्षीय एक बुजुर्ग ने बताया कि पहले उनका गांव इतना पिछड़ा और अनजान था कि जिले के बाहर बहुत कम लोग उसका नाम जानते थे।
उन्होंने कहा, “जब हम कहीं बाहर जाते थे और लोग पूछते थे कि आप कहां से आए हैं, तो हम अपने गांव का नाम बताने के बजाय खजुराहो का नाम लेते थे। ऐसा इसलिए क्योंकि खजुराहो एक विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है और देश-दुनिया के लोग उसे जानते हैं। हम कहते थे कि हम मध्य प्रदेश के खजुराहो से आए हैं, ताकि सामने वाले को हमारी जगह का अंदाजा हो सके।”
बुजुर्ग के अनुसार, आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। उनका कहना है कि बागेश्वर धाम की वजह से गढ़ा गांव को देशभर में नई पहचान मिली है। अब लोग गांव का नाम सुनते ही उसे पहचान लेते हैं और कई मामलों में इसकी चर्चा खजुराहो जितनी ही होने लगी है।
बागेश्वर धाम होने से जमीन के दाम बढ़े
करीब 45 वर्षीय एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि बागेश्वर धाम के विकास का सबसे बड़ा असर आसपास की जमीनों की कीमतों पर पड़ा है। उनके अनुसार, धाम के विस्तार और बढ़ती प्रसिद्धि के कारण इलाके की कृषि और व्यावसायिक जमीनों के दाम कई गुना बढ़ गए हैं।
उन्होंने दावा किया कि बागेश्वर धाम के आसपास मुख्य सड़क से लगी जमीन की कीमत लगभग 4,000 रुपये प्रति वर्ग फुट तक पहुंच चुकी है। वहीं, मुख्य सड़क से थोड़ी अंदर की ओर स्थित जमीनों के दाम करीब 3,000, 2,500 और 2,000 रुपये प्रति वर्ग फुट तक बताए जाते हैं। उनका कहना है कि इस इलाके में अब इससे कम कीमत पर जमीन मिलना बेहद मुश्किल है। स्थानीय लोगों के अनुसार, जमीनों की बढ़ती कीमतों से यहां के कई किसानों और भू-स्वामियों की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया है।
जिम्मेदार सरपंच भी हकीकत में झाड़ रहे पल्ला
गढ़ा गांव के सरपंच ने खबर लहरिया से बातचीत करने से इनकार कर दिया। उन्होंने इतना ही कहा, “चार साल मीडिया से बात नहीं की, तो अब क्या बताना। एक साल का कार्यकाल बचा है, वह भी निकल जाएगा।”
उन्होंने कहा कि गांव और बागेश्वर धाम के आसपास की स्थिति देखकर ही विकास का अंदाजा लगाया जा सकता है। सरपंच के अनुसार, उनकी ग्राम पंचायत में करीब दो हजार मतदाता हैं, जिनमें लगभग 400 आदिवासी मतदाता शामिल हैं।
सरपंच का दावा है कि पिछले चार वर्षों में पंचायत को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक भी आवास स्वीकृत नहीं हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि गांव की कई गलियां आज भी पहले जैसी ही बनी हुई हैं।
उन्होंने बताया कि अपने कार्यकाल के शुरुआती लगभग एक वर्ष तक जब भी कोई मंत्री, जनप्रतिनिधि या अधिकारी क्षेत्र के दौरे पर आता था, तो ब्लॉक स्तर से उन्हें निर्देश दिया जाता था कि वे उन्हें बागेश्वर धाम लेकर जाएं। वे अधिकारियों और नेताओं को धाम के दर्शन कराते थे। उनके अनुसार, बागेश्वर धाम पहले प्राचीन शिव मंदिर के रूप में जाना जाता था और वहां का मंदिर काफी पुराना है।
सरपंच का कहना है कि लौटते समय वे अधिकारियों के सामने गांव के विकास के मुद्दे उठाते थे। अधिकारियों की ओर से उन्हें विकास कार्यों के प्रस्ताव (प्रपोजल) भेजने के लिए कहा जाता था। उन्होंने बताया कि उन्होंने कई प्रस्ताव तैयार कर भेजे, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। लगातार निराशा मिलने के बाद उन्होंने अधिकारियों के पीछे जाना, प्रस्ताव बनाना और विकास कार्यों के लिए लगातार प्रयास करना बंद कर दिया।
गढ़ा गांव से सटे कौड़ा गांव की स्थिति भी कुछ ऐसी ही
