खबर लहरिया Blog महोबा में ‘सकला’ खाने के लिए लोग करते हैं त्यौहार का इंतज़ार

महोबा में ‘सकला’ खाने के लिए लोग करते हैं त्यौहार का इंतज़ार

लोग पूरे साल इस त्यौहार में मिलने वाले ‘सकला व सिंघाड़े से बनी लपसी’ खाने का इंतज़ार करते हैं। ‘सकला’ को अन्य जगहों पर ‘शकरकंदी’ के नाम से भी जाना जाता है।

                                                                        सकला जिसे अन्य जगहों पर शकरकंदी के नाम से भी जाना जाता है ( फोटो साभार – खबर लहरिया)

लोग त्यौहारों का इंतज़ार उसमें बनाये जाने वाले व्यंजनों की वजह से करते हैं और कुछ त्यौहार तो सिर्फ व्यंजनों के लिए ही जाने जाते हैं। ऐसा ही एक त्यौहार बुंदेलखंड के महोबा जिले में मनाया जाता है, जिसका नाम ‘गणेश त्यौहार’ है। यह त्यौहार इस बार 10 जनवरी को मनाया जाएगा।

इस त्यौहार की ख़ास बात यह है कि लोग पूरे साल इस त्यौहार में मिलने वाले ‘सकला व सिंघाड़े से बनी लपसी’ खाने का इंतज़ार करते हैं। ‘सकला’ को अन्य जगहों पर ‘शकरकंदी’ के नाम से भी जाना जाता है। इसे अमूमन लोग सर्दियों में ही खाया जाता है।

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सिर्फ त्यौहार में मिलता है ‘सकला’

                                                                               बाज़ार में सकला व सिंघाड़ का पिसा हुआ आटा बेचती हुई महिला ( फोटो साभार – खबर लहरिया )

असल में सकला सिर्फ इसी त्यौहार में महोबा के बाज़ार में देखने को मिलते हैं और इसके बाद वह कहीं गुम से हो जाते हैं। वहीं त्यौहार में लोगों को सकला खाने के लिए शाम तक इंतज़ार करना पड़ता है जिसकी अपनी एक वजह है।

इस समय सकला बाजार में दो सौ रूपये के 5 किलो मिल रहे हैं।

लोगों ने बताया कि वह हर समय सकला खरीदकर नहीं खा सकते लेकिन त्यौहार के उपलक्ष में सकला चाहें कितना भी महंगा हो वह उसे ज़रूर से खरीदकर व उबालकर खाते हैं।

इस प्रकार से खाया जाता है सकला व सिंघाड़े को

                                                                                             सिंघाड़े को छिलके सहित सुखाकर भी बाजार में बेचा जाता है

महोबा की रुक्मणि बताती हैं, सकला सिर्फ गणेश त्यौहार में ही बाजार में मिलता है। सकला खाने के लिए लोगों को एक साल तक इंतज़ार करना पड़ता है। इस त्यौहार में लोगों को सकला के साथ-साथ सिंघाड़े की लपसी खाने को मिलती है। अगर इसमें तिल मिलाकर खाया जाये तो इसका स्वाद और भी ज़्यादा बढ़ जाता है।

सकला को खाने के लिए पहले उसे अच्छे से धोया जाता है और पानी में उबाला जाता है। फिर जब शाम होती है तो उबले हुए सकले को दूध में मेड़ कर चीनी मिलाकर खाया जाता है, जिससे उसका स्वाद बढ़ जाता है।

बता दें, सकला की खेती आषाढ़ के महीने में की जाती है और सावन तक उसमें बाल आने लगते हैं। जब गणेश का त्यौहार आता है तो इसकी खुदाई की जाती है।

                                                                                                  सिंघाड़े के अंदर के हिस्से को सुखाकर भी त्यौहार में बेचा जाता है

वहीं अगर सिंघाड़े की बात की जाए तो इसे किस प्रकार से खाया जाता है इसे लेकर चंदन बताती हैं, पहले सिंघाड़े का आटा बनाया जाता है और फिर शाम को उसकी लपसी बनाई जाती है और फिर उसे दूध के साथ खाया जाता है।

तो यह था गणेश त्यौहार जिसका इंतज़ार लोग सकला खाने व साल में एक बार उसका लुफ़्त उठाने के लिए करते हैं।

इस खबर की रिपोर्टिंग श्यामकली द्वारा की गयी है। 

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