बागेश्वर धाम से महज तीन किलोमीटर दूर स्थित कौड़ा गांव, जहां धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की गौशाला भी है, आज भी कई बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करता दिखाई देता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, गांव में सड़क, नाली और स्वच्छ पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी बनी हुई है।
कौड़ा गांव में बच्चों के लिए स्कूल जाना भी मुश्किल
कौड़ा गांव भी राजनगर ब्लॉक के अंतर्गत आता है। यहां मोटरसाइकिल पर बैठे करीब 18 वर्षीय युवक ने बताया कि गांव की यह सड़क साल भर पानी से भरी रहती है। उनका कहना है कि अभी बारिश का मौसम ज्यादा तेज नहीं है, फिर भी रास्ते पर इतना पानी जमा है। बरसात के दिनों में यही रास्ता तालाब जैसा बन जाता है। इसी जलभराव वाले रास्ते से ग्रामीणों को आने-जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। सबसे ज्यादा परेशानी स्कूली बच्चों को होती है। पानी से गुजरने के कारण बच्चों की ड्रेस खराब हो जाती है और कई बार बच्चे स्कूल जाने से भी बचते हैं। कुछ बच्चे मजबूरी में लंबा रास्ता तय करके स्कूल पहुंचते हैं, जबकि छोटे बच्चों और बुजुर्गों के गिरने का खतरा बना रहता है।
गांव वालों का कहना है कि लंबे समय से इस समस्या का सामना करने के बावजूद उनकी परेशानी सुनने वाला कोई नहीं है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि डर और दबाव के कारण कई ग्रामीण अपनी समस्याएं खुलकर सामने रखने से हिचकते हैं।
बीमारी का भी रहता है डर
एक महिला ने कहा उनके घर सहित इस दलदल भरे रास्ते में लगभग 30 घर हैं। जलभराव और गंदगी के कारण दरवाजे पर बैठ नहीं सकती हैं। घर के अंदर तक बदबू जाती है, मच्छर इतने लगते हैं कि रात में लाइट ना रहे तो सो नहीं सकते हैं लेकिन क्या करें? किसे अपना दुःख सुनाए जो भी नेता मंत्री आते हैं सिर्फ भरोसा देते हैं और चले जाते हैं पलट कर कोई नहीं देखता।
दलित बस्ती की वजह से भी विकास नहीं – आरोप
गौशाला की ओर जाने वाली सड़क पर खड़े एक बुजुर्ग बताते हैं कि यह पूरी तरह दलित बस्ती है। उनके गांव में पानी का मुख्य साधन केवल कुएं हैं। आसपास के अधिकांश गांवों में पाइप लाइन बिछ चुकी है लेकिन इस गांव में अभी तक पानी की पाइप लाइन नहीं पहुंची है।
व्यंग्य भरे लहजे में वह कहते हैं, “दलित कौन पानी पीते हैं, उन्हें कौन प्यास लगती है कि उन्हें पानी की जरूरत होगी।” उनकी यह बात गांव में पानी की सुविधा को लेकर मौजूद भेदभाव और उपेक्षा की ओर इशारा करती है।
कौड़ा गांव में करीब छह कुएं हैं। इन्हीं कुओं में लोगों ने मोटर लगा रखी है और वहीं से पानी भरते हैं। जिन लोगों के पास मोटर की व्यवस्था नहीं है, वे खुद पानी खींचकर लाते हैं। गांव के अधिकांश लोग आज भी पीने के लिए कुएं के पानी पर ही निर्भर हैं।
कौड़ा गांव में भी डर का मौहाल
कौड़ा गांव में भी गढ़ा गांव की तरह लोगों के अंदर डर है। एक व्यक्ति का आरोप है कि पिछले लगभग पांच वर्षों में, जब से बागेश्वर धाम का विस्तार और प्रभाव बढ़ा है, तब से गांव के लोग खुलकर अपनी बात नहीं रख पाते। उनका कहना है कि विकास जैसे मुद्दों पर आवाज उठाना तो दूर, लोग सामान्य रूप से अपनी राय व्यक्त करने से भी डरते हैं।
उनका आरोप है कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के परिवार का इतना प्रभाव है कि वे किसी को भी धमका सकते हैं। उनका यह भी दावा है कि लोगों की जमीनें उनकी इच्छा से या दबाव बनाकर खरीदी जाती हैं। यदि कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से जमीन बेच दे तो ठीक है, लेकिन अगर वह तैयार न हो तो उसे धमकाने, गाली-गलौज करने, मारपीट करने और डर का माहौल बनाकर जमीन लेने का दबाव बनाया जाता है।
वह आगे दावा करते हैं कि कौड़ा गांव के लोगों की स्थिति ऐसी हो गई है कि शाम करीब 7 बजे के बाद अधिकांश लोग अपने घरों से बाहर निकलने से बचते हैं। उनके अनुसार, गांव में कुछ भी हो रहा हो, लोग डर के कारण बाहर नहीं निकलते। उनका कहना है कि यदि किसी को अचानक बीमारी हो जाए या कोई अन्य आपात स्थिति आ जाए, तब भी दवा लेने के लिए बाहर जाने में डर लगता है। उनके मुताबिक, लोग अपने बच्चों और परिवार की सुरक्षा को देखते हुए चुप रहना ही बेहतर समझते हैं और मजबूरी में वही करते हैं जो उनसे कहा जाता है।
धार्मिक प्रभाव से अर्थव्यवस्था और विकास पर असर
धार्मिक स्थल स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके कारण रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, व्यापार को बढ़ावा मिलता है और आसपास के क्षेत्रों की पहचान भी बनती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बागेश्वर धाम ने गढ़ा और आसपास के गांवों को देशभर में पहचान दिलाई है। लेकिन दूसरी ओर, गांव की गलियों में रहने वाले कई लोग आज भी जलभराव, टूटी सड़कों, नालियों और अन्य मूलभूत सुविधाओं की कमी जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
यह सवाल किसी एक बाबा, मंदिर या धार्मिक संस्था का नहीं है। सड़क, नाली, पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकार और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है, क्योंकि यह ग्रामीणों का अधिकार है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन और आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं, तो गांव के बुनियादी विकास की रफ्तार उसी अनुपात में क्यों नहीं बढ़ी?
समाजवादी पार्टी के नेता आर डी प्रजापति से बातचीत
इस मुद्दे पर खबर लहरिया की टीम ने समाजवादी पार्टी के नेता आर डी प्रजापति से भी बात की। वह अक्सर बागेश्वर धाम से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से अपनी राय रखते रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि गढ़ा गांव और आसपास के क्षेत्रों में विकास नहीं हुआ है। उनके अनुसार, “अगर किसी का विकास हुआ है तो सिर्फ पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का हुआ है।”
आर डी प्रजापति ने कहा कि जिस स्थान पर पहले गांव के लोग अंतिम संस्कार करते थे, वहां अब वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। उनका यह भी दावा है कि जिस तालाब का उपयोग ग्रामीण स्नान, कपड़े धोने और पशुओं को पानी पिलाने के लिए करते थे, उसे भर दिया गया है और आसपास की पहाड़ियों को भी खत्म कर दिया गया है।
उन्होंने आगे कहा कि प्रशासन पूरी तरह प्रभाव में काम कर रहा है। उनका दावा है कि उन्होंने स्वयं ऐसे मामले देखे हैं, जहां जमीन की खरीद-फरोख्त से जुड़े कार्यालय रात में भी खुले रहते थे और अधिकारी काम करते थे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जिस व्यक्ति के पास पहले एक एकड़ जमीन भी नहीं थी, वह आज सैकड़ों एकड़ जमीन का मालिक बन गया है। उनके अनुसार, गांव के लोगों पर दबाव बनाकर उनकी जमीनें ली गईं, उनके साथ मारपीट की गई और इसी प्रक्रिया के जरिए कुछ लोगों ने अपनी संपत्ति बढ़ाई।
इन आरोपों पर पक्ष जानने के लिए हमने कोंड़ा गांव की महिला प्रधान से भी संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी।
गांव का विकास या धार्मिक विकास
ऐसे में एक बड़ा सवाल सामने आता है क्या किसी क्षेत्र की पहचान केवल धार्मिक पर्यटन तक सीमित रहनी चाहिए? क्या विकास की रफ्तार सिर्फ धार्मिक स्थलों के इर्द-गिर्द दिखाई देनी चाहिए या फिर उसका लाभ आसपास के गांवों और पूरे क्षेत्र के लोगों तक भी समान रूप से पहुंचना चाहिए?
यह सवाल केवल कौड़ा गांव का नहीं, बल्कि उन सभी क्षेत्रों का है जहां किसी धार्मिक स्थान का विकास तो तेजी से होता है, लेकिन आसपास के गांव अब भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
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